हमें तो हंसने से काम, जो हंसाए वही अपने राम!

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सुबह से हंस रहा हूं और हंसे ही जा रहा हूं.

और मुझे हंसाने वाले न तो सदा हंसने वाले नवजोत सिद्धू जी हैं, न कपिल शर्मा हैं, न राजू श्रीवास्तव हैं बल्कि अपनी सबसे बड़ी अदालत की एक बड़ी ख़बर है जो हंसाए जा रही है!

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'तो सिद्धू का कॉमेडी से प्यार बना हुआ है'

बड़ी अदालत ने कहा है कि वो हंसने को लेकर कोई नैतिक नियमावली जारी नहीं कर सकती. यानी कौन हंसता है, किस पर हंसता है, कितना हंसता है, कैसे हंसता है इसे तय करना 'मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है.

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चलिए देर आयद दुरुस्त आयद! देर से ही सही, अदालत सही जगह पहुंची तो.

ये तो अपनी अदालत थी, संवेदनशील थी, हंसी के जादू को जानती थी, हास्य की ताक़त पहचानती थी, इसलिए कह दिया कि हंसने को कंट्रोल नहीं किया जा सकता!

बात सच है.

क्या कभी कोई हवा को कोई और हंसी को रोक पाया है?

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'लोग तो कॉमेडी में भी कास्टिंग काउच चाहेंगे'

लेकिन मेरी हंसी इतने भर से नहीं शुरू हुई. इस ख़बर से शुरू हुई कि अदालत ने जोक्स को लिमिट करने को लेकर कभी एक याचिका विचार के लिए मंज़ूर कर ली थी.

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मंज़ूर हुई तो सुनवाई हुई, होती ही. सुनवाई हुई होगी तो तर्क वितर्क हुए होंगे और साक्ष्य दिए गए होंगे.

दावा करने वालों का मानना था कि संता-बंता टाइप जोक्स में सरदारों को निशाना बनाया जाता है. एक ख़ास समुदाय को उपहास का विषय बनाया जाता है. उसे बेवक़ूफ़ की तरह दिखाया जाता है. इससे उसकी भावनाएं आहत होती हैं.

बात एक दम ठीक है. किसी को किसी समुदाय को निशाना बनाने का हक़ नहीं दिया जा सकता.

लेकिन इन दिनों का चलन ही कुछ ऐसा है कि हक़ कोई नहीं मांगता सीधे कहता है कि 'साडा हक्क इथै रख'! और उसे ले उड़ता है!

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जोक्स के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा. कारण यह कि ऐसे मामले इंटर-सोशल होते हैं कल्चरल कहलाते हैं और भैया हर कल्चरल एरिया शुद्ध वल्चरों का एरिया है! जोकरों पर किसका बस?

पुराने ज़माने में विदूषक राजा की खिल्ली उड़ा सकते थे. बीरबल अकबर से मज़ाक़ कर सकते थे. फ़िल्मों में गोप थे, जॉनी वाकर थे, महमूद थे, असरानी थे और अब भी हैं. जॉनी लीवर थे और अब भी हैं, राजू श्रवास्तव हैं और कपिल शर्मा हैं और फिर नवजोत सिद्धू हैं जिन्होंने बिना कारण हंसने की कला में महारत हासिल किया हुआ है.

लेकिन न जाने ऐसा क्या हुआ, न जाने किसकी बुरी नज़र लगी कि अपना हंसता-हंसाता समाज अचानक 'लाफ्टरली चैलेंज्ड' समाज बन गया.

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ये मत करो, वो मत करो, ये किया तो देशद्रोही का ख़िताब मिलेगा और वो किया तो राष्ट्रद्रोही कहलाने लगोगे.

शायद इसी चक्कर में लोग क़ायदे से हंसना भूल गए और संताजी-बंताजी भी इधर उधर हो गए! बचे खुचे विदूषक जोकर कॉमेडियन सोशल मीडिया पर सवार हो गए.

संता-बंता जी छुट्टी पर चले गए.

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संता जी की जगह शर्मा जी आ गए और बंताजी की जगह वर्मा जी आ गए. जोक्स वही रहे. हम हंसते रहे, हंसाते रहे.

इससे 'की फ़रक़ पैंदा है' कि शर्मा हैं कि वर्मा हैं.

अपन तो हास्यधर्मा हैं.

हमें तो हंसने से काम, जो हंसाए वही अपने राम!---

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