#70YearsofPartition: क्या अंग्रेजों का अत्याचार भूल गए भारतीय?

  • 15 अगस्त 2017
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अँग्रेजी हुकूमत से भारत की आज़ादी के सत्तर साल बाद आज ब्रिटेन भारत के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंधों का इच्छुक है. लेकिन आधुनिक भारतीय पीढ़ी अंग्रेजों के बारे में क्या सोचती है?

भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन के साथ मेरे पूर्वजों के तार जुड़े हैं.

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आमतौर पर मैं इस बारे में बात नहीं करता क्योंकि इसमें गर्व करने जैसी कोई बात नहीं - बल्कि उल्टा ही है.

लेकिन आज जब भारत अपनी आज़ादी की सत्तरवीं सालगिरह मना रहा है, तो इस पारिवारिक संबंध ने मुझे ब्रिटेन के प्रति भारत के जटिल और प्राय: विरोधाभासी रवैये पर सोचने के लिए विवश कर दिया है.

ब्रिटिश सरकार इस विशाल और शक्तिशाली देश के साथ अपने भावी सम्बन्धों को जितना महत्व दे रही है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि आज हमारे बारे में भारत की राय किसी भी दौर से ज़्यादा महत्वपूर्ण है.

थेरेसा मे ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत का चयन बेहद सोच-समझकर किया.

ब्रिटेन ब्रेक्सिट के बाद, अपने सुरक्षित भविष्य के लिए भारत का सहयोग चाहता है. अपने पूर्व उपनिवेश के साथ व्यापारिक सम्बन्धों में ताजगी भरना ब्रिटेन की नई वैश्विक आर्थिक रणनीति का प्रमुख अंग है. लेकिन उनकी उम्मीदों के विपरीत भारत का रवैया ठंडा रहा है जो शायद ठीक भी है.

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अभी-अभी बारिश बंद हुई है और मैं राजनयिक और सांसद शशि थरूर के दक्षिण दिल्ली स्थित विशाल औपनिवेशिक बंगले पर पहुँचता हूँ.

अंग्रेजों का असर

उमस भरी शाम में कीट-पतंगों की भरमार है और कहीं दूर दिल्ली के अनवरत ट्रैफिक का शोर सुनाई दे रहा है.

बगीचे से होते हुए जब मैं संयुक्त राष्ट्र के पूर्व अंडर-जनरल सेक्रेटरी की किताबों से भरी स्टडी में पहुंचा तो उन्होंने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया.

थरूर ने माना कि भारत में अँग्रेजी राज की परम्पराओं ने लाखों अँग्रेजी बोलने वाले भारतीयों के नज़रिये और पसंद को प्रभावित किया है.

वे कहते हैं, "अपने रोज़मर्रा के जीवन में हम जिन चीज़ों को बिलकुल सहजता से लेते हैं - हमारी पसंदीदा किताबें, भोजन करने के हमारे तौर-तरीके, हमारी वेशभूषा, हमारी आदतें और तहज़ीब - उनमें से बहुत कुछ उपनिवेशवाद, ब्रिटिश संस्थाओं और अंग्रेजी भाषा की देन है".

Image caption बीबीसी संवाददाता जस्टिन रॉलेट अपने परदादा सिडनी रॉलेट की तस्वीर के साथ

मसलन, अधिकांश भारतीय राष्ट्रवादी नेता पी.जी. वुडहाउस को पढ़ना, क्रिकेट खेलना और देखना पसंद करते थे.

शरारती मुस्कान के साथ थरूर कहते हैं, "वास्तव में, क्रिकेट का खेल और इसमें अंग्रेजों को हराना भारतीय राष्ट्रवाद का एक रूपक बन गया था."

चाय के शानदार स्वाद से भारतीयों को परिचित कराने के लिए वे अंग्रेजों की तारीफ़ करते हुए कहते हैं, "चाय अब हर लिहाज से भारत का राष्ट्रीय पेय है."

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इन सबके बावजूद, शशि थरूर ब्रिटेन की साम्राज्यवादी विरासत के आज शायद सबसे कटु आलोचक हैं.

2015 में ऑक्सफोर्ड यूनियन में भाषण देते हुए उन्होंने कहा कि ब्रिटेन को औपनिवेशिक राज के दौरान भारत को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति करनी चाहिए. उनके इस भाषण ने सोशल मीडिया में सनसनी मचा दी.

उपनिवेशवाद की भयावहता

इस भाषण को चालीस लाख बार ऑनलाइन देखा गया, ब्रिटिश मीडिया और भारतीय मीडिया में व्यापक बहस शुरू हुई और उनके राजनीतिक विरोधी - भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनकी तारीफ़ की.

इस भाषण का असर इतना ज़बरदस्त रहा कि शशि थरूर ने Inglorious Empire नाम से एक पुस्तक लिखी जो इसी वर्ष ब्रिटेन में प्रकाशित हुई.

वे कहते हैं, "आज की भारतीय पीढ़ी को उपनिवेशवाद की भयावहता को समझाने की नैतिक मजबूरी ने मुझे यह किताब लिखने पर बाध्य किया."

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इसमें कोई शक नहीं कि ब्रिटिश साम्राज्य की ज़्यादतियों और क्रूरता के प्रति भारतीयों में ग़ुस्सा और नाराजगी है.

लेकिन सच यह भी है कि आज अंग्रेजों के बैरभाव रखने वाले भारतीय बेहद कम है.

रॉलेट एक्ट का असर

और यह ऐतिहासिक सच्चाई है कि ब्रिटिश औपनिवेशिक इतिहास के सबसे दमनकारी अत्याचारों की वजह मेरे परदादा द्वारा निर्मित और उनके नाम से प्रसिद्ध क़ानून था.

इस क़ानून को रॉलेट एक्ट के नाम से जाना जाता है और 13 अप्रैल 1919 को नृशंस जलियाँवाला बाग हत्याकांड की वजह यही क़ानून था.

महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के ख़िलाफ़ ही अपने पहले अहिंसक सत्याग्रह की शुरुआत की थी. तब तक उनका शुमार भारतीय राष्ट्रीय नेताओं की अग्रणी पंक्ति में नहीं हुआ था.

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इस क़ानून के तहत साम्राज्य के खिलाफ षड्यंत्र के महज शक के आधार पर नागरिक अधिकारों को छीन लेने का प्रावधान था

और, इसके मायने ये थे कि किसी राजद्रोही अख़बार की एक प्रति रखने पर भी बिना किसी मुक़दमे के दो साल की सजा हो सकती थी.

इसी क़ानून का विरोध करने के लिए गांधी के आह्वान पर हजारों भारतीय 13 अप्रैल 1919 को चहारदीवारी से घिरे जलियाँवाला बाग में जमा हुए. उद्देश्य था, मेरे परदादा सिडनी रॉलेट के बनाए इस क़ानून के खिलाफ अपने क्षोभ और ग़ुस्से की अभिव्यक्ति.

आज लगभग एक सदी बाद भी यह अमृतसर की उस बेहद शर्मनाक और क्रूर घटना को याद रखना ज़रूरी है. मैं पिछले हफ़्ते पहली बार जलियाँवाला बाग गया. इस अनुभव ने मुझे हिलाकर रख दिया.

जलियाँवाला बाग बोर्ड के चेयरमैन एस. के. मुखर्जी मुझे एक सँकरे रास्ते से बाग में ले गए.

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इसी रास्ते से ब्रिटिश फौज का कमांडर ब्रिगेडियर जनरल डायर अपने सैनिकों के साथ बाग में पहुंचा.

श्री मुखर्जी ने कहा कि नरसंहार के दिन उनके दादाजी वहाँ मौजूद थे और वे बताया करते थे कि सैनिकों ने दो अर्द्धवृत्ताकार घेरे बनाकर बाहर जाने के एकमात्र मार्ग को अवरुद्ध कर दिया और निर्दोष भीड़ को निशाना बनाने लगे.

डायर और उसके सैनिकों ने बिना किसी चेतावनी के गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. षष्टी चरण मुखर्जी एक मंच के पीछे छुप गए और वे गोलियों से बच गए.

10 मिनट तक चली गोलियां

उन्होंने बाद में बताया कि कैसे सिपाहियों ने आंदोलनकारियों को सीधा निशाना बनाया था. वे 10 मिनट तक गोलियां बरसाते रहे, 1650 राउंड गोलियां चलीं और 379 लोग मार डाले गए (गैर-सरकारी भारतीय स्रोतों के मुताबिक मृतकों की संख्या कहीं अधिक थी).

इस नरसंहार में 1137 लोग घायल हुए. षष्टी चरण मुखर्जी के पोते ने मुझे वह कुआं भी दिखाया जहां कई लोग अपनी जान बचाने के लिए कूद गए थे. बाद में कुएं से 120 शव निकाले गए.

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जब हम बाग की ओर वापस मुड़े तो श्री मुखर्जी ने कहा कि उनके दादाजी को याद था कि सैनिकों की गोलियां लगभग ख़त्म हो चुकीं थीं, तभी जनरल डायर ने सैन्य टुकड़ियों को गोलीबारी बंद करने और वापस लौटने का हुक्म दिया.

उन्होंने घायलों की कोई मदद नहीं की. उसके बाद डायर ने कर्फ़्यू लगा दिया और सड़क पर किसी भी भारतीय को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया.

घायल ज़मीन पर पड़े पीड़ा में कराहते रहे. मुझे हैरानी थी क्योंकि उनके मन में मेरे प्रति कोई दुर्भावना नहीं थी. उन्होंने कहा, "आप शर्मिंदा हैं. इसलिए मैं आपसे नाराज नहीं हूँ."

सबसे निर्णायक मोड़

तो इस सब से ब्रिटेन के प्रति भारत के रवैये के बारे में हमें क्या पता चलता है? अमृतसर का नरसंहार भारत के इतिहास में एक प्रमुख निर्णायक मोड़ था.

इतिहासकर एजेपी टेलर के मुताबिक, "यह वह निर्णायक मोड़ था जिसने भारतीयों को ब्रिटिश राज से विमुख कर दिया."

नतीजतन, भारत के सभी स्कूलों में रौलेट एक्ट और स्वतन्त्रता आंदोलन में इसकी भूमिका, इतिहास के पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग है.

करोड़ों भारतीय विद्यार्थियों द्वारा पढ़ी जाने वाली पाठ्य-पुस्तक के मुताबिक, रॉलेट सत्याग्रह ने ही गांधीजी को सच्चे अर्थों में राष्ट्रीय नेता बना दिया.

ढाई वर्ष पहले जब मैं अपनी पत्नी और बच्चों के साथ भारत आया तो मुझे चिंता थी कि हमारा पारिवारिक नाम कहीं मेरे लिए मुश्किलें तो पैदा नहीं करेगा.

मैं चिंतित था कि क्या साम्राज्यवादी बुराई के एक प्रतीक का वंशज होना, बीबीसी के दक्षिण एशियाई संवाददाता के रूप में मेरी भूमिका के निर्वाहन में बाधक तो नहीं होगा.

लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कभी भी नहीं. मुझे कभी भी ग़ुस्से या नाराजगी तक का सामना नहीं करना पड़ा.

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जब मैं दिल्ली में महात्मा गांधी के पड़पोते तुषार गांधी से मिला तो उन्होंने इसकी एक सशक्त व्याख्या दी.

उन्होंने मेरे प्रति दुश्मनी नहीं आभार जताया. मुझसे मुस्कराकर हाथ मिलाते हुए तुषार ने कहा, "ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में पहली कील ठोकने के लिए मैं आपके परदादा का शुक्रगुजार हूँ."

उन्होंने बताया कि मेरे परदादा द्वारा बनाया गया क़ानून महात्मा गांधी के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

गांधी ने किया क़ानून का इस्तेमाल

तुषार के मुताबिक,"रॉलेट क़ानून की खासियत यह थी कि महात्मा गांधी को लोगों को यह समझाने के लिए कोई मशक्कत नहीं करनी पड़ी कि यह क़ानून कितना अन्यायपूर्ण है'.

"यह क़ानून इतना दुर्भावनापूर्ण था कि महात्मा गांधी आसानी से इसका इस्तेमाल कर लोगों में ग़ुस्सा और नाराजगी पैदा करने और फिर इस ग़ुस्से को अहिंसक आंदोलन में तब्दील करने में सफल रहे."

तुषार के मुताबिक अंग्रेजों के ख़िलाफ़ भारतीयों का अहिंसक विरोध ही वह वजह है जिसके चलते दोनों राष्ट्रों के बीच अधिक नाराजगी और ग़ुस्सा नहीं है.

वह कहते हैं, "इसके चलते भारतीयों ने माना कि हमनें आज़ादी हासिल की है. और अंग्रेज ख़ुद को यह कहकर सांत्वना दे पाए कि उन्होंने भारत को स्वतंत्र कर उदारता का परिचय दिया है." लेकिन क्या दोनों मुल्कों के बीच शत्रुता न होने की असल वजह यही है?

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जब मैंने शशि थरूर से यह सवाल किया तो उनका जवाब था, "कहा जाता है कि जब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से विंस्टन चर्चिल ने पूछा कि अंग्रेजों के हाथों इतने साल कैद की सजा भुगतने के बाद भी उनके मन में अंग्रेजों के लिए कोई कड़वाहट क्यों नहीं है तो नेहरू का जवाब था, "क्योंकि मुझे एक महान व्यक्ति महात्मा गांधी ने सिखाया था कि न कभी डरो और न ही कभी किसी से नफ़रत करो."

थरूर कहते हैं, "काश यही सम्पूर्ण वजह होती लेकिन एक और वजह भी है जो इतनी काबिले-तारीफ नहीं है और वह यह कि हम भारतीय भूलते बहुत जल्दी हैं और इसीलिए अंग्रेजों को माफ़ करना और भूलना मुमकिन हो पाया.

आज़ादी के 70 साल

"मेरा मानना है कि हमें क्षमाशील होना चाहिए क्योंकि नफ़रत बहुत दुखदायी होती है. लेकिन भूलने की प्रवृत्ति अक्षम्य है. हम अतीत को न भूलें, उसके बारे में जानें लेकिन उसे अतीत ही रहने दें".

और इस संदर्भ में भारत की आज़ादी और विभाजन के 70 वर्ष पूरे होने पर भारत और ब्रिटेन में इसकी रिपोर्टिंग की तुलना करना बेहद रोचक होगा. भारत में, यह बहुत बड़ी ख़बर नहीं है.

हाँ, इस दिन प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली स्थित लालक़िले की प्राचीर से देश को संबोधित करेंगे. आज़ादी के 70 वर्षों में देश के हालात के बारे में समाचारपत्रों में लेख भी छपे हैं, टीवी पर चर्चाएँ हुईं हैं लेकिन जिस पैमाने पर ब्रिटेन में इस ख़बर की कवरेज हो रही है, उसके मुक़ाबले यह कुछ भी नहीं है.

इस अवसर पर ब्रिटिश अखबारों और टेलीविजन कार्यक्रमों में बड़े-बड़े फीचर और विशेष सामग्री प्रकाशित-प्रसारित हो रही है. बीबीसी और अन्य रेडियो-टीवी चैनलों पर कई वृत्तचित्र और नाटक दिखाए जाएंगे. यहाँ तक कि एक फ़िल्म भी बनी है.

"ऐसा नहीं कि भारत अपना अतीत भूल गया हो, हर दिन तकरीबन 50,000 लोग जलियाँवाला बाग जाते हैं - बात बस इतनी है कि ब्रिटिश साम्राज्य का अंत भारत से ज़्यादा बड़ी ख़बर ब्रिटेन के लिए है".

और मुझे इसका भरोसा नहीं कि भारत की आज़ादी को मनाने की ब्रिटिश चाहत पूरी तरह सद्भावनापूर्ण है? लगता है कि इसकी एक वजह आत्मालोचना है.

औपनिवेशिक शासन के अत्याचारों पर हमें शर्मिंदगी तो होती है, पर साथ ही ऐसे आयोजन हमें अपने उस अतीत का भी स्मरण कराते हैं जब हम महाशक्ति थे.

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Image caption ब्रिटिश नेता पॉवेल

ब्रिटेन के बारे में भारतीय युवाओं की राय जानने के लिए जब मैंने दिल्ली के एमिटी इन्टरनेशनल स्कूल के 16-17 साल के बच्चों से पूछा कि दोनों देशों में अधिक शक्तिशाली कौन है, तो एक के अलावा बाकी सभी बच्चों का उत्तर था, "भारत."

यह जवाब अंधराष्ट्रवाद की उपज नहीं था, अपनी बात को सही साबित करने के लिए उनके पास ठोस तर्क थे. "हमारी अर्थव्यवस्था की विकास दर अधिक है" सार्थक सहगल ने कहा.

दोहा खान ने ऐतिहासिक साक्ष्यों का हवाला देते हुए कहा, "जब अंग्रेज़ भारत आए तो वैश्विक जीडीपी में भारत का योगदान 22% था और जब वे यहाँ से गए वैश्विक जीडीपी में भारत का हिस्सा 4% रह गया."

"तो कहना ही होगा कि उस समय भी भारत, ब्रिटेन के लिए अधिक महत्वपूर्ण था, न कि ब्रिटेन, भारत के लिए". एक अन्य छात्रा भारत की आबादी का हवाला देती है.

"भारत की आबादी विश्व में दूसरे स्थान पर है तो संख्या के लिहाज से भी भारत अधिक शक्तिशाली है." वह कहती है, "हम युवा हैं और हमारे विचार महान हैं" यह सुन उसके साथी खिलखिलाने लगते हैं.

स्वपन दासगुप्ता भी किशोरों के तर्क से सहमत हैं. वह भारतीय संसद के उच्च सदन यानी राज्य सभा के सदस्य हैं, वरिष्ठ पत्रकार हैं और सत्तापक्ष के कई दिग्गजों से उनके घनिष्ठ संबंध हैं.

लेकिन ब्रिटेन के प्रति भारतीयों के रवैये को समझाने के लिए वह जिस शख्सियत का ज़िक्र करते हैं, वह चौकाने वाला है, वह ज़िक्र करते हैं पावेल का .

पूर्व ब्रिटिश मंत्री पावेल ने चेतावनी दी थी कि अगर पूर्व उपनिवेशों के प्रवासियों के ब्रिटेन आने पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया तो ब्रिटेन की सड़कों पर खून की नदियां बहेंगी.

दासगुप्ता के मुताबिक पावेल को भारत से प्रेम था और वे कभी यहाँ के वाइसराय बनना चाहते थे. एक निजी बातचीत का हवाला देते हुए दासगुप्ता कहते हैं कि पावेल के मुताबिक भारत और ब्रिटेन के सम्बन्धों में पारस्परिक आसक्ति है.

शुरुआत में नफ़रत ज़्यादा थी

स्वपन का मानना है, "दोनों देशों के संबंध कभी सर्द तो कभी गर्म रहे हैं. शुरुआत में हमारे बीच नफ़रत ज़्यादा थी. बाद में दोनों देशों के बीच प्रेम भी बहुत पनपा, लेकिन चिंताजनक बात यह है कि अब सम्बन्धों में बेगानापन आने लगा है."

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उनका मानना है, "आज मध्यमवर्गीय भारतीय ब्रिटेन के बजाय अमेरिका से ज़्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं." अब अधिकाधिक भारतीय अमेरिका पढ़ने जाते हैं और भारत में अमेरिका की लोकप्रिय संस्कृति का प्रभाव भी बढ़ा है.

उनका विश्लेषण है, "बीटल्स और रोलिंग स्टोन्स के बाद ब्रिटेन की संस्कृति का प्रभाव अब डाउनटाउन एबे और अपस्टेयर्स - डाउन स्टेयर्स जैसे टीवी धारावाहिकों तक ही रह गया है".

असल में, भारत पर ब्रिटिश प्रभाव में आई कमी दुनिया भर में ब्रिटेन के प्रभाव में आई कमी का ही एक प्रतीक है. थरूर की ही तरह दासगुप्ता भी भारत और ब्रिटेन के बदलते सम्बन्धों को समझाने के लिए क्रिकेट का उदाहरण देते हैं.

आज़ादी हासिल करने के पाँच साल के भीतर ही, भारत ने 1952 में इंग्लैंड को एक पारी और आठ रन से हराते हुए मद्रास में अपना पहला टेस्ट मैच जीत लिया.

क्रिकेट से नाता

और, उनका मानना है कि अब क्रिकेट पर हम पूरी तरह कब्जा जमा चुके हैं. दासगुप्ता कहते हैं, "क्रिकेट एक भारतीय खेल है जिसका इज़ाद इंग्लैंड में हुआ."

"इसमें कोई शक नहीं कि क्रिकेट की अर्थव्यवस्था पर आज भारतीयों का नियंत्रण है. खेल से जुड़ा सारा पैसा भारत में है."

और जो बात क्रिकेट के बारे में सच है, मोटे तौर पर वही बात भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में भी सच है.

प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत आज भी ग़रीब है, लेकिन ब्रिटेन के साथ व्यापारिक रिश्तों के लिहाज से हालात निर्णायक रूप से बदल चुके है.

1.25 अरब की आबादी के चलते अपने विशाल बाज़ार और 7% की मजबूत विकास दर के साथ, आज भारत एक ताक़तवर देश है.

2016 में भारत और ब्रिटेन के बीच कारोबार में 4.7 बिलियन डॉलर का व्यापारिक संतुलन भारत के पक्ष में था.

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बदलते आर्थिक सम्बन्धों की जड़ें बेहद गहरी हैं. जब 19वीं सदी के उत्तरार्ध में दूरद्रष्टा उद्यमी जमशेदजी टाटा आयरन एंड स्टील वर्क्स की योजना बना रहे थे जो उनके विचार से भारत के औद्योगीकरण की रीढ़ साबित होता तो उन्होंने अपनी इस परिकल्पना को लंदन की वित्तीय कंपनियों से साझा किया.

लेकिन कोई भी उनकी इस योजना में निवेश का इच्छुक नहीं था. 1921 में टाइम्स अखबार में खबर छपी" भारतीय जनता के सामने आखिरी उपाय के रूप में आयरन एंड स्टील वर्क्स की पेशकश की गई और आश्चर्यजनक रूप से कुछ ही दिनों में परियोजना के लिए ज़रूरी राशि जुटा ली गई.

बदल गया इतिहास

पिछ्ली सदी में टाटा ने इतिहास पूरी तरह बदल दिया है. जगुआर लैंड रोवर और कोरस स्टील की मालिक टाटा कंपनी आज ब्रिटेन के उद्योग जगत में सबसे ज़्यादा नौकरियाँ देने वाली कंपनी है.

और, न केवल ब्रिटेन की सर्वाधिक पसंदीदा कार टाटा की है, बल्कि वहाँ के राष्ट्रीय पेय चाय पर भी इसकी मज़बूत पकड़ है. टाटा का टेटले ब्रिटेन का सबसे बड़ा चाय ब्रांड है.

शशि थरूर कारोबार के विषय में कहते हैं, "अंग्रेजों द्वारा की गयी ज़्यादतियों पर क्रोधित होने और प्रतिशोध लेने की ज़रूरत नहीं. कालचक्र के हाथों हमें प्रतिशोध मिल गया है. ब्रेक्जिट के बाद अपनी अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए भारतीय कारोबारियों और निवेशकों से मदद मांगने के लिए थेरेसा मे को भारत आते देखना, मेरे विचार से सबसे सही प्रतिशोध है."

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि भारत आकर श्रीमति मे अपना समय बर्बाद कर रही हैं. दासगुप्ता मानते हैं कि औपनिवेशिक गुलामी का इतिहास आज भी भारत में ग़ुस्से और नाराज़गी का सबब है. लेकिन भारतीय व्यावहारिक लोग होते हैं.

भारतीयों की सोच है कि इतिहास में ख़राब दौर भी रहे हैं लेकिन सवाल यह है कि अब हम उनसे कैसे उबरें और निपटें? हमारे लिए इसमें क्या फ़ायदा है? जब तक यह अतिशय व्यावहारिकता हममें मौजूद है, ब्रिटेन के साथ हम कारोबार कर सकते हैं.

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अंग्रेजों ने 70 वर्ष पहले जैसा भारत छोड़ा था, उसके मुक़ाबले भारत अब बहुत बदल गया है. आज भारत ब्रिटेन के बजाय चीन और अमेरिका के साथ कारोबार करने का ज़्यादा इच्छुक है.

भारतवासियों के मन में ब्रिटेन और ब्रिटिश लोगों के लिए एक ख़ास जगह है. अंग्रेजी सत्ता की ज़्यादतियाँ भुलाई तो नहीं जा सकतीं, लेकिन ज़्यादातर उन्हें माफ़ कर दिया गया है.

दासगुप्ता इस बदलाव का लब्बोलुआब कुछ यूं बयां करते हैं, "हर लिहाज से क्रिकेट अब एक भारतीय खेल है, मगर लॉर्ड्स के मैदान पर इंग्लैंड को हराने का मज़ा ही कुछ और है".

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