ब्लॉग: कश्मीर पर अब सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पूछा जाएगा

  • राजेश जोशी
  • रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
कश्मीर

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श्रीनगर के एक अस्पताल में सुरक्षा बलों से झड़प में घायल हुआ एक कश्मीरी नौजवान

भारतीय जनता पार्टी में 'मार्गदर्शक' के ओहदे पर बैठा दिए गए लालकृष्ण आडवाणी को एक रंज हमेशा रहा कि भारत एक 'सॉफ़्ट स्टेट' है.

यानी राष्ट्र-राज्य के तौर पर भारत भीतरी और बाहरी दुश्मनों से कभी कड़ाई से पेश नहीं आता.

अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में गृहमंत्री के तौर पर उनका अरमान था कि भारत इसराइल की तरह का कड़क राष्ट्र बन जाए जो अपने दुश्मनों को पहले मटियामेट करता है और क़ानून की किताब बाद में खोलता है.

उनके राजनीतिक शिष्य नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर 2002 में आडवाणी के इस अरमान को पूरा कर दिखाया और देश के राजनीतिक विमर्श को पूरी तरह बदल डाला.

लगे हाथों उन्होंने अपने गुरु के कई दूसरे बड़े अरमानों को गहराई से दफ़न करने का इंतज़ाम भी कर दिया पर आडवाणी को इसका एहसास पूरे एक दशक बाद हुआ जब प्रधानमंत्री बनने के उनके सपने को मोदी ने चकनाचूर कर दिया.

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भारतीय सेना के रिटायर्ड मेज़र जनरल का मानना है कि सेना को सबूत देने की ज़रूरत नहीं है.

'हॉट परस्यूट'

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नब्बे के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी की कैबिनेट में गृहमंत्री बनने के तुरंत बाद आडवाणी ने भारत की इस सौम्य छवि को बदलने का बीड़ा उठाया और एलान किया कि आतंकवादियों को पकड़ने के लिए भारतीय सुरक्षा बल 'हॉट परस्यूट' करेंगे.

यानी वारदात करने के बाद अगर कोई आतंकवादी पाकिस्तान भाग जाता है तो भारतीय फ़ौजी सीमा पार करके उसके पीछे जाएंगे और उसे पाकिस्तानी ज़मीन से पकड़ कर लाएँगे.

मीडिया में ताली बजाने वालों ने उस वक़्त भी ताली बजाई थी पर आडवाणी को उनके कुछ समझदार सलाहकारों ने समझाया कि 'हॉट परस्यूट' को पड़ोसी मुल्क के ख़िलाफ़ युद्ध का एलान माना जाता है.

उन्हें तुरंत अपनी ग़लती का एहसास हुआ और फिर उन्होंने कभी 'हॉट परस्यूट' का नाम नहीं लिया. वो एक अलग दौर था.

वाजपेयी किसी तरह नीतीश कुमार और जॉर्ज फ़र्नांडीस के सहारे गठबंधन सरकार चला रहे थे और उनके विरोधी भी उनके मंतव्य पर शक नहीं करते थे.

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कश्मीर में इंसानियत

'कश्मीर के मुद्दे को इंसानियत के दायरे में सुलझाया जाएगा' - ये वाजपेयी का ऐसा वाक्य था जिसे याद कर आज भी कश्मीरी लोग भावुक हो उठते हैं क्योंकि अब कश्मीर में इंसानियत का कोई दायरा बचा नहीं है.

अगर ये दायरा बचा होता तो अपने घर से हज़ारों मील दूर पीठ पर भारी पिट्ठू लादे, एक हाथ में राइफ़ल उठाए कश्मीर के एक अजनबी मोहल्ले से गुज़रते हुए एक भारतीय जवान को सड़कों पर घूमने वाले कश्मीरी नौजवानों के हाथों अपराधियों की तरह बेइज़्ज़त नहीं किया जाता.

एक सज़ायाफ़्ता अपराधी की तरह ये वर्दीधारी जवान हाथ में राइफ़ल होने के बावजूद चुपचाप सिर झुकाकर गालियाँ, थप्पड़ और अपमान सहते हुए किसी तरह बचकर निकलने को मजबूर होता है.

अगर कश्मीर में इंसानियत का दायरा बचा होता तो भारतीय फ़ौज या पैरामिलिट्री के जवान एक ग़रीब कश्मीरी रफ़ूगर को हरे रंग की फ़ौजी जीप के बोनट पर बाँधकर मानव ढाल की तरह इस्तेमाल नहीं कर रहे होते.

अंतरराष्ट्रीय नियमों के मुताबिक़ किसी इंसान को उसकी मर्ज़ी के बिना ढाल की तरह इस्तेमाल करना युद्धअपराध की श्रेणी में आता है.

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मोदी का एजेंडा

मगर प्रधानमंत्री बनने के बाद पिछले तीन साल में नरेंद्र मोदी ने देश और विदेश में अपनी ऐसी धाक जमाई है कि बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक कड़े सवाल उठाने से कतराते हैं.

ये सच है कि बीजेपी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजेंडे में कश्मीर इतना अहम था कि सत्ता सँभालने के बाद सबसे पहले प्रधानमंत्री कार्यालय से धारा 370 को ख़त्म करने का 'टेस्ट बैलून' छोड़ा गया और इस मुद्दे पर राष्ट्रीय बहस शुरू करने की कोशिश की गई.

पर ये बहुत बुरी शुरुआत साबित हुई. कहाँ तो कश्मीरी आवाम के दिलो-दिमाग़ जीतने की बात हो रही थी और कहाँ सरकार के पहले क़दम से ही उनके दिमाग़ में मोदी प्रशासन के ख़िलाफ़ पहले से मौजूद शक जम कर सीमेंट हो गया.

फिर भी जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में कश्मीरी आवाम ने भारी तादाद में बाहर निकल कर वोट दिया और भारत सरकार दुनिया भर में कह सकी कि कश्मीरी लोगों को भारतीय जनतंत्र पर गहरा भरोसा है.

पर क्या आज नरेंद्र मोदी सरकार उसी आत्मविश्वास के साथ ये दावा कर सकती है जबकि श्रीनगर उपचुनाव में बूथ के बूथ ख़ाली पड़े रहे और एक भी वोटर उधर नहीं फटका?

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भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथी बुरहान वानी की पुलिस मुठभेड़ में मौत के बाद लगातार क़र्फ्यू

चरमपंथियों की मुठभेड़

जबकि सुरक्षा बलों से चरमपंथियों की मुठभेड़ के दौरान सैकड़ों की तादाद में निहत्थे कश्मीरी ख़ुद ढाल की तरह सामने खड़े हो जाते हैं और उन्हें न अपनी जान की परवाह होती है और न अपने परिवार वालों के मारे जाने का ग़म.

पकड़े गए चरमपंथियों को छुड़ाने के लिए कश्मीरी औरतें भारी हथियारों से लैस सुरक्षा बलों पर टूट पड़ती हैं. कश्मीर की सड़कों पर से गुज़र रहे सुरक्षा बल के जवानों को गाली-थप्पड़ खाने के बावजूद सिर झुकाकर चलना पड़ता है.

अब सवाल पूछने का समय है. सवाल ये है कि पिछले तीन साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीरी लोगों में भारतीय जनतंत्र के प्रति भरोसा जगाने के लिए क्या किया है?

लोगों को अंधा कर देने वाली पैलेट गनों, एके-47 राइफ़लों और कभी-कभार अपने भाषणों में भावुक कविताई के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास कश्मीर के लिए क्या रोडमैप है?

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यशवंत सिन्हा पांच सदस्यों का दल लेकर कश्मीर गए थे

हिंदू राष्ट्रवाद

देश के प्रमुख बुद्धिजीवी भानु प्रताप मेहता ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा है, "बेचैन करने वाली बात ये है कि (सत्ता के केंद्र) दिल्ली में सीधे-सीधे सच का सामना कोई नहीं करना चाहता. भारत का राजा नंगा है… प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नज़रों के सामने कश्मीर गर्त में जा रहा है."

एक के बाद दूसरे राज्य में मोदी को विजय पताकाएँ फहराते देख सोशल मीडिया एक सन्निपाती बुख़ार की चपेट में आकर हिंदू राष्ट्रवाद के विस्फोट का उत्सव मना रहा है.

उसे भरोसा है कि मुट्ठी भर 'कश्मीरी देशद्रोही' राष्ट्रवाद के इस चरम विस्फोट के आगे टिक नहीं पाएंगे और जो टिकने की कोशिश करेंगे उन्हें डंडे के बल पर ठीक कर दिया जाएगा.

याद कीजिए इस्लामाबाद से ढाका को कंट्रोल करने वाले पश्चिमी पाकिस्तान के फ़ौजी जनरल भी 1971 से पहले पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों के बारे में कुछ ऐसा ही सोचते थे. वो कितने ग़लत साबित हुए.

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