ब्लॉग: क्या होता है भारत में हिंदी मीडियम होने का दर्द?

  • 18 मई 2017
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'गिरते-गिरते उसने मुझे थाम लिया अंग्रेज़ी में...' रंगून फ़िल्म का यह गाना सुनकर मेरे जिज्ञासु मस्तिष्क में सवाल आया, अंग्रेज़ी में क्या अलग तरीके से थामा जाता है?

सवाल का जवाब भी अपने ही दिमाग़ ने दिया, 'थामना ही क्यों, अंग्रेज़ी में हंसना, छींकना, खांसना. सब अलग ही होता है. सब 'सोफ़िस्टिकेटेड', सब 'एलीट' होता है. हिंदी वालों से एकदम अलग. या फिर यूं कहें कि हिंदी वालों के एकदम उलट.

कभी ग़ौर कीजिए, अंग्रेज़ी बोलने वाले लोग छींकते भी हैं तो लगता है कि रेडियो जिंगल बजा और हिंदी वालों के छींकने पर जानमाल का नुकसान भले ही न हो, भूकंप के हल्के झटके ज़रूर महसूस किए जा सकते हैं.

अंग्रेज़ी में कोई झूठ भी बोले तो सच ही लगता है. तभी तो फ़िल्म 'ब्लू अंब्रेला' में पंकज कपूर बड़ी मासूमियत से पूछते हैं, 'अंग्रेज़ी में भी कोई झूठ बोलता है क्या?'

इससे पहले कि आप मुझे जज करें, बता देती हूं कि मैं ख़ुद विशुद्ध हिंदी मीडियम वाली हूं. मैंने छठी क्लास में आकर अंग्रेज़ी की वर्णमाला सीखी क्योंकि यूपी सरकार की मेहरबानी से पांचवीं क्लास तक अंग्रेज़ी विषय हमारे पाठ्यक्रम में शामिल ही नहीं था.

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बड़ी तमन्ना थी कि टाई-वाई लगाकर अमीरों वाले इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ने जाऊं, लेकिन अफ़सोस कि उत्तर प्रदेश के उस छोटे से इलाके में ऐसा कोई स्कूल ही नहीं था. इसलिए तमन्ना अधूरी रह गई.

ख़ैर, पापी पेट के चक्कर में आज अंग्रेज़ीदां लोगों से डील करना पड़ता है और इसलिए हर वक़्त डर के साये में जीती हूं. पता नहीं कब ख़ुदा का कोई नेक बंदा आकर अंग्रेज़ी में बात करना शुरू कर दे.

वैसे, कामचलाऊ इंग्लिश तो सीख ली है क्योंकि जैसे आवश्यकता आविष्कार को जन्म देती है, वैसे ही मजबूरी कुछ भी सिखा देती है. लेकिन अंग्रेज़ी कामचलाऊ है, इसलिए कुछ हादसे नियमित तौर पर होते रहते हैं. जैसे:

  • धांसू अंग्रेज़ी बोलने वाले बंदे को देखते ही नज़रों को यह सोचकर सजदे में झुकाना पड़ता है कि कहीं वह, हेलो... हाऊ आर यू डूइंग... ब्ला-ब्ला न पूछने लगे.
  • फ़ेसबुक पर अंग्रेज़ी में एक वाक्य का स्टेटस लिखने के बाद उसे एडिट करना पड़ता है और दुनिया को पता चल जाता है कि आपसे एक लाइन भी सही नहीं लिखी जाती.
  • बिना सब-टाइटल्स के फ़िल्में देखते वक्त लगता है कि मूक फ़िल्मों वाला ज़माना ही अच्छा था.
  • अंग्रेज़ी अच्छी न हो तो आपकी 'कूलनेस' का स्वत: ह्रास हो जाता है और आप उस बंदे या बंदी से बात करने में भी कतराते हैं, जिसके चक्कर में आपने अंग्रेज़ी के दो-चार नए शब्द सीख लिए हों.
  • जब कोई अंग्रेज़ी में बोलता है तो उसकी बात समझने के लिए बहुत ज़्यादा ज़ोर देना पड़ता है और बीच-बीच में सिर हिलाते हुए 'या, राइट' बोलकर समझने की एक्टिंग भी तो करनी पड़ती है. तब लगता है कि इससे तो अच्छा एनएसडी में एडमिशन ही ले लेते.
  • वैसे आप भले ही कितना भी धाराप्रवाह बोलते हों, अंग्रेज़ी बोलते वक़्त अनायास ही हकलाने लगते हैं. दिमाग़ की सारी सामग्री जैसे सफ़ाचट हो जाती है.
  • सबसे ज़्यादा जलन उन्हें देखकर होती है, जो गिटपिट-गिटपिट अंग्रेज़ी बोलते हुए अचानक भोजपुरी, बांग्ला और मराठी में स्विच कर लेते हैं. स्प्लिट पर्सनैलिटी डिसऑर्डर का शक़ होने लगता है.
  • नेट-जेआरएफ़ या किसी और प्रतियोगी परीक्षा का हिंदी वाला पेपर उठाकर पढ़िए, माथा पीटकर लहूलुहान कर लेंगे और हारकर फ़िर अंग्रेज़ी वाला हल करने लगेंगे.
  • कमाने-खाने के मौके कम हो जाते हैं, ये बताने की ज़रूरत नहीं.

अब इतनी मुसीबतों के बाद भी अग़र लोग कहते हैं कि अंग्रेज़ी से कुछ ख़ास इंप्रेशन नहीं पड़ता, तो समझ लीजिए वो सब मिलकर आपको पागल बना रहे हैं.

आज से कुछ साल पहले दसवीं में 97.6% नंबर लाने वाली गरिमा गोदरा को दिल्ली के एक नामी स्कूल ने इसलिए एडमिशन देने से इनकार कर दिया था क्योंकि उसकी स्पोकेन इंग्लिश स्कूल के 'स्टैंडर्ड' के मुताबिक़ नहीं थी. बाकी, आप समझदार हैं, खुद ही सोच सकते हैं.

फ़िलहाल भारतीय भाषाओं का बाज़ार बढ़ रहा है, तो इन्हें बोलने-लिखने वालों को थोड़ा भाव मिलने लगा है, लेकिन ये भाव भी तभी मिलेगा जब अंग्रेज़ी आती हो.

भारत में अंग्रेज़ी बेशक़ सिर्फ़ एक भाषा नहीं बल्कि 'क्लास' है और इसके अलावा भी बहुत कुछ है.

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इस 'क्लास' से तो आपको मार्क्सवाद भी नहीं बचा सकता. माना कि देश हमारा महान है, लेकिन अभी इतना भी महान नहीं है कि जापानियों और चीनियों की तरह रौला जमा सके. वैसे अंग्रेज़ी जानने वालों की मांग इन देशों में भी है.

इसलिए बेहतर है कि अंग्रेज़ी सीख लीजिए वरना 'फ़रैगो' (कांग्रेस नेता शशि थरूर ने इसका अपने ट्वीट में इस्तेमाल किया था) जैसे शब्द प्रेत की तरह पीछा करते रहेंगे और फ़िर आप भी मेरी तरह हिंदी में ब्लॉग लिखकर अपनी तड़पती हुई आत्मा को शांति पहुंचाने का असफल प्रयास करेंगे.

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