तीन तलाक़ः सुप्रीम कोर्ट के किस जज ने क्या कहा

  • 23 अगस्त 2017
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सुप्रीम कोर्ट ने 'एक साथ, एक बार में तीन तलाक़' को असंवैधानिक करार दे दिया है.

मंगलवार को पांच सदस्यी बेंच ने इस मामले में अपना फ़ैसला सुनाया. तीन जज ने तीन तलाक़ को असंवैधानिक बताया तो दो इसके पक्ष में थे.

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जस्टिस कुरियन जोसेफ़, यूयू ललित और आरएफ़ नरीमन ने जहां तीन तलाक़ को असंवैधानिक माना, वहीं मुख्य न्यायाधीश जस्टिस खेहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर इससे सहमत नहीं थे.

सभी पांचों जज ने फ़ैसले में क्या कहा, संक्षेप में जानिए-

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Image caption जस्टिस जेएस खेहर

चीफ़ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर (अल्पमत का फैसला, जिसे लिखा जस्टिस खेहर ने)

हमलोग संतुष्ट हैं कि इस मामले में अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट अपने विवेक के आधार पर उपयुक्त निर्देश जारी कर सकता है.

हम भारतीय संघ को आदेश देते हैं कि वह तलाक़-ए-बिद्दत के मामले में उचित क़ानून लाने पर विचार करे.

हम यह उम्मीद और आशा करते हैं कि ऐसे क़ानून में मुस्लिम पर्सनल ल़ॉ का ख़्याल रखा जाएगा. जैसा कि दुनिया के दूसरे इस्लामिक देशों में भी किया गया है.

जब ब्रिटिश शासकों ने भारत में मुस्लिम समाज की बेहतरी के लिए क़ानून दिया और इन सुधारात्मक उपायों को मुसलमान समुदाय ने स्वीकार किया है तो हमें नहीं लगता कि आज़ाद भारत को इसमें पीछे रहना चाहिए.

देश में सिर्फ मुसलमानों के लिए ही नहीं, अन्य धार्मिक संप्रदायों के लिए भी उपाय अपनाए गए हैं.

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इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर हम विधायिका से अपने विचार प्रदान करने की अपेक्षा करते हैं.

हम देश के विभिन्न राजनीतिक पार्टियों से भी अपील करते हैं कि इस मुद्दे पर विचार करते वक्त अपनी राजनैतिक हित को दूर रखें.

जब तक यह विचार हो, हम मुस्लिम पतियों द्वारा तीन तलाक़ कहे जाने पर रोक लगाते हैं.

यह पहले छह महीने के लिए लागू होगा. अगर छह महीने से पहले नये क़ानून पर विचार कर लिया जाता है और तलाक़-ए-बिद्दत (एक बार, एक ही समय में तीन बार तलाक़ कहना) मामले में एक सकारात्मक फ़ैसला लिया जाता है तो यह प्रतिबंध खत्म हो जाएगा.

अगर तय समय में फ़ैसला नहीं होता है तो प्रतिबंध जारी रहेगा.

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जस्टिस कुरियन जोसेफ़ (बहुमत)

धर्मशास्त्र में जो ग़लत है वो क़ानून के हिसाब से सही हो सकता है, लेकिन शरियत को पर्सनल लॉ घोषित किए जाने के बाद, अब मुद्दा ये है कि क्या क़ुरान के हिसाब से जो ग़लत है, वो क़ानूनी तौर पर सही हो सकता है.

इसलिए, इस मामले में एक बहुत ही साधारण प्रश्न है जिसका उत्तर देना ज़रूरी है कि क्या तीन तलाक़ क़ानूनी रूप से वैध है.

इस कोर्ट ने शमीम आरा बनाम यूपी सरकार और अन्य मामले में तीन तलाक़ की क़ानूनी वैधता पर सवाल उठाए हैं. इसलिए अनुच्छेद 141 के संदर्भ में शमीम आरा का मामला पूरे भारत पर लागू होता है.

मैं क़ाबिल मुख्य न्यायधीश से थोड़ा असहमत हूं कि तीन तलाक़ के चलन को उस धार्मिक समूह और इसी के साथ उससे जुड़े पर्सनल लॉ के हिस्से के रूप में देखा जाए, जिस पर सवाल खड़ा हो रहा है.

संविधान ने लोगों को अपने धर्म के अनुसार जीने का मौलिक अधिकार दिया है. लेकिन संविधान के तहत अगर ये अनुच्छेद 25 (2) के तहत संविधान अनुच्छेद 25 (1) के तहत प्रदत्त आज़ादी के अधिकार को छोड़कर राज्य को क़ानून बनाने का अधिकार है.

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हालांकि, तीन तलाक़ को धार्मिक परम्परा का अभिन्न हिस्सा मानने के बयान से मैं विनम्रता के साथ असहमत हूं.

केवल इसलिए कि सिर्फ इसलिए कि यह प्रथा लंबे समय से चली आ रही है, इसे वैध नहीं ठहराया जा सकता. 1937 के अधिनियम का उद्देश्य शरीयत को फ़ैसले के नियम के रूप में घोषित करना और धारा 2 में निहित विषयों के संबंध में गैर-शरीयत प्रथाओं को बंद करना था, जिसमें तलाक़ शामिल है.

इसलिए, किसी भी सूरत में, 1937 के अधिनियम के लागू होने के बाद क़ुरान के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ किसी भी परम्परा की अनुमति नहीं दी जाएगी.

इसलिए, ऐसे चलन के लिए कोई संवैधानिक संरक्षण नहीं हो सकता और इस प्रकार तीन तलाक़ दिए गए संवैधानिक वैधता पर मुख्य न्यायधीश से मेरी असहमति है.

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जस्टिस आरएफ़ नरीमन और यूयू ललित (फ़ैसले का मुख्य हिस्सा आरएफ़ नरीमन ने लिखा)

तीन तलाक़ तत्काल प्रभाव से लागू होता है और उसे बदला नहीं जा सकता, इस तथ्य को जानते हुए पति और पत्नी के बीच परिवार की ओर से सुलह कराने की कोशिश भी नहीं हो पाती है.

इसके अलावा, जैसा कि राशिद अहमद मामले में प्रिवी कौंसिल के द्वारा समझा गया है, बिना किसी उचित कारण के ऐसे तीन तलाक़ भी मान्य हैं, जो शमीम आरा मामले के बाद क़ानून की नज़र में अब अच्छा नहीं लगता.

स्पष्ट है कि तलाक़ का यह रूप मनमाना है कि वैवाहिक बंधन को लापरवाही और सनकी अंदाज में मुस्लिम व्यक्ति द्वारा सुलह की कोई कोशिश किए बगैर तोड़ दिया जाता है.

इसलिए, तलाक़ के इस रूप को संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मौलिक अधिकारों का हनन माना जाना चाहिए.

अब जबकि हमने 1937 के अधिनियम की धारा 2 को तय मानकों के तहत असंवैधानिक घोषित कर दिया है, हमें इस मामले में भेदभाव के आधारत पर जाने की ज़रूरत नहीं है, जैसा कि अटॉर्नी जनरल और जो उनका समर्थन कर रहे हैं, की दलील है.

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