#BadTouch: मेरे भाई ने ही मेरा यौन शोषण किया

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अतुल कुमार सिंह

#BadTouch सिरीज़ में अब तक लड़कियों ने अपने साथ हुए यौन शोषण की कहानी बताई थी. इस कड़ी में हम आपको आज एक पुरुष से मुखातिब करवा रहे हैं जिसे बचपन में अपनों से ही यौन शोषण का सामना करना पड़ा. इन्होंने अपना नाम नहीं छिपाने का फ़ैसला किया और खुलकर अपनी कहानी बताई. पढ़िए-

मेरा नाम अतुल कुमार है. मैं ये सब पहली बार लिख रहा हूं क्योंकि मैं ख़ुद को अतीत का पीड़ित नहीं मानता. मैं इस बारे में बहुत कम ही बात करता हूं.

लेकिन मुझे लगता है कि अपने बुरे अतीत को जेहन से मिटाने में मुझे कई साल लग गए. बरसों बाद 2016 मे बड़ी हिम्मत से मैंने उसका सामना किया और उसकी आंखों में आंखें डालकर देखा.

वो एक ऐसा शख्स था जिससे मैं डरता था. अगर मुझे पता चलता कि वो मेरे रास्ते में आ रहा है तो मैं अपना रास्ता बदल देता था. अगर वो मेरे घर आता तो मुझे घर में होने पर पछतावा होता था.

मुझे अपने घरवालों के सामने उसका पैर छूना पड़ता था लेकिन मुझे यह ज़रा भी पसंद नहीं था.

'छुपन-छुपाई' का खेल

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एक लड़के की फाइल फोटो

मैं एक संयुक्त परिवार में पला-बढ़ा. मेरे कई कजन्स थे और हम साथ में ख़ूब मस्ती किया करते थे. मेरे परिवार ने मुझे काफ़ी कुछ सिखाया लेकिन सबसे ज़रूरी बात सिखाना भूल गए. मुझे अपनी उम्र तो ठीक से याद नहीं है लेकिन तब मैं इतना छोटा था कि स्कूल भी नहीं जाता था.

मेरे दो चचेरे भाई थे. इनमें से एक हमारे साथ ही रहता था और दूसरा मेरे घर से थोड़ी दूर.

एक बार हम 'भागमभाग' खेल रहे थे और मुझे नहीं पता कि भागमभाग अचानक 'छुपन-छुपाई' में कैसे बदल गया.

मैं और मेरा कजन छत पर बने एक घर में छिपने के लिए घुस गए. वहां एक ठेला था जिस पर चटाई और रजाई रखी थी. हम रजाई में घुसकर छिप गए.

मुझे लगा कि अभी दूसरा कजन आएगा और हम उसे 'धप्पा' बोल देंगे. लेकिन पता नहीं क्यों, वह नहीं आया.

थोड़ी देर बाद मैंने महसूस किया कि मेरा छोटा भाई मुझे अपने नीचे धकेल रहा है...मैंने उसे धक्का देने की कोशिश की लेकिन उसकी मजबूत पकड़ से छूटना आसान नहीं था.

इसके बाद वह मुझे वहां छोड़कर चला गया. मुझे उल्टियां शुरू हो गईं. मेरा चेहरा लाल हो गया था.

थप्पड़ मारकर चुप रहने को कहा

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मैं सीढ़ियों से नीचे आया और ऐसा दिखाने की कोशिश की जैसे मैं ठीक हूं. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मेरे साथ हुआ क्या है.

मैंने अपने परिवार की एक महिला को इस बारे में बताने की कोशिश की तो उसने मुझे थप्पड़ मारा और चुप रहने को कहा. यह मेरे लिए किसी सदमे से कम नहीं था.

ये टॉर्चर यहीं ख़त्म नहीं हुआ. शायद उसने मेरे दूसरे कजन को भी इस बारे में बताया था. क्योंकि कुछ दिनों बाद उसने भी मेरे साथ वैसा ही करने की कोशिश की.

उससे बचना आसान था क्योंकि वह अलग घर में रहता था. लेकिन बड़ा कजन हमारे साथ ही रहता था इसलिए ये सब लंबे वक़्त तक जारी रहा.

एक दिन उसने मेरे कपड़े उतार दिए और मेरे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की. तभी ख़ुशकिस्मती से मेरे अंकल वहां आ गए और उस पर चीखने लगे.

ये भी बताएं कि क्या ग़लत है.

मुझे ठीक से याद नहीं है कि अंकल ने क्या कहा लेकिन उसके बाद से ये रुक गया. इस घटना के बाद से मेरा आत्मविश्वास ख़त्म हो गया और मैंने लोगों पर भरोसा करना छोड़ दिया. मैं घर के बड़ों से बचने की कोशिश करने लगा.

अब मैं अपने गांव से दूर शहरों में रहता हूं. ग्रैजुएशन तक मेरे मन में बचपन के वाकयों का डर समाया रहता था, मैं कमज़ोर पड़ चुका था. फिर मैं ऐसे कई लोगों से मिला और पता चला कि उन्होंने भी ये सब झेला है.

मैं आज ये सब इसलिए लिख रहा हूं ताकि लोगों में जागरूकता फैले. माता-पिता अपने बच्चों को सिर्फ़ अच्छी बातें न सिखाएं, बल्कि ये भी बताएं कि क्या ग़लत है.

(बीबीसी संवाददाता सिन्धुवासिनी से बातचीत पर आधारित)

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