लहरों का सिकंदर 'विराट' बन रहा इतिहास

  • विनीत खरे
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

तीस साल की सेवा के बाद दुनिया का सबसे पुराना विमानवाहक जहाज़ आईएनएस विराट आधिकारिक तौर पर सोमवार को रिटायर हो रहा है, लेकिन क्या इसे भी आईएनएस विक्रांत की तरह कबाड़ में बेच दिया जाएगा.

आईएनएस विराट को नौसेना में 'ग्रैंड ओल्ड लेडी' भी कहा जाता था. आईएनएस विराट नौसेना की शक्ति का प्रतीक था जो कहीं भी जाकर समुद्र पर धाक जमा सकता था.

1971 युद्ध के हीरो विक्रांत को कबाड़ में बेच दिया गया और एक कंपनी उसके लोहे का इस्तेमाल बाइक बनाने में कर रही है. कोशिश हो रही है कि आंध्र प्रदेश और केंद्र सरकार के बीच कोई समझौता हो जाए और आईएनएस विराट को एक सैन्य संग्रहालय बना दिया जाए.

माना जाता है कि ऐसा करने में करीब 1000 करोड़ रुपये खर्च होंगे लेकिन ये धन कौन खर्च करेगा इस पर विवाद है.

तूफान से सुरक्षा ज़रूरी

226 मीटर लंबे और 49 मीटर चौड़े आईएनएस विराट के लिए समुद्र के किनारे ऐसी जगह की ज़रूरत है जहां ज़रूरी आधारभूत सुविधाएं हों और ये तूफ़ान से सुरक्षित हो.

आंध्र प्रदेश के पर्यटन और संस्कृति सचिव श्रीकांत नागुलापल्ली ने बीबीसी को बताया कि विराट के भविष्य पर राज्य और केंद्र सरकार के पर्यटन मंत्रालय और नागरिक विकास मंत्रालय संपर्क में हैं.

नौसेना के एक प्रवक्ता के मुताबिक अभी कुछ भी तय नहीं है.

श्रीकांत नागुलापल्ली का कहना है कि राज्य सरकार आईएनएस विराट को जगह देने के लिए तैयार है लेकिन परियोजना को आगे ले जाने के लिए केंद्र सरकार की अनुमतियों की ज़रूरत होगी.

ब्रिटेन से खरीद

उन्होंने बताया कि प्रस्तावित संग्रहालय के लिए वाइज़ैग में पांच जगहें भी तय कर दी गई हैं, लेकिन अभी अंतिम फ़ैसला नहीं लिया गया है.

आईएनएस विराट ने 30 साल भारतीय नौसेना की सेवा की और 27 साल ब्रिटेन की रॉयल नेवी के साथ गुज़ारे. वर्ष 1987 में भारत ने इसे ब्रिटेन से खरीदा था.

उस वक्त इसका ब्रितानी नाम एचएमएस हरमीज़ था. ब्रितानी रॉयल नेवी के साथ विराट ने फॉकलैंड युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

करीब 100 दिनों तक विराट समुद्र में मुश्किल परिस्थितियों में रहा.

इस जहाज़ पर 1944 में काम शुरू हुआ था. उस वक्त दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था. रॉयल नेवी को लगा कि शायद इसकी ज़रूरत न पड़े तो इस पर काम बंद हो गया.

लेकिन जहाज़ की उम्र 1944 से गिनी जाती है. 15 साल जहाज़ पर काम हुआ. 1959 में ये जहाज़ रॉयल नेवी में शामिल हुआ.

जहाज़ या शहर

भारतीय नौसेना में शामिल होने के बाद आईएनएस विराट ने जुलाई 1989 में ऑपरेशन जूपिटर में पहली बार श्रीलंका में शांति स्थापना के लिए ऑपरेशन में हिस्सा लिया.

वर्ष 2001 में भारतीय संसद पर हमले के बाद ऑपरेशन पराक्रम में भी विराट की भूमिका थी.

समुद्र में 2250 दिन गुज़ारने वाला ये महानायक छह साल से ज़्यादा वक्त समुद्र में बिता चुका है जिस दौरान इसने दुनिया के 27 चक्कर लगाए.

ये जहाज़ एक छोटा शहर है. इसमें लाइब्रेरी, जिम, एटीएम, टीवी और वीडियो स्टूडियो, अस्पताल, दांतों के इलाज का सेंटर और मीठे पानी का डिस्टिलेशन प्लांट जैसी सुविधाएं है.

28700 टन वजनी इस जहाज़ पर 150 अफ़सर और 1500 नाविकों की जगह है. अगस्त 1990 से दिसंबर 1991 तक रिटायर्ड एडमिरल अरुण प्रकाश आईएनएस विराट के कमांडिंग अफ़सर रहे.

उन्हें उम्मीद है कि विराट को कबाड़खाने जाने से बचा लिया जाएगा.

पुराने रिश्ते

विक्रांत के लोहे के मोटरसाइकिल के लिए इस्तेमाल पर वो कहते हैं, "किसी मोटरसाइकिल कंपनी ने उसका लोहा खरीदकर उसका कुछ और बना लिया तो शायद उसका नाम और याददाश्त तो चलती रहेगी. अगर कोई कंपनी उसका नाम इस्तेमाल करती है, मेरे विचार में इसमें कोई समस्या नहीं है."

एडमिरल अरुण प्रकाश आईएनएस विराट से तीन दशक पुराने रिश्ते को याद करते हैं. वो बताते हैं कि जून 1983 में उनसे बोला गया कि वो लैंडिंग और टेक-ऑफ़ की प्रैक्टिस करें.

वो इंग्लिश चैनल पोर्ट्समथ के पास पहुंचे. वहां वो एचएमएस हरमीज़ या आईएनस विराट पर हेलिकॉप्टर से उतरे. उन्हें पूरा जहाज़ दिखाया गया.

ये पहली पहचान बेहद रोमांचक लगी. वो इससे पहले आईएनएस विक्रांत पर सफ़र कर चुके थे. विक्रांत 18000 टन का जहाज़ था. विराट उससे कहीं भारी था.

वो हवाई जहाज़ से विमान में बैठे और टेक ऑफ़ किया. एक घंटे बाद डेक पर वर्टिकल लैंडिंग की. 1987 में जब जहाज़ मुंबई आया तो एडमिरल अरुण प्रकाश एक छोटी फ़्रिगेट को कमांड कर रहे थे.

तकनीकी विशेषज्ञ

वो बताते हैं, "हमें बोला गया कि सब जाकर विराट का स्वागत करो. वो मॉनसून का बहुत ही तूफ़ानी दिन था. हम मुंबई के बाहर गए. लगातार बारिश हो रही थी, तेज़ हवा चल रही थी. दूर से हमने देखा जहाज़ को. वो दृश्य शानदार था. मुझे अगस्त 1990 (दिसंबर 1991 तक) में जहाज़ की कमान मिली."

एडमिरल अरुण प्रकाश के मुताबिक आईएनएस विराट ने तटरक्षा के अलावा नौसेना की दो पीढ़ियों के पायलटों, इंजीनियर, तकनीकी विशेषज्ञों को बहुत कुछ सिखाया.

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1983 में तीन सी हैरियर विमानों को ब्रिटेन से भारत लाने के बाद उस वक्त कमांडर अरुण प्रकाश ऐडमिल डॉसन के साथ.

वो बताते हैं, "ये खुश रहने वाला जहाज़ था. इसमें रहने, खाने का अच्छा बंदोबस्त था.

जहाज़ पर मीठे पानी बनाने का डिस्टिलेशन प्लांट था तो आप शाम को नहा सकते थे. इसमें खराबियां कम होती थीं. फौज की गढ़वाल रेजिमेंट के साथ इसका जुड़ाव था."

एडमिरल प्रकाश के मुताबिक जो विक्रांत के साथ हुआ वो विराट के साथ नहीं होना चाहिए.

सेना के एक अधिकारी के मुताबिक विक्रांत प्रोजेक्ट पर 680 करोड़ रुपए की लागत आने का अनुमान था.

एडमिरल प्रकाश कहते हैं, "हमारी फौज आज तक लगातार लड़ाई लड़ रही है. आज तक न संग्रहालय बना है, न वॉर मेमोरियल बना. अंग्रेज़ हिंदुस्तानी जवानों के नाम पर तीन चार वॉर मेमोरियल बनाकर छोड़ गए लेकिन स्वतंत्र हिंदुस्तान में एक मेमोरियल नहीं बना."

वो बताते हैं, "श्रीलंका में हमारे जवानों का संग्रहालय है. बंग्लादेश में है लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा नहीं हो पाया है. इन दो जहाज़ों में से एक को भी बचा लिया जाता था तो संग्रहालय भी बन जाता और वॉर मेमोरियल भी बन जाता. उससे पता चलता है कि देश को अपने जवानों की कद्र है. बहुत दुख होता है कि इस देश में फ़ौजियों की कोई कद्र नहीं है."

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