बिहारः बाढ़ से पहले गांव था सहरसा में, अब सुपौल में

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वर्ष 2008 के बाद इस साल फिर कोसी नदी की बाढ़ ने भारी तबाही मचायी. उत्तर बिहार के सुपौल जिले में लाखों लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं.

इनमें सबसे मुश्किल जिंदगी है कोसी तटबंधों के बीच बसर करने वाले उन लोगों की, जिन्हें बाढ़ के समय ऊँची जगहों पर शरण लेनी पड़ती है और हर दूसरे-तीसरे साल नयी जगह बसना पड़ता है.

ये लोग पानी उतरने का इंतजार करते हैं और नदी के बीच निकलने वाले छोटे- बड़े टापुओं पर बस कर फिर खेती करने में लग जाते हैं.

कोसी पर बने पूर्वी और पश्चिमी तटबंधों ने इनकी किस्मत में बार-बार उजड़ना-बसना लिख दिया है.

सुपौल जिले के कोसी नदी के बीचो-बीच बसा मनाटोला खोखनाहा ऐसा ही एक गाँव है.

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बाढ़ ने तीन बार बदल दिया गांव का पता

गाँव के श्रीप्रसाद सिंह को 60 साल की उम्र में 16 बार अपना घर नयी जगह पर बसाना पड़ा. उनका जन्म स्थान इस समय कोसी नदी में डूबा हुआ है.

वे बताते हैं, "हम पश्चिम दिशा से पूरब की ओर चले आ रहे हैं. मेरा गाँव पहले सहरसा जिले में पड़ता था. उसके बाद गाँव मरौना प्रखंड में आया और फिलहाल हम किशनपुर प्रखंड, सुपौल जिले में हैं."

इसी गाँव के ही रहने वाले करीब 80 साल के बुज़ुर्ग राम कृष्ण प्रसाद यादव बताते हैं कि वो अब तक नौ बार उजड़ और बस चुके हैं.

उन्होंने बताया, "मैं सबसे अधिक समय 13 साल (2003 से 2016) एक जगह और एक घर में रह सका हूँ."

नदी की मुख्यधारा के बीच बसे मनाटोला खोखानाहा गाँव में लगभग 10 एकड़ के टापू पर गेहूं और धान की फसलें उगाकर बसर करने वाले 500 से ज्यादा परिवारों के लगभग पुरुष दिल्ली-पंजाब में मज़दूरी करते हैं.

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मानवीय गतिविधियां भी हैं बाढ़ की वजह

बूढ़ों, बच्चों और महिलाओं को अक्सर बाढ़ की मुसीबतें अकेले ही काटनी पड़ती है.

दरअसल, 1954 में कोसी पर बने पूर्वी- पश्चिमी तटबंधों ने कोसी का मूल प्रवाह बदल दिया.

पहले यह नदी वीरपुर- छातापुर होते हुए गुजरती थी.

तटबंध बनने के बाद कोसी सहरसा- खगड़िया जिलों से होकर बहती है.

वर्ष 1962 में कोसी पर बराज बनाया गया तो 2006 में पश्चिमी तटबंध के समानांतर एक और तटबंध बनाकर कोसी की चौड़ाई करीब 22 किलोमीटर से घटाकर मात्र सात किलोमीटर कर दी गयी.

कोसी के साथ हुए इन मानवीय हस्तक्षेपों ने इस क्षेत्र की बड़ी आबादी को स्थायी संकट में डाल दिया.

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विस्थापित, जो कभी बसाये नहीं गए

नदी की मूलधारा को बदलने का मकसद चाहे जो भी रहा हो, लेकिन इसके लिए जिन लोगों को अपनी मूल जमीन से हटाया गया, उनका न्यायसंगत पुनर्वास आज तक नहीं हो सका.

सरकार ने विस्थापितों को जहाँ जमीन दी, वहां दबंगों ने उन्हें बसने नहीं दिया और जहाँ इनका मूल गाँव था, वह कोसी के गर्भ में समा गया है.

मनाटोला खोखनाहा गाँव हर साल बाढ़ का पानी उतरने के बाद नयी जमीन और नयी शक्ल में उभरता है.

अगली बाढ़ में उजड़ने तक लोग फिर यहाँ चले आते हैं.

इस त्रासदी का कोई अंत नहीं है.

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