शशिकला कैसे पहुंचीं मुख्यमंत्री की कुर्सी तक

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ऐसा सिर्फ तमिलनाडु में ही संभंव हो सकता है!

तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहां कोई पंचायत का चुनाव जीते बिना भी राज्य का मुख्यमंत्री बन सकता है.

तमिलनाडु ही वो राज्य है जहां ओ पनीरसेल्वम तीन बार 'स्टैंड बाई' मुख्यमंत्री बने.

जयललिता के जाने के बाद एआईएडीएमके के प्रमुख के तौर पर शशिकला के उभरने से किसी राजनीतिक विश्लेषक और तमिलनाडु की राजनीति पर नज़र रखने वालों को कोई अचरज नहीं हुआ.

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जयललिता के निधन के बाद पार्टी के अंदर सबसे बड़ा सवाल यह था कि उनकी राजनीतिक जगह कौन लेगा जो पार्टी के लिए वोट भी ला सकता हो.

वोट लाने के मामले में शशिकला और ओ पनीरसेल्वम दोनों की क्षमताओं को अभी परखा जाना बाक़ी है क्योंकि चुनाव भी अभी साढ़े चार साल दूर हैं.

लेकिन हर किसी को इसका अंदाज़ा था कि पार्टी की कमान शशिकला के हाथों में ही होगी.

वैसे जयललिता ने कभी भी अपने उत्तराधिकारी के तौर पर किसी के नाम की घोषणा नहीं की थी.

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सरकार चलाने की क्षमता

ओ पनीरसेल्वम पार्टी के अंदर अकेले ऐसे शख़्स थे जिनके अंदर सरकार चलाने की क्षमता थी.

जब संपत्ति से अधिक आय रखने के आरोप के कारण जयललिता को अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी तब पनीरसेल्वम ने ही सरकार की बागडोर संभाली थी.

ऑब्जर्बर रिसर्च फाउंडेशन के चेन्नई के डायरेक्टर एन सत्यमूर्ति ने बीबीसी से कहा,"जयललिता के जाने के बाद पार्टी के अंदर एक बड़ा खालीपन आ गया था. किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत थी जो पार्टी को संगठित कर सके और इसे एक एकजुट रख सके. पार्टी को इस खालीपन का अहसास था. कम से कम शशिकला इसे एक हद तक भर सकती है."

द्रविड़ पार्टियां एआईडीएमके या डीएमके कम्युनिस्ट पार्टियों के तर्ज पर बनाई गई थी.

इस ढर्रे के तहत पार्टी प्रमुख सरकार के मुखिया से ज्यादा महत्व रखता है और पार्टी कैडरों का सरकार में काफी प्रभाव होता है.

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लेकिन एआईडीएमके के मामले में यह बात थोड़ी अजीब है कि शशिकला के पार्टी प्रमुख बनने या फिर अब मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ होने के बाद पार्टी कैडर उतना खुश नहीं हैं.

डेक्कन क्रॉनिकल के रेजिडेंट एडिटर भगवान सिंह ने कहा, "यह मत समझें कि कैडर शशिकला के साथ हैं. हालांकि विधायकों का उनके पास समर्थन है. ऐसा इसलिए है क्योंकि टिकट बांटने में सालों से उनकी भूमिका अहम रही है."

सच तो यह है कि जब पिछले साल सितंबर से जयललिता अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती थीं तब से पार्टी कैडर उनकी भतीजी दीपा जयकुमार के घर के बाहर उन्हें राजनीति में शामिल होने की मांग कर रहे थे.

भगवान सिंह कहते हैं, "आज भी इस तरह की मांग हो रही है. दीपा के फ़ैन क्लब चेन्नई में उनके पोस्टर निकाल रहे हैं."

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एम नटराजन की भूमिका

लेकिन भगवान सिंह पिछले कुछ दिनों से एक दूसरी ही कहानी की ओर इशारा कर रहे हैं. यह शशिकला के पति एम नटराजन से जुड़ी हुई है.

भगवान सिंह बताते हैं, "केंद्र की बीजेपी सरकार एआईडीएमके की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश में लगी हुई है."

नजराजन ही वो शख़्स थे जिन्होंने शशिकला की मुलाक़ात जयललिता से करवाई थी. उस वक्त वो पार्टी की प्रचार शाखा की सचिव थीं और एमजी रामचंद्रन राज्य के मुख्यमंत्री थे.

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उन्होंने ही जयललिता का संपर्क दिल्ली के नेताओं से करवाया था. यह वो समय था जब रामचंद्रन की मौत के बाद जयललिता पार्टी में अपनी जगह बनाने के लिए जूझ रही थीं.

जयललिता और एम नटराजन के रिश्तों में बाद के दिनों में दरार भी आई थी. लेकिन जयललिता की मृत्यु के बाद वे शशिकला और उनके परिवार वालों के साथ उनके मृत शरीर के पास ही दिखे.

नटराजन इस बात का दावा करते हैं और दूसरे कई लोग इस बात पर यकीन भी करते हैं कि 1991 में जयललिता को पहली बार मुख्यमंत्री बनाने में उनकी सबसे अहम भूमिका थी.

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भगवान सिंह कहते हैं, "जयललिता के मुख्यमंत्री के तौर पर उभरने के पीछे नटराजन का ही हाथ माना जाता है. उन्होंने आगे बढ़ने में जयललिता को सहारा दिया. वो एक बड़े कूटनीतिक व्यक्ति हैं. वो आधुनिक जमाने के कौटिल्य हैं. अगर वो जयललिता के लिए ऐसा कर सकते हैं तो फिर अपनी बीवी के लिए क्यों नहीं."

शशिकला के रास्ते में एक अड़चन है. उन पर भी जयललिता की तरह ही आय से अधिक संपत्ति रखने का आरोप है.

इस मामले में कोर्ट का फ़ैसला आना अभी बाक़ी है. अगर फ़ैसला उनके ख़िलाफ़ आया तो क्या होगा, यह देखने वाली बात होगी.

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