इस लाइब्रेरी में इंसान ही किताब हैं!

  • 24 मई 2017
ह्यूमन लाइब्रेरी

सुजाता ने आज ही एक किताब पढ़ी है. ऐसी किताब, जो रीडर से बात कर सकती है और जिससे रीडर अपने इमोशन शेयर कर सकता है.

इस किताब का नाम है 'ह्यूमन बुक' और आप भी इसे पढ़ सकते हैं. साथ ही अपनी ज़िंदगी के तमाम पहलू और अनुभव आप उससे शेयर कर सकते हैं.

'ह्यूमन बुक' कॉन्सेप्ट आया है ह्यूमन लाइब्रेरी तैयार करने के एक बड़े आइडिया से, जो मूल रूप से एक कार्यक्रम है जिसमें पाठक के तौर पर आए हुए लोग अपनी पसंद की 'किताब' (ह्यूमन बुक) चुनते हैं और उनसे मुख़ातिब होते हैं.

उन्हें ह्यूमन बुक के साथ मुख़ातिब होने के लिए तीस मिनट का वक़्त दिया जाता है.

'ह्यूमन बुक' का चयन उनके किसी ख़ास क्षेत्र में अनुभव होने के आधार पर किया जाता है.

शहरी जीवन में जहां हर वक्त लोग 'अनजाने डर' से घिरे रहते हैं, ऐसे हालात में लोग अपनी अंतरंग भावनाओं को एक अनजान आदमी के साथ शेयर करते हैं.

इस कॉन्सेप्ट में 'अनजान लोगों' का शामिल होना ही इसकी सबसे ख़ास बात है.

कम्यूनिकेशन के छात्र हर्षद फ़ाद के मुताबिक़, 'ह्यूमन बुक' का यह कॉन्सेप्ट कोपेनहेगन से इंदौर होते हुए हैदराबाद पहुंचा है.

हर्षद बताते हैं, "humanlibrary.org डैनिश फेस्टिवल के ज़रिए इस आइडिया को पहली बार भारत लाया था. इसकी शुरुआत हिंसा को रोकने, आपसी संवाद को बढाने और फेस्टिवल में आए लोगों के बीच सकारात्मक रिश्ता कायम करने के साथ हुई. पहला ह्यूमन लाइब्रेरी इवेंट 2016 में इंदौर में हुआ."

हर्षद इस आइडिया को हैदराबाद लेकर आए. अब तक वो और उनके दोस्त मिलकर हैदराबाद में ह्यूमन लाइब्रेरी का दो बार आयोजन कर चुके हैं.

यहां पेश है कुचिपुड़ी डांसर हलीम खान की किताब ह्यूमन बुक का एक अंश:-

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एक दिन मुझे हर्षद का कॉल आया. उन्होंने मेरे सामने ह्यूमन बुक बनने की पेशकश रखी और ह्यूमन लाइब्रेरी की अवधारणा के बारे में बताया.

शुरू में तो मैं काफी चिंतित था क्योंकि कुचिपुड़ी डांस देखने वाले दर्शक चुनिंदा होते हैं.

अगर लोगों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई तो यह मेरे लिए काफी असहज स्थिति होगी.

मैंने सोचा था कि एक डांसर जो कि स्त्री वेश में नृत्य करता है, शायद लोगों को अपनी ओर ना खींच पाए क्योंकि यह कुचिपुड़ी युवाओं में लोकप्रिय नहीं है.

हर्षद और उनके दोस्तों ने मुझे प्रोत्साहित किया और कहा कि मेरे जीवन की कहानी दमदार है और लोग मुझसे जुड़ेंगे.

मैंने सोचा कि ख़ुद को एक मौका देना चाहिए. मैं इवेंट वाले जगह पर पहुंचने के बाद भी वहां कई पेशों से जुड़े लोगों को देखकर उलझन में था.

लेकिन जब मैंने लोगों से बात करना शुरू किया तो बिलकुल ही माहौल बदल गया. लोग मुझसे बात करना चाहते थे. मुझसे जुड़ना चाहते थे.

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यह अलग-अलग अनुभवों और जीवन यात्राओं से गुजरने का अलग ही एहसास था. यह पुरानी यादों को फिर से जीने सा एहसास था.

वहां जाने से पहले की मेरी सारी आशंकाएँ गलत साबित हुई थीं और हर कोई यह जानना चाहता था कि एक कलाकार के तौर पर मुझे क्या चीज़ें प्रभावित करती हैं और मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा कहां से मिलती है.

मैं फिर से इसे करना चाहूंगा क्योंकि यह अपने-आप में एक अनोखा एहसास था.

ह्यूमन लाइब्रेरी एक प्रयास है जिसकी मदद से हम एक मजबूत संवाद के जरिए रूढ़िवादी चीजों को तोड़ते हैं.

एक किताब के तौर पर मेरा शीर्षक था 'ए मैन्स जर्नी टू द एपिटोम ऑफ ग्रेस'.

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एक पुरुषवादी समाज में औरत के रूप में एक मर्द का परफॉर्म करना वाकई में बहुत चुनौती भरा काम है.

लेकिन कुचिपुड़ी में सिर्फ पुरुष ही महिलाओं के किरदार में नृत्य करते हैं. इस परंपरा ने मुझे यह एहसास दिलाया कि कला का कोई जेंडर नहीं होता.

मुझे डांसर बनना है, इसे लेकर मेरे मन में कोई शंका नहीं थी. मुझे इसके लिए समाज के कई तरह के पूर्वाग्रहों से जूझना पड़ा.

लेकिन मेरा जुनून मुझे आगे बढ़ाता रहा. अब जब मैं उन लम्हों को याद करता हूं, जब मैं अपने सपनों को पूरा करने के लिए जी जान से लगा हुआ था तो यह मुझे आनंद से भर देता है.

हर लेखक चाहता है कि पाठक जब उसे पढ़े तो उसके चेहरे पर आने वाले हाव-भाव की एक झलक मिल जाए.

जब मेरे पाठक मुझसे मुखातिब थे, तब मैं उनके चेहरे पर देख सकता था कि वो मेरी कहानी से किस शिद्दत के साथ जुड़ रहे थे. यह मेरे और उनके दोनों के लिए एक शानदार अनुभव था.

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