विवेचना: 'इंदिरा को हमेशा के लिए प्रेसिडेंट बनाना चाहते थे बंसी लाल'

  • 28 अगस्त 2017
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बंसी लाल को जहाँ हरियाणा के गाँव-गाँव में पानी, बिजली और सड़क पहुंचाने के लिए 'विकास पुरुष' कहा जाता था, वहीं उन पर लोकतांत्रिक परंपराओं को दरकिनार कर शासन में मनमानी करने के आरोप भी लगे थे.

अपने अक्खड़पन, रूखे व्यवहार और सख़्त लहजे के लिए मशहूर बंसीलाल का कोई मानवीय पक्ष भी हो सकता था, इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था. एक बार जब वो हरियाणा के मुख्यमंत्री थे, वो सड़क मार्ग से चंडीगढ़ से दिल्ली आ रहे थे. उनके साथ उनके प्रधान सचिव और बाद में संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य बने एस के मिश्रा भी उनके साथ कार में थे.

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Image caption तत्कालीन रेल मंत्री बंसी लाल को चेक सौंपते सार्वजनिक उपक्रम इरकॉन के चेयरमैन, तस्वीर 8 फरवरी, 1985 की है

हरियाणा का विकास पुरुष

एस के मिश्रा याद करते हैं, 'जब हम अंबाला के पास पहुंचे तो हमारी कार सड़क पर लेटी हुई एक बूढ़ी महिला ने रोक ली. वो ज़ारों कतार रो रही थी. कारण पूछने पर पता चला कि उसके बेटे को फाँसी की सज़ा हो गई है और उसकी दया याचिका अस्वीकार कर दी गई है. दो दिनों में उसे फांसी दी जानी है. बंसी लाल इस मामले में कुछ ख़ास नहीं कर सकते थे. इसलिए उन्होंने कार को आगे बढ़ाने का आदेश दिया. मुझे देख कर बहुत आश्चर्य हुआ कि बंसी लाल की आँखें भरी हुई थीं. वो मुझसे बोले, उस लड़के ने चाहे जितना जघन्य अपराध किया हो, लेकिन माँ के लिए तो वो उसका बेटा ही है. अगले दिन अख़बारों में छपा कि वो लड़का जेल से भाग निकला है. मैं ये बात पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि ये मात्र संयोग नही था. मैंने इस बारे में बंसी लाल से कभी नहीं पूछा और न ही बंसी लाल ने मुझसे कभी इसका ज़िक्र किया.'

बंसीलाल के बारे में मशहूर था कि वो कभी एक जगह पर चैन से नहीं बैठ सकते थे और महीने में 25 दिन हरियाणा की अलग अलग जगहों का दौरा किया करते थे. गाँव-गाँव में पानी, बिजली और सड़क पहुंचाने के लिए उन्हें हरियाणा का विकास पुरुष भी कहा जाता है. वास्तव में ये उनका एक तरह से जुनून भी था.

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Image caption बंसी लाल

यमुना का पानी

बंसी लाल हर हालत में यमुना के पानी को दक्षिण हरियाणा के रेतीले टीलों के पार पहुंचाना चाहते थे.

हरियाणा के पूर्व मुख्य सचिव और 'माई इंनकाउंटर्स विद थ्री लाल्स ऑफ़ हरियाणा' के लेखक राम वर्मा बताते हैं, 'इसके लिए उन्होंने चीफ़ इंजीनयर के.एस. पाठक की मदद ली. वो पहले अमरीका में 'टेनेसी वैली कॉरपोरेशन' में काम कर चुके थे. उन्होंने उनसे कहा कि वो भारी पंपों का प्रयोग कर नहर के पानी को ऊपर पहुंचा देंगे. इसके लिए दो चीज़े ज़रूरी हैं. एक तो पर्याप्त मात्रा में पानी हो और दूसरे बिजली की भी कमी न हो. जुलाई में इस 'लिफ़्ट कनाल' परियोजना का उद्घाटन केंद्रीय मंत्री जगजीवन राम ने बटन दबा कर किया था. बटन दबाते ही जैसे ही पानी नहर में आया,वहाँ मौजूद लोग अपने आप को रोक ही नहीं सके और धोती कुर्ता पहने-पहने ही बहते पानी में कूद गए. उस इलाके की औरतों ने बंसी लाल के सम्मान में लोक गीत बनाए, जिनमें उनकी तुलना भगीरथ ऋषि से की गई जो स्वर्ग से गंगा को पृथ्वी पर लाए थे.'

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Image caption रेलवे अधिकारियों के एक सम्मेलन में बंसी लाल और साथ में माधवराव सिंधिया

हर गाँव में बिजली

हरियाणा के हर गाँव में बिजली पहुंचाने का बीड़ा भी बंसी लाल ने उठाया और वो भी बिना किसी अतिरिक्त बजट के.

राम वर्मा कहते हैं, 'बिजली विभाग किसानों से कहता था कि अगर तुम्हें कनेक्शन लेना हो तो 5000 रुपये दो. हम लाइन तुम्हारे यहाँ पहुंचा देंगे. बंसीलाल ने कहा कि भाखड़ा-नंगल परियोजना की वजह से हरियाणा के पास बिजली का सरप्लस है. पचास हज़ार किसानों ने ट्यूब वेल खुदवा रखे थे, लेकिन बिजली न होने की वजह से उन्हें पानी नहीं मिल पा रहा था. बंसी लाल ने आदेश दिया कि हरियाणा के हर गाँव में बिजली पहुंचा दी जाए, चाहे वहाँ बिजली की मांग हो या न हो. बस वहां बिजली का एक खंबा लगाकर एक बल्ब लगा दिया जाएगा. शुरू में लोगों ने बिजली के कनेक्शन नहीं लिए लेकिन बिजली पहुंचाने के लिए 5000 रुपये देने की शर्त हमेशा के लिए ख़त्म हो गई.'

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Image caption 'माई इंनकाउंटर्स विद थ्री लाल्स ऑफ़ हरियाणा' के लेखक राम वर्मा के साथ रेहान फ़ज़ल

हरियाणा पर्यटन का जन्म

पानी, बिजली और सड़क के अलावा हरियाणा को भारत के पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने का श्रेय भी बंसी लाल को जाता है. उसके पीछे भी एक दिलचल्प कहानी है.

राम वर्मा बताते हैं, 'एक बार मुझे संदेश मिला कि मैं करनाल के पास जीटी रोड पर मुख्यमंत्री बंसी लाल से मिलूँ. कार से उतरते ही बंसीलाल ने अपने सचिव एस. के. मिश्रा से कहा- मिश्राजी अगर इस सड़क पर दिल्ली जाते हुए मुझे और आपको पेशाब लगता है, तो हम कार रुकवा कर झाड़ियों में जाकर पेशाब कर सकते हैं. लेकिन अगर आपकी पत्नी भी आपके साथ बैठी हो तो उसका क्या होगा वो कहाँ जाकर पेशाब करेगी? बंसी लाल अपनी बात का असर देखने के लिए पाँच सेकेंड तक रुके और फिर बोले- ये जगह चंडीगढ़ और दिल्ली के बिल्कुल बीच में है. अगर आप यहाँ एक छोटा सा रेस्तराँ बनवा दें जिसमें साफ़ टॉयलेट हों, तो यहाँ से गुज़रने वाले लोग आपको हमेशा दुआएं देंगे. मिश्रा ने सामने गड्ढ़ों वाली ज़मीन को देखते हुए कहा कि हम यहाँ नहर से पानी लेकर एक सुंदर झील भी बनवा सकते हैं. इस छोटी सी बातचीत के बाद ही बाद में काफ़ी नाम कमाने वाले हरियाणा टूरिज़्म का जन्म हुआ.'

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Image caption पंजाब के तत्कालीन गवर्नर लेफ़्टिनेंट जनरल जैकब के साथ भजन लाल, ओम प्रकाश चौटाला और बंसी लाल, तस्वीर 14 अगस्त 2002 की है

विधायकों की जासूसी

बंसी लाल ने 'आया राम गया राम' के ज़माने में हरियाणा के मुख्यमंत्री का पद संभाला था. इसलिए उन्हें हमेशा ये चिंता रहती थी कि उनके विधायक कहीं पाला बदलने की योजना तो नहीं बना रहे.

राम वर्मा बताते हैं, 'बंसी लाल कभी भी रात में ये जाने बगैर नहीं सोए कि उनका एक-एक विधायक और मंत्री उस दिन कहाँ है और किससे मिल रहा है. वो अपना सारा सरकारी काम करने के बाद रात में करीब दो बजे सोने जाते थे. सोने से पहले वो उन कामों की सूची बनाते थे जो उन्हें अगले दिन करने होते थे. उन्होंने कभी भी चाणक्य होने का दावा नहीं किया लेकिन उनकी कृति 'अर्थ शास्त्र' हमेशा उनके बग़ल में रखी रहती थी.'

बंसी लाल को अक्सर इस बात में दिलचस्पी रहती थी कि उनके विरोधी पीठ पीछे उनके बारे में क्या सोच रहे हैं.

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Image caption बंसी लाल, एस.के. मिश्रा और इंदिरा गांधी

मंत्रिमंडल में...

एसके मिश्रा एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं, 'उस ज़माने में भगवत दयाल शर्मा हरियाणा के मुख्यमंत्री थे और राज्य विधान सभा के चुनाव हो रहे थे. भगवत दयाल मुझे पसंद करते थे और मुझे पंडितजी कह कर पुकारते थे. उन्होंने मुझसे कहा वैसे तो आप साफ़ सुथरा ही चुनाव कराएंगे, लेकिन दो लोगों को किसी तरह हरवाना है. एक तो हैं देवी लाल और दूसरे हैं बंसी लाल. ये नहीं आने चाहिए विधान सभा में. मैंने कहा हराना जितवाना तो मेरे हाथ में नहीं है. ये तो जनता के हाथ में है. इसमें मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता. जब बंसी लाल जीतकर आए तो उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम्हारी इस तरह की भगवत दयाल शर्मा के साथ कोई बात हुई थी. मुझको बहुत अचंभा हुआ कि उनको ये बात पता कैसे चल गई. वहां तो कोई था ही नहीं. बाद में पता चला कि वहाँ एक बेरर चाय सर्व कर रहा था. उसने ये बात सुन ली और बंसी लाल को बता दी. इस बीच मेरा तबादला दिल्ली हो गया. बंसी लाल एमएलए चुन लिए गए. मैंने उन्हें तार भेजकर बधाई दी और आशा प्रकट की कि उन्हें मंत्रिमंडल में ले लिया जाएगा. मुझे दिल्ली आए हुए एक महीना ही हुआ था. मुझे मकान मिला था, इसलिए मेरे घर में पार्टी हो रही थी. रात बारह बजे बंसी लाल का फ़ोन आया कि वो मुझसे मिलना चाहते हैं. मैंने कहा इस वक्त ऐसा क्या हो गया? उन्होंने बताया कि मुझे मुख्यमंत्री चुन लिया गया है और मैं आपको अपना प्रधान सचिव बनाना चाहता हूँ.'

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Image caption संजय गांधी

मारुति को ज़मीन

इंदिरा गाँधी और संजय गांधी के प्रति बंसी लाल की वफ़ादारी संपूर्ण थी. हरियाणा में मारुति फ़ैक्ट्री को ज़मीन दिलवाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसका बाद में उन्हें राजनीतिक फ़ायदा भी मिला.

कूमी कपूर अपनी किताब, 'द इमरजेंसी- अ पर्सनल हिस्ट्री' में लिखती हैं, 'बंसी लाल ने अपने वरिष्ठ अफ़सरों को हुक्म दिया कि वो दिल्ली जाकर संजय गाँधी को उनकी मारुति फ़ैक्ट्री के लिए ज़मीन दिलवाने में मदद करें. शर्त ये थी कि ज़मीन दिल्ली के पास होनी चाहिए. मारुति के लिए जिस ज़मीन को चुना गया वो खेती योग्य उपजाऊ ज़मीन थी. वहाँ से हथियारों का एक डिपो और एक हवाई पट्टी एक हज़ार गज़ से भी ज़्यादा दूर नहीं थी. उन्होंने संजय गांधी को 290 एकड़ ज़मीन का कब्ज़ा दिलवाया. मारुति को ज़मीन दस हज़ार रुपये एकड़ के हिसाब से बेची गई, जबकि बग़ल वाली ज़मीनों का दाम पैंतीस हज़ार रुपये एकड़ था. ज़मीन के दाम को 18 किश्तों में अदा किया जाना था, लेकिन मारुति ने दो किश्तों के बाद हरियाणा सरकार को बकाया देना बंद कर दिया था.'

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Image caption इंदिरा गांधी के साथ बंसी लाल

इंदिरा गांधी से नज़दीकी

बंसी लाल पर लोकताँत्रिक परंपराओं को दरकिनार कर मनमाने ढ़ंग से शासन करने का आरोप भी लगा. इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी के चचेरे भाई और गुजरात और कश्मीर के राज्यपाल रहे बीके नेहरू ने भारत में राष्ट्रपति प्रणाली लागू करने की एक मुहिम शुरू की थी. इस सिलसिले में वो बंसी लाल से भी मिले थे.

बीके नेहरू अपनी आत्मकथा, 'नाइस गाइज़ फ़िनिश सेकेंड' में लिखते हैं, 'भारत के कुछ ज़मीन से जुड़े लोगों में से एक बंसी लाल को इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि भारत का संविधान क्या कहता है. उन्होंने ठेठ हरियाणवी लहजे में मुझसे कहा, अरे नेहरू साहब, ये सब इलेक्शन-फ़िलेक्शन का झगड़ा ख़त्म करिए. मैं तो कहता हूँ बहनजी को प्रेसिडेंट फॉर लाइफ़ बना दीजिए. बाकी कुछ करने की ज़रूरत नहीं है.'

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Image caption राज कपूर को पहचान नहीं पाए थे बंसी लाल

राज कपूर से मुलाकात

बंसी लाल राजनीति में इतने लिप्त थे कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा ही नहीं था कि बाहर की दुनिया में क्या हो रहा है. एक बार ललित नारायण मिश्रा ने जब अपने यहाँ दिए गए भोज में बंसी लाल को राज कपूर से मिलवाया तो वो उन्हें पहचान तक नहीं पाए.

एस के मिश्रा बताते हैं, 'बंसी लाल का सिनेमा से कोई ताल्लुक नहीं था. उन्होंने अपनी ज़िंदगी में सिर्फ़ एक फ़िल्म देखी थी 'डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी.' जब ललित नारायण मिश्रा ने उन्हें राज कपूर से मिलवाया तो उनके ऊपर कोई असर ही नहीं हुआ. ललित जी ने जब ये देखा तो जोर से कहा, राज कपूर... राज कपूर. बंसी लाल बोले अच्छा तो आप का बिज़नेस है फ़रीदाबाद में. राज कपूर ने कहा नहीं, नहीं. बंसी लाल ने पूछा तो आप क्या काम करते हैं? राज कपूर ने जवाब दिया कि वो एक्टर हैं. बंसी लाल ने बिना पलक झपकाए कहा, किस नौटंकी में आप काम करते हैं? ये सुनना था कि राज कपूर बुरी तरह से झेंपे और ललित नारायण मिश्रा ने ठहाका लगाते हुए कहा, 'कमाल है, आप राज कपूर को नहीं पहचानते?'

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बंसी लाल की नाराज़गी

बंसी लाल को गुस्सा भी ख़ूब आता था. इसका स्वाद उनके प्रधान सचिव रहे राम वर्मा को भी चखना पड़ा था.

राम वर्मा बताते हैं, 'एक बार बंसी लाल को रेडियो पर हरियाणा की जनता को संबोधित करना था. उस ज़माने में हरियाणा में कोई रेडियो स्टेशन नहीं हुआ करता था. इसलिए हरियाणा के लिए दिल्ली से ही सारा प्रसारण होता था. मुझे उनके साथ आकाशवाणी भवन जाना था. जब मैं हरियाणा भवन पहुंचा तो देखा कि बंसी लाल परेशान मुद्रा में अपने कमरे के बाहर चक्कर लगा रहे हैं. जब मैंने उनकी परेशानी का कारण पूछा तो उनका जवाब था, आपने सब ग़लत चीज़ें मेरे भाषण में लिखवाई हैं. मैंने साफ़ किया कि मैंने वही चीज़ें भाषण में शामिल की हैं जो मुझे लिखित रूप से मिली हैं. जब हम आकाशवाणी भवन पहुंचे तो बंसी लाल ने बहुत आत्मविश्वास के साथ अपना भाषण पढ़ा. लेकिन आकाशवाणी के महानिदेशक शुंगलू ने उनसे कहा कि आप दो वाक्यों को दोबारा पढ़ दीजिए. ये वही वाक्य थे जिसमें बंसी लाल ने राम वर्मा के लिखे भाषण में दी गई जानकारी को सही किया था. बंसी लाल ने कहा- शुंगलू साहब मैं क्या कर सकता हूँ. इन साहब ने ये स्पीच मुझे कुछ मिनटों पहले दी है, जिसमें ग़लत आंकड़े दिए गए थे. मैंने उनको सही करके पढ़ा है. बंसी लाल ने उन वाक्यों की रिकार्डिंग दोबारा कराई. जब हमारी कार हरियाणा भवन के पोर्च में रुकी तो बंसी लाल ने मुझसे कहा, 'वर्माजी, मिश्राजी से कहकर अपने लिए कोई और महकमा चुन लेना.'

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Image caption रेलवे अधिकारियों के साथ बैठक करते तत्कालीन रेल मंत्री बंसी लाल

बंसी लाल की पत्नी

बंसी लाल अपने बेटे सुरेंदर सिंह की शादी में खुद नहीं गए थे, क्योंकि वो कट्टर आर्य समाजी थे और सादगी भरी ज़िदगी जीने में यकीन रखते थे. शादी के बाद उन्होंने एक प्रीति भोज ज़रूर दिया था जिसमें उन्होंने उस समय भिवानी में डिप्टी कमिश्नर के पद पर काम कर रहे राम वर्मा को भी आमंत्रित किया था.

वर्मा बताते हैं, "मैं और मेरी पत्नी सावित्री उस भोज में उनके यहाँ गए. वो कांजीवरम की साड़ी पहने हुए थीं और उनके कानों में सिर्फ़ सोने के छोटे से बुंदे थे. बंसी लाल की पत्नी विद्या देवी मेहमानों का स्वागत कर रही थीं. जब उन्होंने मेरा पत्नी को बिना ज़ेवरों के देखा तो वो आश्चर्यचकित रह गईं. उनके मुंह से निकला, 'अरे छोरी तू तो नागी बूची आ गई.' वो मेरी पत्नी को घर के अंदर ले गई और अपने हाथों से उसे एक पेंडेंट के साथ सोने की एक चेन पहना दी. मेरी पत्नी जब बाहर आई तो वो थोड़ा नाराज़ थी. मैंने उसे समझाया कि इनका बोलने का यही तरीका है. अगर इनकी बेटी भी इसी तरह आती तो उन्होंने उसके साथ भी यही किया होता. दावत के बाद मैं और मेरी पत्नी वो सोने की चेन लौटाने विद्या देवी के पास गए, लेकिन उन्होंने उसे लेने से साफ़ इंकार कर दिया. इस तरह शादी में तोहफ़ा देने के बजाए हम तोहफ़ा ले कर वापस लौटे."

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