'मरने पर तुम्हें क़ब्र के लिए ज़मीन भी नहीं देंगे'

  • 19 फरवरी 2017
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नाज़ीमा फुंदरीमायुम उर्फ नाज़ीमा बीबी मणिपुर विधानसभा चुनाव में पहली मुस्लिम महिला उम्मीदवार हैं.

मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला की पार्टी पीपल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस (प्रजा) ने वाबगाई विधानसभा सीट से 44 साल की नाज़ीमा बीबी को अपना उम्मीदवार बनाया है.

मैतेई पंगल (मणिपुरी मुस्लिम) समुदाय के कुछ मौलवी नाज़ीमा बीबी के चुनाव में खड़े होने से बेहद नाराज़ हैं.

इन मौलवियों ने हाल ही में एक धमकी (फ़तवा) जारी करते हुए कहा है कि वे नाज़ीमा को मरने के बाद गांव में 'क़ब्र' के लिए ज़मीन नहीं देंगे.

पर ये मौलवी इस फ़रमान को जारी करने का न कोई कारण बताते हैं और न ही इस विषय को लेकर सामने आना चाहते हैं.

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ऐसा माना जा रहा है कि नाज़ीमा बीबी का 'प्रजा' के टिकट पर चुनाव में उतरना इन मौलवियों को नागवार गुजरा है.

थौबल ज़िले की संथैल गांव की रहने वाली नाज़ीमा ने बीबीसी से कहा, "मैं एक औरत हूं, इसलिए विरोधियों ने मुझे गांव में दरकिनार कर दिया है."

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वहीं, मणिपुर के सबसे पुराने मदरसे आलिया के प्रमुख और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मोहम्मद नूरूद्दीन कासमी ने बीबीसी से कहा कि राजनीति और शरीयत में बहुत फ़र्क है.

मुसलमान औरतों को पर्दे के अंदर रहना चाहिए. अगर वे (नाज़ीमा) पर्दे में नहीं है तो मुसलमान नहीं हैं. अगर किसी ने उसे खलीफ़ा बनाया है तो यह क़ौम की बर्बादी का हुक़्म दिया है.

धमकी का नहीं है डर

कासमी कहते हैं, "जिस क़ौम ने किसी औरत को उनका सरदार (नेता) बनाया है या फिर राजनीति में खलीफ़ा बनाया तो यह उस कौम की बर्बादी का हुक़्म है. मुस्लिम महिला का राजनीति में आना कहीं से भी ठीक नहीं है. इस्लाम में इसकी मनाही है."

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'क़ब्र' के लिए ज़मीन नहीं देने की धमकी को लेकर कासमी कहते है कि मौलवियों को ऐसी बात नहीं करनी चाहिए. वे महिला को राजनीति में नहीं जाने की बात समझा सकते हैं. अगर किसी को वोट नहीं देना है तो न दें. लेकिन किसी को धमकी देना या किसी के ख़िलाफ़ फ़तवा जारी करना ठीक नहीं है."

लेकिन नाज़ीमा ऐसी धमकियों से विचलित नहीं हैं. क्षेत्र में काफी लोग उनका समर्थन कर रहें हैं.

'क़ब्र' के लिए ज़मीन नहीं दिए जाने की बात पर वे कहती हैं कि इस तरह की धमकी से डर कर अपना काम बंद नहीं कर सकतीं.

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मौलवियों की धमकी के बाद नाज़ीमा ने पार्टी नेता इरोम शर्मिला के साथ हाल ही में प्रदेश की राज्यपाल नज़मा हेपतुल्ला से मुलाक़ात की हैं.

राज्यपाल ने नाज़ीमा को लिखित शिकायत करने का सुझाव दिया है, ताकि वे ज़रूरी कार्रवाई की जा सके.

फ़िलहाल नाज़ीमा अपने विधानसभा क्षेत्र में लगातार चुनाव प्रचार कर रही हैं. इरोम उनके साथ घर-घर जाकर बदलाव के लिए वोट मांग रही हैं.

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नाज़ीमा कहती है कि साल 2006 में मौलवियों ने लाउडस्पीकर से ऐलान कर महिलाओं के तमाम स्वयं सहायता समूहों पर मज़हबी वजहों से प्रतिबंध लगा दिया था.

नाज़ीमा महिलाओं को आर्थिक तौर पर आगे बढ़ने के लिए घर से बाहर निकलने के लिए कहती थी, लेकिन मौलवियों के मुताबिक़ यह 'औरतों की बर्बादी' थी.

महिलाओं की मदद का इरादा

ऐसी चेतावनी के बाद भी नाज़ीमा ने अपना काम कैसे जारी रखा, यह पूछने पर वे कहती है, "हमारे गांव में लोग बेहद ग़रीब हैं. अधिक से अधिक महिलाएं मेरे पास मदद के लिए आती थी. लिहाज़ा मैं इन महिलाओं की मदद किए बग़ैर कैसे रह सकती थी."

लेकिन कुछ दिन बाद कट्टरपंथियों ने एक फ़तवा जारी कर गांव वालों को नाज़ीमा और उसके परिवार का बहिष्कार करने को कहा.

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नाज़ीमा कहती हैं कि शुरू में इन बातों को लेकर वे बहुत गंभीर नही थीं. लेकिन जब स्थानीय दुकानदार ने उनके बेटे को सामान देने से मना कर दिया, तब उन्हें समझ आया कि लोग सही में उनका बहिष्कार कर रहे हैं.

गांव में समुदाय के लिए बने तालाब से पानी लेने पर रोक लगा दी गई. नाज़ीमा के पति को भी पीटा गया और जान से मारने की धमकी दी गई.

मणिपुर जमात-उल उलेमा, यूनाइटेड मणिपुर मुस्लिम वीमेन डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन और आल मणिपुर मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइजेशन के हस्तक्षेप करने पर नाज़ीमा पर लगा बहिष्कार वापस लिया गया.

मुसीबतों पर मुक्के जड़ने वाली लड़की के गांव से

वे कहती हैं, "मैं मौलवियों के ख़िलाफ़ नहीं हूं. वे इस्लाम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और मैं उनकी इज़्ज़त करती हूं."

नाज़ीमा आगे जोड़ती हैं, "मैं सिर्फ महिलाओं की मदद करना चाहती हूं जो संकट में हैं. ऐसी महिलाओं को आर्थिक रूप से आगे बढ़ाना और उनका विकास करना किसी भी तरह से इस्लाम के ख़िलाफ़ नहीं हो सकता."

वे कहती हैं कि अल्पसंख्यक समुदाय में महिलाओं को अपने रोज़मर्रा के जीवन में ऐसी कई बाधाओं का सामना करना पड़ता हैं. यहां तो साइकिल चलाने को लेकर भी लोगों की बुरी बातें सुननी पड़ती हैं.

दरअसल महिला सशक्तीकरण के लिए गांव-गांव घूमने वाली नाज़ीमा के परिवहन का एक मात्र साधन साइकिल ही है.

महिलाओं के साइकिल चलाने की बात पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कासमी कहते है कि खुलेआम लड़कियों का साइकिल चलाना सही नहीं है. पर्दे में रहकर ही सारे काम करने चाहिए.

इरोम शर्मिला की पार्टी की मीडिया प्रबंधक गीतिका सेहमे कहती हैं कि साल 2001 से नाज़ीमा मणिपुर के गांवों में महिला अधिकारों के लिए काम कर रही हैं.

गीतिका बताती है कि नाज़ीमा अपने परिवार की अकेली महिला हैं, जिन्होंने 10 वीं का इम्तिहान पास किया है. वो अपनी क्लास में एकमात्र लड़की थी जिसके कारण कई बार उन्हें स्कूल में ताने और उत्पीड़न झेलना पड़ा था.

गीतिका कहती हैं कि हाई स्कूल पास करने के तुरंत बाद परिवार के लोग नाज़ीमा की ज़बरन शादी करवाने वाले थे.

इस तरह की ज़बरदस्ती से बचने के लिए नाज़ीमा ने अपनी मर्ज़ी से एक ऐसे व्यक्ति के साथ शादी कर ली जिससे वह महज़ दो ही बार मिली थी. यह शादी केवल छह महीने ही चली.

तलाक के बाद नाज़ीमा को इस बात का अहसास हुआ कि आत्मनिर्भरता और आर्थिक स्वतंत्रता के बग़ैर समाज में महिलाएं बेहद क़मजोर होती हैं.

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मणिपुर विधानसभा की कुल 60 सीटों में से वाबगाई और लिलोंग सीट का फ़ैसला मुस्लिम मतदाता करते हैं. इसके अलावा दो और सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक हैं.

मणिपुर की राजनीति में मैतेई मुस्लिम की हमेशा अहमियत रही हैं. प्रदेश की करीब 30 लाख आबादी में दो लाख से अधिक मैतेई मुस्लिम हैं.

प्रदेश की राजनीति में मैतेई मुस्लिम के योगदान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1972 में मणिपुर को राज्य का दर्जा मिलने के बाद पहले मुख्यमंत्री मोहम्मद अलीमुद्दीन बने थे.

पिछले विधानसभा चुनाव में तीन मैतेई मुस्लिम कांग्रेस की टिकट पर जीत कर विधानसभा पहुंचे थे. लिहाजा इरोम की पार्टी ने नाजीमा को पहली मैतेई पंगल महिला उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा है.

मणिपुर में 4 और 8 मार्च को दो चरणों में होने वाले विधानसभा चुनाव में इरोम शर्मिला की पार्टी 'प्रजा' ने पांच उम्मीदवार मैदान में उतारे है.

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