महिला आरक्षण से कहीं 'परिवारवाद' को ही बढ़ावा ना मिले

  • दिव्या आर्य
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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क्या औरतों की अलग पार्टी होनी चाहिए?

भारतीय संसद में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाली मांग पूरी हो गई तो ये कहीं परिवारवाद को बढ़ावा देने का ज़रिया ना बन जाए?

बीबीसी से बातचीत में भारतीय जनता पार्टी की प्रवक्ता शाज़िया इल्मी ने आरक्षण पर सवाल किए जाने पर ये आशंका जताई.

उन्होंने कहा, "मैं राबड़ी देवी सिंड्रोम से बहुत घबराती हूं, मुझे नहीं लगता कि डिंपल यादव के राजनीति में आने से महिलाओं का बहुत फ़ायदा हुआ है, 'पावर' एक स्तर पर पहुंचकर महिला-पुरुष में फ़र्क नहीं करती इसलिए शक्तिशाली महिलाएं और महिलाओं के हक़ में काम करें ये ज़रूरी नहीं."

शाज़िया का मानना था कि महिलाओं के आरक्षण से परिवारवाद 'क्लब' की शक्ल ना ले ले जिसमें, "पत्नियों, बहुओं, और बेटियों को ही बढ़ावा मिले."

'ज़मीनी स्तर पर बढ़े महिलाओं की भागीदारी'

बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक लाइव में अपनी बात रखते हुए शाज़िया इल्मी ने कहा कि उनके मुताबिक आरक्षण नहीं ज़मीनी स्तर पर औरतों की भागीदारी बढ़ाने से ही बदलाव आएगा.

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हाल में एआईएडीएमके नेता शशिकला ने आरोप लगाया था कि एक महिला होते हुए राजनीति में आगे बढ़ने की वजह से उन्हें निशाना बनाया जा रहा है.

भारत में फ़िलहाल ग्राम पंचायतों में से एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित हैं.

इनमें कई मामलों में ये देखने को मिलता है कि महिला सरपंच तो बन जाती है पर असली ताकत उनके परिवार के पुरुष अपने हाथ में रखते हैं.

आम आदमी पार्टी की प्रवक्ता आतिशी मर्लीना मानती हैं कि ऐसा होता है, पर साथ ही कहती हैं, "मैं आरक्षण का पूरा समर्थन करती हूं, महिलाएं काफ़ी हद तक महिलाओं के मुद्दों के प्रति संवेदनशील होती हैं, इसलिए राजनीति में उनकी तादाद बढ़ेगी तभी उनकी सामूहिक आवाज़ बुलंद और असरदार होगी."

आतिशी के मुताबिक एक शोध में ये पाया गया है कि जिन पंचायतों में महिला सरपंच हैं वहां स्वास्थ्य, शिक्षा और विकास का स्तर बेहतर है.

फ़िलहाल दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी के 68 विधायकों में से सिर्फ़ छह ही महिलाएं हैं.

कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, वाम दल या देश कि किसी पार्टी में औरतों की भागीदारी का रिकॉर्ड ख़ास बेहतर नहीं है.

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जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वाइस-प्रेसिडेंट रह चुकीं छात्र वाम नेता शहला रशीद के मुताबिक बड़े ओहदों पर वहां भी औरतों की संख़्या बहुत कम है.

मर्दों के साथ-साथ चलने की मांग

शहला ने कहा, "हमें अपनी पार्टियों की आलोचना करने से नहीं बचना चाहिए, हर बार 'जीतने लायक उम्मीदवार' की दुहाई देकर औरतों की जगह मर्दों को मौके दिए जाते हैं, पर ये दलील ख़ोख़ली है."

आतिशी ने भी माना कि पार्टियां हमेशा 'विन्नेबिलिटी फ़ैक्टर' को सामने रख देती हैं, "पर जब आरक्षण का नियम सामने हो, जैसे जाति आधारित आरक्षण तो अपने आप सही उम्मीदवार को तैयार किया जाता है."

शाज़िया के मुताबिक राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व तभी बढ़ेगा जब पुरुष ये समझ जाएंगे कि उनसे कुछ छीनने नहीं बल्कि उनके साथ चलने की मांग की जा रही है.

उन्होंने कहा, "कई औरतें पुरानी सोच रखती हैं, पर कई मर्द औरतों के हित में सोचते हैं, इसलिए हमारी लड़ाई मर्दों से नहीं बल्कि रूढ़िवादी सोच से है, जिसमें औरतों को दायरे में रखा गया है, इसे बदलने के लिए मर्द और औरत दोनों को कोशिश करनी होगी."

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