मायावती की पार्टी को प्रवक्ताओं की क्या जरूरत?

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चुनावी मौसम में चौबीसों घंटे चलने वाले ख़बरिया चैनलों पर राजनीतिक पार्टी के प्रवक्ता लगातार अपनी अपनी पार्टी का प्रचार करते नज़र आते हैं, बहुजन समाज पार्टी के भी कुछ चुनिंदा नेता कभी-कभी टीवी पर नज़र आ जाते हैं. लेकिन पार्टी की वेबसाइट पर घोषित तौर पर कोई प्रवक्ता नहीं है.

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बिना प्रवक्ता वाली पार्टी कहे जाने पर बहुजन समाज पार्टी के नेता सुधींद्र भदौरिया कहते हैं, "प्रवक्ता का होना नहीं होना बड़ी बात नहीं है. राष्ट्रीय अध्यक्ष के नेतृत्व में हम लोग अपनी अपनी ज़िम्मेदारी को निभा रहे हैं. मीडिया से कोई परहेज नहीं है हमें. मीडिया ही हमलोगों से परहेज करती रही है."

वैसे सुधींद्र भदौरिया पार्टी के इकलौते ऐसे नेता हैं, जो कभी कभी टीवी पर पार्टी की बात रखते हुए दिखाई पड़ते हैं. उनके अलावा दूसरा चेहरा मुश्किल से नज़र आता है.

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बहुजन समाज पार्टी का मेनस्ट्रीम मीडिया से दूरी वाला रिश्ता पार्टी की शुरुआत से रहा है. कांशी राम के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी आंबेडकर के जन्मदिन यानी 14 अप्रैल को 1984 को बनी और मौजूदा समय में यह भारत की तीसरा सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है.

पार्टी के इस सफ़र और मीडिया से इस दूरी के बारे में वरिष्ठ पत्रकार और मायावती की बायोग्राफ़ी लिख चुके अजय बोस कहते हैं, "कांशी राम जब ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनरिटी कम्यूनिटी इंप्लाइज फ़ेडरेशन (बामसेफ) के जरिए लोगों को जोड़ रहे थे तब हर कुछ दिनों में इंडियन न्यूज़पेपर सोसाइटी की बिल्डिंग में आते थे. मलयालम मनोरमा के तबके ब्यूरो चीफ़ से उनकी दोस्ती हुआ करती थी, उनके कमरे में ही पत्रकारों को बुलाकर बात करते थे. लेकिन पार्टी बनाने के बाद मीडिया के लोगों से मिलना जुलना कम हो गया."

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अजय बोस के मुताबिक अस्सी के दशक में कांशीराम की राजनीति को मेनस्ट्रीम मीडिया उचित जगह भी नहीं देता था, लिहाजा ये दूरी एक तरह दोनों तरफ से थी और इसको कांशीराम के बाद मायावती ने भी कायम रखा.

लेकिन इससे पार्टी को अपने समर्थकों तक पहुंचने में कोई ख़ास मुश्किल नहीं हुई. इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर के सामने पार्टी को भले कोई सीट नहीं मिली थी, लेकिन उसकी ताक़त कम नहीं हुई थी.

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इस ओर संकेत करते हुए सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसायटीज़ के प्रोफेसर संजय कुमार कहते हैं, "नरेंद्र मोदी की लहर के सामने बीएसपी शून्य पर पहुंच गई, लेकिन उस वक्त भी 20 फ़ीसदी मतदाताओं ने पार्टी को वोट दिया था."

लेकिन इतने बड़े वोट बैंक को मेनस्ट्रीम मीडिया की उपेक्षा करते हुए भी मायावती कैसे मैनेज करती रही हैं, इस बारे में अजय बोस कहते हैं, "पार्टी का ग्राउंड स्तर पर बहुत अच्छा नेटवर्क है. चुनाव के दौरान यह बूथ स्तर तक होता है, जिसे अलग-अलग क्षेत्र के कॉर्डिनेटर देखते हैं और इन सब पर मायावती ख़ुद ही नज़र रखती हैं."

पार्टी समर्थकों तक अपनी बात पहुंचाने में प्रवक्ताओं की कमी ना खले, इसका मायावती ने बेहतर तरीक़ा निकाला हुआ है. भदौरिया कहते हैं, "हमारी राष्ट्रीय अध्यक्ष ख़ुद ही मीडिया के लोगों को बुलाकर बात करती हैं. आप देखिए कि हर दो-तीन दिन में मीडिया से बात कर रही हैं."

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बहुजन समाज पार्टी को लंबे समय से कवर कर रहीं लखनऊ की वरिष्ठ राजनीतिक पत्रकार अर्चना श्रीवास्तव कहती हैं, "मायावती पहले से ज़्यादा प्रेस कांफ्रेंस कर रही हैं, वह लिखा हुआ भाषण पढ़ती हैं, 40-45 मिनट लंबा. वो सीधे अपने समर्थकों को संबोधित कर रही होती हैं. इस चुनाव से पहले वह मीडिया के सवाल नहीं लेती थीं, लेकिन इस बार अंतर दिखा है वो एकाध सवाल भी ले रही हैं."

इतना ही नहीं अर्चना के मुताबिक मायावती पहले कभी इतनी आसानी से इंटरव्यू नहीं देती थीं. लेकिन इस बार उन्होंने कुछ अख़बारों को इंटरव्यू भी दिया है.

बहुजन समाज पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता भी मानते हैं कि उन्हें कहा गया है कि बहनजी के सभी भाषणों को लोग सुनाएं और प्रेस कांफ्रेंस में उनका बयान भी छपवा कर समर्थकों के बीच बांटा जा रहा है.

इसके अलावा इस चुनाव के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल भी बहुजन समाज पार्टी कर रही है. इस बारे में सुधींद्र भदौरिया कहते हैं, "हमलोग अपने कार्यकर्ताओं तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं. हम ट्विटर, फ़ेसबुक और यूट्यूब पर लंबे समय से कैंपेन चला रहे हैं."

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लेकिन मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी का सारा ध्यान अभी भी ग्राउंड लेवल पर अपने समर्थकों को कनेक्ट करने पर है, मीडिया में बात आए ना आए, इस पर बहुत ध्यान नहीं है.

इसका दिलचस्प उदाहरण पार्टी के उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष राम अचल राजभर देते हैं, "सुबह से लगातार दौरा कर रहे हैं, रात हो गई है अभी भी तीन जगह जाना है. रास्ते में हैं. एक कार्यकर्ता के यहां तेरहवीं है. उसके बाद दो और कार्यकर्ताओं के घर पर आयोजन हैं. वहां जाएंगे तो सबका उत्साह बढ़ेगा. आप बताइए कि कब बात करें, लोगों से तो बातचीत कर ही रहे हैं."

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वैसे मेनस्ट्रीम मीडिया की ओर से कथित उपेक्षा झेलने के बावजूद बहुजन समाज पार्टी ने घोषित तौर पर अपना कोई मीडिया वेंचर स्थापित करने में दिलचस्पी क्यों नहीं ली, इस बारे में अजय बोस कहते हैं, "2007 में जब मायावती मुख्यमंत्री बनीं थीं, तब पार्टी के शीर्ष स्तर पर ऐसी बात चल रही थी. लेकिन वैसा नहीं हो पाया. मीडिया सेटअप चलाना बहुत खर्चीला है और बाद में पार्टी की सरकार भी नहीं रही तो ये बात परवान नहीं चढ़ी, आगे ऐसा हो सकता है."

वैसे कांशीराम को कवर कर चुके पत्रकारों का मानना है कि कांशीराम कुछ पत्रकारों से बड़े ही बेतकल्लुफी से मिलते थे. हंसी ठट्ठा करते हुए. लेकिन मायावती को कवर करने वालों के मुताबिक वह पत्रकारों से हमेशा बहुत दूरी से मिलती हैं, फॉर्मल तरीके से.

अजय बोस कहते हैं कि उनकी बायोग्राफी लिख चुका हूं लेकिन वो जब भी मिलीं बहुत ही फॉर्मल तरीके से ही मिलीं.

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