नज़रिया: क्या सोनिया कांग्रेस को टूटने से बचा पाएंगी?

  • 4 मई 2017
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एक चतुर शतरंज खिलाड़ी की तरह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी अपने बेटे राहुल गांधी को बचाने के लिए बहुत सधी चाल चल रही हैं और साथ ही साथ काफ़ी पुरानी अपनी पार्टी में सत्ता संतुलन भी बनाए रखने की कोशिश में हैं.

हाल ही में आगामी चुनाव वाले प्रदेश गुजरात की ज़िम्मेदारी अशोक गहलोत को दिए जाने, दिग्विजय सिंह की पार्टी के महासचिव पद से लगभग विदाई और कांग्रेस के आंतरिक पोल पैनल में मधुसूदन मिस्त्री को शामिल करने जैसे फ़ैसलों पर सोनिया की छाप साफ़ दिखाई देती है.

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सोनिया गांधी द्वारा डैमेज कंट्रोल के अन्य उपायों में पी चिदंबरम और कमल नाथ पर भरोसा बनाए रखना और आगामी राष्ट्रपति चुनावों के संदर्भ में विपक्षी एकता को बनाए रखने के लिए काम करना शामिल है.

कमल नाथ के बारे में अफ़वाह थी कि वो बीजेपी में शामिल होने वाले हैं.

इनमें से हर क़दम सोनिया की राजनीतिक परिपक्वता के बारे में बहुत कुछ कह जाते हैं. उनकी ममता चाहती है कि राहुल की उनके वारिस के रूप में कांग्रेस में ताजपोशी हो जबकि वो कड़वी राजनीतिक सच्चाइयों के प्रति भी खुले दिमाग से सोच रही हैं.

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उदाहरण के लिए राहुल को नेता के रूप में स्वीकार करने और पार्टी के नेतृत्व में बदलाव के उनके घोषित एजेंडे को मानने में कांग्रेस अनिच्छुक है.

ऐसा लगता है कि सोनिया इस बात से पूरी तरह वाक़िफ़ हैं कि राहुल की ओर से तेज़ी से बदलाव के कदम उठाया जाना पार्टी में न केवल उनकी स्थिति को कमज़ोर करेगा बल्कि कांग्रेस में विभाजन की नौबत ला देगा.

ये बात महत्वपूर्ण है कि सोनिया ने अपनी रिटायरमेंट योजना को स्थगित कर दिया है.

ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी की मुखिया ने उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा के चुनावों में एक दिन के लिए भी प्रचार नहीं किया.

साल 2016 से वो कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से कहती रही हैं कि वो सक्रिय राजनीति से संन्यास लेना चाहती हैं, खासकर जब वो नौ दिसम्बर 2016 को 70 साल की हुई थीं. लेकिन लगता है कि उत्तर प्रदेश और दिल्ली के नगर निगम चुनावों में हार ने पुनर्विचार को मजबूर किया है.

अब सोनिया गांधी के सामने प्रमुख काम है राहुल गांधी की आसान ताजपोशी और साथ ही साथ इसका भी ध्यान रखना कि पार्टी में विभाजन या सामूहिक इस्तीफ़े न हों.

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लगता है कि नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी (1996-98) के ज़माने की याद अभी भी ताज़ा है जब ममता बनर्जी, मणि शंकर अय्यर, माधवराव सिंधिया, एस बंगरप्पा, सुरेश कलमाडी, असलम शेर ख़ान, दिलीप सिंह भूरिया और बड़ी संख्या में अन्य कांग्रेसियों ने पार्टी छोड़ दी थी.

जब सोनिया ने विधिवत राजनीति में प्रवेश लिया तो उन्होंने अर्जुन सिंह धड़ा, माधवराव सिंधिया और बाकी पार्टी के बीच एकता स्थापित करने में बहुत धैर्य से काम लिया था.

उस समय कांग्रेस सिर्फ़ चार राज्यों में शासन में रह गई थी.

वर्तमान में यह आंकड़ा थोड़ा ही ज़्यादा है. लेकिन असली चुनौती जून 2018 तक आने वाली है, जब हो सकता है कि कांग्रेस पंजाब, मिज़ोरम और पुदुच्चेरी को छोड़ किसी भी राज्य में सत्तारूढ़ न रहे.

यहां तक कि सम्पूर्ण कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के लिए इन राज्यों में भी, पार्टी के टूटने और सरकार को गिराने के खेल को ख़ारिज नहीं किया जा सकता.

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Image caption मधुसूदन मिस्त्री और राहुल

कांग्रेस मुक्त भारत की आशंका को देखते हुए सोनिया ने राहुल के वफ़ादार मधुसूदन मिस्त्री को कांग्रेस इलेक्शन अथॉरिटी के सदस्य के रूप में नियुक्त किया है.

हालांकि पार्टी की यह शाखा लगभग ठप है और नई दिल्ली के 24 अकबर रोड के 39 नंबर कमरे से चलती है.

स्पष्ट रूप से, मिस्त्री का मुख्य काम होगा दो करोड़ सदस्यता वाली इस संस्था का निष्पक्ष चुनाव कराना, लेकिन सही मायने में मिस्त्री का असल मिशन पार्टी चुनावों में राहुल गांधी की जीत को सुनिश्चित कराना है.

पुराने लोगों के लिए ये हलचल कांग्रेस की हालत बताती है, जहां नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य पार्टी के सांगठनिक चुनावों में अपनी जीत को लेकर अब निश्चिंत नहीं रह गए हैं.

उत्तर प्रदेश और दिल्ली के नगर निगम चुनावों में हार के बाद, कांग्रेस का आंतरिक सर्वे कहता है कि गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत के बाद अभूतपूर्व शोरगुल मच सकता है.

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कांग्रेस के सलाहकारों को लगता है कि चुनाव आते ही बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के गर्व का मुद्दा उछाल सकते हैं और वोटरों से उत्तर प्रदेश से भी अधिक बहुमत दिलाने को कह सकते हैं.

वरिष्ठ कांग्रेस नेता कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश को लेकर भी आश्वस्त नहीं हैं जहां सिद्धरमैया और वीरभद्र सिंह जैसे मंझे हुए नेता किले बचाए हुए हैं.

ऐसे हालात में, मेघालय, मिज़ोरम और पुदुच्चेरी के कांग्रेस शासित राज्यों में किसी शर्मा या बेदी द्वारा तबाही की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

सांगठनिक स्तर पर अकेले सोनिया के पास ही ये अधिकार थे कि वो दिग्विजय सिंह से कर्नाटक और गोवा छीन सकें और अशोक गहलोत, चेल्ला कुमार और केसी वेणुगोपाल को कुछ राज्यों के प्रभारी पद बनाए जाने जैसी नियुक्तियां कर सकें.

टुकड़ों-टुकड़ों में प्यादों को रणनीतिक जगहों पर रखने का नज़रिया पार्टी में उन कुछ शुद्धतावादियों के लिए चक्कर में डालने वाला है जिन्हें इस बात पर हैरानी होती है कि पार्टी मुखिया अध्यक्ष पद के चुनाव की घोषणा और एआईसीसी सदस्यों को कांग्रेस वर्किंग कमेटी का अपना नेता चुनने का मौका क्यों नहीं दे सकतीं.

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ऐसा लगता है कि सोनिया की योजना है कि पहले एआईसीसी को अपने वफ़ादारों से भर दिया जाए, कई स्तरों पर वफ़ादरी का इनाम दिया जाए और इसके बाद नए एआईसीसी मुखिया के रूप में राहुल पर सहमति बनाने का काम किया जाए.

ये कुछ विडंबना जैसा लग सकता है कि सोनिया खुद राहुल को खुली छूट देने के विचार की इस आधार पर विरोधी हैं कि नेताओं के प्रति उनकी धुंधली समझदारी के कारण बड़े पैमाने पर छंटाई और संभावित सामूहिक बर्हिगमन की नौबत न आ जाए.

ऐसा लगता है कि सोनिया की नीति आने वाले समय में राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने और उस मौके की तलाश वाली है जिससे कांग्रेस को संगठित रखा जा सके और राहुल की स्थिति को भी मज़बूत बनाए रखा जा सके.

हालांकि ये उम्मीद ज़्यादा है, लेकिन मई 2014 की हार के बाद तीन सालों तक पार्टी को एकजुट रखना उपलब्धि तो है ही.

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