ट्रेन हादसा: 'भगवान जगन्नाथ ने बचा लिया'

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आंध्रप्रदेश के विजयनगरम ज़िले के कुनेर स्टेशन के पास हीराखंड एक्सप्रेस के आठ डिब्बे पटरी से उतर गए.

ताज़ा खबरों के मुताबिक इस हादसे में अभी तक 39 लोगों के मरने की पुष्टि हो चुकी है जबकि कई घायलों का नज़दीक के अस्पतालों में इलाज चल रहा है.

संजय दत्ता और उनकी पत्नी झिल्ली भवानी पटना के रहने वाले हैं. शनिवार रात सात बजे के आसपास भुवनेश्वर जाने के लिए वो ट्रेन मे सवार हुए, लेकिन हादसे में वो बाल-बाल बच गए.

क्या हुआ शनिवार रात, उन्होंने बताया बीबीसी संवाददाता विनीत खरे को.

संजय दत्ता

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मैं भवानीपटना का रहने वाला हूं. मैं भुवनेश्वर एक शादी में शामिल होने जा रहा था.

मैं कोच नंबर एस-9 में था. मेरा साइड अपर बर्थ था.

रात करीब साढ़े दस बजे तक हम खा-पी चुके थे. गाड़ी रायगढ़ से आगे बढ़ चुकी थी.

रात करीब साढ़े ग्यारह का वक्त था. मैं नींद में था.

तभी किसी चीज के टूटने की भारी-सी आवाज़ आई. इस कारण हमारी नींद टूट गई. ट्रेन के घिसटने की तेज़ आवाज़ आ रही थी.

मेरे ऊपर कुछ लोग, सामान गिरने लगे. घिसटने के थोड़ी देर बाद गाड़ी बंद हो गई. चारों ओर घुप्प अंधेरा था.

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बाहर की धूल-मिट्टी गाड़ी के अंदर आ गई थी. लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे. वो अपनों का नाम लेकर उन्हें ढूंढ भी रहे थे.

हर कोई निकलने की कोशिश कर रहा था. ट्रेन साइड से पलट गई थी. शुरुआत में मुझे लगा कि क्या आग लग गई है.

एक दरवाज़ा नीचे दब गया था जबकि दूसरा दरवाज़ा सिर के ऊपर दिख रहा था. धीरे-धीरे लोगों ने एक दूसरे की मदद की, उन्हें ऊपर के दरवाजे से निकालने की कोशिश करने लगे.

ट्रेन से बाहर निकलने के बाद हम सभी एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर नीचे उतरे.

कुछ लोग रो रहे थे. कुछ रिश्तेदारों को ढूंढ रहे थे. मैं ये मंज़र करीब आधे घंटे देखता रहा. बाहर जैसे मेला लग गया था. लोग अपनी बोगियों से उतर गए थे. लोग इधर-उधर दौड़ रहे थे. बूढ़े, बच्चे सभी परेशान थे.

मैं अपनी पत्नी और दो सूटकेस के साथ किनार खड़ा हो गया. मैंने देखा कि एक घायल आदमी पानी मांग रहा था, लेकिन किसी के पास पानी नहीं था.

थोड़ी देर बाद गाड़ी लेकर लोग आने लगे. मुझे कोई खास चोट नहीं लगी थी. मैं और मेरी पत्नी मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए करीब डेढ़ किलोमीटर तक पैदल चले.

फिर हमें एक बस मिली जिसको लेकर हम रायगढ़ पहुंचे जिसके बाद हम घर की ओर निकल पड़े.

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झिल्ली दत्ता

साढ़े दस बजे तक हम खाना-पीना खत्म करके सो गए थे. मेरी सीट मिडिल बर्थ थी.

मुझे नींद नहीं आ रही थी. मैं ऐसे ही लेटी हुई थी. तभी बहुत तेज़ आवाज़ आई और लगा कि गाड़ी टेढ़ी कहीं खिंची जा रही है.

डर से मेरी आंख खुल गई. ऐसा लगा कि मेरी ज़िंदगी का अंत आ गया है.

मैं सिर्फ़ भगवान को याद कर रही थी कि किसी तरह मेरी जांच बचा लीजिए. मुझे थोड़ी चोट लग गई थी. मेरे हाथ-पैर कट गए थे. चारों को अंधेरा था.

आखिरकार ट्रेन रुकी. चारों ओर धूल थी. मैं नीचे गिर गई थी. ट्रेन टेढ़ी हो गई थी.

एक दरवाज़ा नीचे दबा था, दूसरा मेरे सिर के ऊपर आसमान की ओर था.

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दो तीन लोगों ने मुझे उठाया और ऊपर से ट्रेन के बाहर निकाल लिया.

चारों ओर का मंज़र भयानक था. लोग चिल्ला रहे थे. ये सब देखकर मैं और डर गई थी.

लोग घायल, खून से लथपथ लोगों को किनारे लिटा रहे थे. हम आगे चलते रहे.

मैंने खून से लथपथ एक छोटी बच्ची को देखा जिसे लोगों ने किनारे लेटा दिया.

उसे देखकर मुझे लगा कि मेरी सांस बंद हो जाएगी.

मैं वो मंज़र शब्दों में बयान नहीं कर सकती. वो दृष्य अभी भी मेरी आंखों के सामने है. वो याद आते ही अभी भी मैं डर जाती हूं.

मैं जगन्नाथ जी को बहुत मानती हूं. उन्होंने बचा लिया है हमको.

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