घाटी पर चुप्पी तोड़ने में सरकार से हुई देरी?

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घाटी में कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से कॉलोनी बसाने का कोई प्रस्ताव नहीं है. सरकार के ये कहने के साथ ही कश्मीर घाटी में लोगों ने राहत की सांस ली है. उन्हें डर था कि आने वाली गर्मियों में घाटी नए सिरे से विरोध प्रदर्शनों का गवाह बनेगा.

7 फरवरी को संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने बताया कि कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से रिहाइशी कॉलोनी बसाने का न तो कोई प्रस्ताव है और न ही सैनिक कॉलनियां ही बसाई जाएंगी.

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'यहूदी बस्तियां'

पिछले साल मेहबूबा मुफ्ती की अगुवाई वाली पीडीपी-बीजेपी सरकार के गठन के बाद से ही कश्मीरी पंडितों के लिए अलग कॉलनी का मुद्दा गरमाया था. अलगाववादी गुटों, मुख्यधारा की कुछ राजनीतिक पार्टियों और कुछ नागरिक समूहों ने इस प्रस्ताव पर अपना पक्ष रखा था.

एक ओर अलगावादियों ने कहा कि वे कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी का स्वागत करेंगे. लेकिन अलग कॉलनियों के प्रस्ताव पर उन्हें ऐसा लगा कि यह फलीस्तीन में यहूदी बस्तियां बसाने जैसा है.

साल 2016 को सरसरी तौर पर देखने से ये पता चलता है कि पंडितों और सैनिकों के लिए रिहाइशी कॉलोनियों के मुद्दे ने कश्मीर के संकट को और हवा दी.

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कश्मीर का संकट

भले ही कश्मीर के संकट की शुरुआत हिजबुल मुजाहिदीन के चरमपंथी बुरहान वानी की मौत से हुई हो लेकिन घाटी पर नजर रखने वाले लोग मानते हैं कि आग पहले से भड़क रही थी, बुरहान की मौत ने बस चिनगारी का काम किया.

अलगाववादियों ने इसी बहाने आम कश्मीरियों को डराया. उनसे कहा कि ऐसी कॉलोनियों के जरिए नई दिल्ली कश्मीर घाटी की आबादी के ढांचे में बदलाव लाने की योजना पर काम कर रहा है.

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बुरहान वानी

अलगाववादी इस एजेंडे को लेकर ज़ोरशोर से काम कर रहे थे. और जब बुरहान की मौत हुई तो लोग नाराज़ और बेचैन हो उठे. इधर अलगाववादी महीने भर के खूनी विरोध प्रदर्शन के लिए पहले से तैयार बैठे थे.

संसद में केंद्रीय मंत्री के जवाब के बाद कश्मीर घाटी में फिलहाल यही सवाल सबकी जुबान पर है. अगर पंडितों के लिए अलग से किसी कॉलोनी का कोई प्रस्ताव नहीं था तो केंद्र या राज्य सरकार ने पिछले बरस गर्मी शुरू होने से पहले ही ये बात क्यों नहीं साफ की.

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गृह मंत्रालय

अलगाववादियों के हाथ क्यों ये मौका लगने दिया जिसका नतीजा पांच महीने लंबे विरोध प्रदर्शन के तौर पर निकला. सैकड़ों जानें गईं, हजारों लोगों ने आंखों की रोशनी गंवाईं. और अब गृह मंत्रालय ये कह रहा है कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है.

हालांकि ये फ़ैसला स्वागत किए जाने लायक है पर केंद्र और राज्य दोनों ही सरकारों पर ये ज़िम्मेदारी तो बनती है कि उन्होंने ये सफाई देने में देरी की. सदन में केंद्रीय मंत्री की सफाई के बाद आम कश्मीरियों ने राहत की सांस ली है.

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हुर्रियत नेता

उन्हें फिक्र थी कि आने वाली गर्मियों में अलगाववादी विरोध की आग को और हवा देंगे. कुछ प्रमुख सियासी दलों ने तो आने वाले संकटों के बारे में पहले से ही संकेत देना शुरू कर दिया था. अलगाववादी धड़े भी विवादास्पद मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन तेज करने की धमकी दे ही रहे थे.

उन्होंने घाटी के आम लोगों से लंबी और निर्णायक लड़ाई के लिए अपील जारी करना शुरू कर दिया था. केंद्रीय मंत्री की संसद में सफाई के बाद अब अलगाववादी एहतियात बरतते हुए प्रतिक्रिया दी है. हुर्रियत नेता मीरवाइज़ उमर फारूक ने केंद्र से इन कॉलोनियों के मुद्दे पर अपनी नीति स्पष्ट करने के लिए कहा है.

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स्पष्ट नीति

एक बयान में मीरवाइज़ उमर फारूक ने कहा, "गठबंधन के दोनों साझेदार- पीडीपी और बीजेपी अलग-अलग सुरों में बात कर रहे हैं. मुख्य धारा के राजनेताओं का इतिहास रहा है कि वे घाटी में कुछ और कहते हैं और दिल्ली में कुछ और. हमने अपना रुख़ साफ कर दिया है. जम्मू और कश्मीर के लोगों को पंडितों और सैनिकों के लिए अलग से कोई कॉलोनी स्वीकार नहीं है. भारत सरकार को इस मुद्दे पर अपनी नीति हमेशा के लिए स्पष्ट कर देनी चाहिए."

हुर्रियत नेताओं का कहना है कि वे इंतजार करेंगे और हालात पर नजर रखेंगे.

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