जल्लीकट्टू पर तमिलनाडु में तनाव

  • मुरलीधरन काशीविश्वनाथन
  • बीबीसी संवाददाता
जल्लीकट्टू के समर्थन में प्रदर्शन
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प्रदर्शनकारियों को लगता है कि अध्यादेश फ़ौरी राहत के लिए पारित किया गया है.

तमिलनाडु में मदुरई के नज़दीक अलंगानल्लूर गांव में तनाव के हालात बने हुए हैं.

यहां पारंपरिक उत्सव जल्लीकट्टू होता है.

तमिल नव वर्ष पोंगल के मौके पर होने वाले जल्लीकट्टू में एक सांड को कई लोग क़ाबू में करने की कोशिश करते हैं और उसकी सींग से बंधे कपड़े को खोलते हैं. इसमें सांड और कई बार उसे क़ाबू में करने की कोशिश करने वाले लोग ज़ख़्मी हो जाते हैं.

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जल्लीकट्टू के समर्थन में लगे पोस्टर

प्रदर्शनकारियों की गुस्साई भीड़ ने तमाम सड़कों को बंद कर दिया है ताकि अधिकारी और तमाशबीन गांव के अंदर दाख़िल न हो सकें. वे इस समस्या के "स्थाई समाधान" की मांग कर रहे हैं.

जल्लीकट्टू से जुड़े अध्यादेश पर राज्यपाल विद्यासागर राव ने शनिवार को ही दस्तख़त कर दिए थे. इसे देखते हुए मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम ने लोगों से विरोध प्रदर्शन न करने की मांग की है.

मुख्यमंत्री की अपील के बावजूद राज्य के अलग अलग हिस्सों में लोगों का विरोध प्रदर्शन जारी है.

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जल्लीकट्टू पर सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में प्रतिबंध लगा दिया था.

पशु कल्याण के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं की एक अपील के बाद सुप्रीम कोर्ट ने साल 2014 में ही जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध लगा दिया था.

बीबीसी संवाददाता जयकुमार सुधांतिपांडियन ने ख़बर दी है कि जल्लीकट्टू के लिए जिस दरवाजे से सांडों को अखाड़े में उतारा जाएगा, वह अब तक नहीं बना है.

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जल्लीकट्टू पर सांड को क़ाबू करने की कोशिश की जाती है

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प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उन्हें अध्यादेश पर शक है. उन्हें लगता है कि यह "तत्कालीन राहत" है और सुप्रीम कोर्ट इसे रद्द कर सकता है. प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ जमा हो चुकी है. ये वे लोग ही हैं, जो कुछ महीने पहले हुए ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन में शरीक हुए थे.

उनकी मांग है कि केंद्र सरकार पशु क्रूरता अधिनियम, 1960, में संशोधन करे. इस संशोधन के ज़रिए सांडों को उन पशुओं की सूची से बाहर कर दे, जिन्हें तमाशे के लिए होने वाले खेलों में इस्तेमाल करने पर मनाही है.

पूरे राज्य में तनाव बरक़रार है.

दूसरी ओर, जल्लीकट्टू के समर्थन में प्रचार अभियान चलाने वाले बालकुमार सोमू का मानना है कि अध्यादेश के मद्देनज़र आंदोलन वापस ले लिया जाना चाहिए.

बीबीसी तमिल सेवा पर फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम में कहा कि पूरे आंदोलन का मक़सद जल्लीकट्टू पर लगी रोक हटाना था. यह पूरा हो चुका है.

उन्होंने कहा, "स्थायी समाधान की मांग से लगता है कि लोगों को अध्यादेश की पूरी समझ नहीं है. कोई भी अध्यादेश छह महीने तक ही वैध रहता है. विधानसभा में अधिनियम पारित करवाया जा सकता है, जो अध्यादेश की जगह ले लेगा. विधानसभा का सत्र 23 जनवरी को शुरू होगा."

उन्होंने आगे जोड़ा, "आंदोलनकारियों को गोलपोस्ट नहीं बदलना चाहिए. वे इसमें कोका कोला और पेप्सी पर प्रतिबंध लगाने जैसी मांगे न जोड़ें".

आंदोलनकारियों के एक दूसरे नेता कार्तिकेय सेनापति ने भी लोगों से अपील की है कि वे आंदोलन रोक दें ताकि जल्लीकट्टू हो सके.

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