तमिलनाडु चुनाव- 'गांव के सौ लोगों में से सभी चोर हों तो पुलिस क्या करेगी?'

  • इमरान कुरैशी
  • बेंगलुरु से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
तमिलनाडु चुनाव

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तमिलनाडु में एक साल के भीतर दो बार चुनाव रद्द हो गए हैं. कैश फॉर वोट घोटाले ने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को धूमिल किया है.

बीते साल मई में हुए विधानसभा चुनावों में चुनाव आयोग ने अवाराकुरीची और थंजावुर विधानसभा सीटों पर चुनाव रद्द किए थे.

रविवार को आरके नगर विधानसभा के लिए हो रहे उपचुनावों को चुनाव आयोग ने रद्द कर दिया. ये सीट तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता के देहांत के बाद खाली हुई थी.

तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर विजय भास्कर और उनके सहयोगियों के ठिकानों पर आयकर विभाग की छापेमारी के बाद चुनाव आयोग ने आरके नगर विधानसभा सीट पर उप चुनाव रद्द करने का फ़ैसला लिया है.

छापेमारी में न सिर्फ़ भारी रकम ज़ब्त की गई बल्कि चुनावों के दौरान बांटे जा रहे पैसों का हिसाब-किताब भी अधिकारियों के हाथ लग गया.

वार्डों और मतदाताओं के आधार पर बांटे गए पैसों को जब जोड़ा गया तो हिसाब 89 करोड़ रुपए तक पहुंच गया.

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जयललिता का बीते साल दिसंबर में देहांत हो गया था. वो आरके नगर सीट से विधायक थीं.

तो क्या तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे राज्यों में मतदाताओं को पैसे बांटना आम बात है.

भारत के पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालास्वामी ने बीबीसी से कहा, "चुनाव के दौरान सिर्फ़ पैसे बांटना ही नहीं बल्कि पैसे लेना भी आदत बन गई है. दूसरे राज्यों के बारे में भूल जाइये. तमिलनाडु इस मामले में सबसे आगे है और निकट भविष्य में भी यह आगे ही बना रहेगा."

गुंडलुपेट और नानजांगुड विधानसभा सीटों के लिए हुए उप चुनावों में भाजपा ने कांग्रेस की एक महिला नेता पर मतदाताओं को नक़दी बांटने के आरोप लगाए थे.

इसके जवाब में कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदुरप्पा पर एक महिला को एक लाख रुपए देने के आरोप लगा दिए.

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एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ार्म (एडीआर) के प्रोफ़ेसर त्रिलोचन शास्त्री भी गोपालास्वामी की राय से इत्तेफ़ाक़ रखते हैं. वो कहते हैं, "ये आदत और ख़राब होती जा रही है. इसका मतलब है कि एक बार उम्मीदवार चुनाव जीत गया तो वो फिर बस पैसा कमाने में ही व्यस्त रहेगा."

वोटों के बदले कैश देना नेताओं की पुरानी आदत रही है और ये अधिकतर झोपड़ पट्टियों या पिछड़े इलाक़ों में ही दिया जाता था. लेकिन 2009 में तमिलनाडु में इसने अलग ही रुख किया और इसे तीरूमंगलम फ़ार्मूला कहा जाने लगा.

ये नाम इसे तमिलनाडु की तीरूमंगलम सीट पर हुए उप-चुनावों से मिला. चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं के घरों में अख़बारों के साथ भिजवाईं गईं मतदाता पर्चियों के साथ पैसे भी रखे गए थे. तब ये कारनामा डीएमके ने किया था.

इस नये तरीके को एआईडीएमके ने भी अपनाया और 2016 में अवाराकुरूची और थंजावुर विधानसभा के चुनाव के दौरान इसके अलग-अलग रूप देखने को मिले.

उन चुनावों में चुनाव आयोग ने राज्यभर में सौ करोड़ रुपए से अधिक कैश ज़ब्त किया था. लेकिन आरके नगर ने इस रिकार्ड को तोड़ दिया है. हिसाब-किताब के मुताबिक इस अकेली सीट पर ही सौ करोड़ रुपए से ज़्यादा ख़र्चा किया गया है.

लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे संगठन अरापोर अयक्कम से जुड़े जयराम वेंकटेशन कहते हैं, "ये असल में तमिलनाडु में व्याप्त भ्रष्टाचार को ही दर्शाता है. इसकी वजह रेत खनन से लेकर जीवन से जुड़े हर क्षेत्र में हो रहे व्यापक भ्रष्टाचार में छुपी है. मुख्य राजनीतिक दलों को लगता है कि वो किसी भी अन्य चीज़ की तरह ही वोट भी ख़रीद सकते हैं."

गोपालास्वामी कहते हैं, "ग़ैर क़ानूनी पैसा इतना ज़्यादा आ गया है कि वो एक वोट के लिए चार हज़ार रुपए तक देने में सक्षम हैं. इसका मतलब है कि भ्रष्टाचार जीवन का हिस्सा बन चुका है और पैसा देने वाले और पैसा लेने वाले इसके ख़तरनाक़ स्तर तक पहुंच गए हैं. लोगों को अब लगता है कि वो धनबल से सत्ता हासिल कर सकते हैं."

तो क्या इसे रोका जा सकता है?

गोपालास्वामी कहते हैं, "यदि एक गांव में सौ लोग हैं और उनमें से कुछ चोर हैं तो पुलिस उन चोरों को पकड़ सकती है. लेकिन अगर सौ के सौ लोग चोर हो जाएं तो पुलिस क्या कर सकती है? लोगों को इतना गुमराह कर दिया गया है कि अब वोट के बदले पैसे लेने को ग़लत ही नहीं माना जाता है. सब ख़ुश हैं."

प्रोफ़ेसर शास्त्री और वेंकटेशन का मानना है कि भ्रष्टाचार में लिप्त उम्मीदवारों को चुनाव ही नहीं लड़ने दिया जाना चाहिए.

वो कहते हैं कि इस सिलसिले में एक प्रस्ताव भी सरकार को भेजा गया है लेकिन सरकार ने अभी उस पर कोई फ़ैसला नहीं लिया है.

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