#70yearsofpartition: 'रात में दोनों तरफ़ का गोला दिखता था आसमान में'

  • 31 अगस्त 2017
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अपने छूटे, घर-ज़मीन, जायदाद, सब, उस मुल्क में रह गया जो रातों-रात 'दूसरा मुल्क' बन गया था.

1947 की गर्मियों में दो भाई हर साल की तरह पोईन गांव से हुंडरमन ब्रूक़ गए. मवेशियों को लेकर ऊपरी पहाड़ों पर, जहां उनका एक और घर था.

लेकिन फिर वो सालों करगिल के अपने गांव वापस नहीं जा सके. हुंडरमन पाकिस्तान का हिस्सा बन गया था और पोईन भारत का.

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अपने छूटे, घर-ज़मीन, जायदाद, सब, उस मुल्क में रह गया जो रातों-रात 'दूसरा मुल्क' बन गया था.

नियंत्रण रेखा पर बसा 20 घरों वाला लद्दाख़ी गांव फिर से भारत के पास है!

लेकिन हुंडरमन की तक़दीर की लकीरों में हुए इस फेर-बदल की उसे एक बार फिर भारी क़ीमत अदा करनी पड़ी है.

वो सड़क अब भी दिखती है

मोहम्मद काज़िम कहते हैं, "पहले पाकिस्तान में था. 47 से आगे ... नहीं, पहले हिंदुस्तान में था, उसके बाद पाकिस्तान में था ... उसके बाद फिर हिंदुस्तान में आ गया ये अभी."

गांव के तिराहे पर पेड़ के नीचे बैठे काज़िम हाथ के इशारे से बताते हैं, 'इधर पाकिस्तान बैठा था. इधर हिंदुस्तान बैठा था.'

मंगोलियन नैन-नक्श के मोहम्मद काज़िम अपनी उम्र कुछ यूं बताते हैं - 80, 81, 82, 83, 84, 85. उनकी छोटी-छोटी आंखें उस वक़्त चमक रही थीं.

इस बीच कोई भागकर एक दरी ले आया है. मुझे उसपर बैठाया जाता है, मेरे बार-बार इंकार के बावजूद.

तिराहे से सामने की पहाड़ी पर वो सड़क अभी भी दिखती है जिससे गांववाले पाकिस्तान जाया करते थे - 1971 के पहले जब भारतीय फौज ने गिलगिट-बालटिस्तान के कुछ हिस्सों को अपने क़ब्ज़े में कर लिया.

क़िस्सा अली मोहम्मद का

Image caption 1971 में हुसैन ख़ान पाकिस्तान की तरफ़ रह गए. कई साल बाद बहन को लिखा ख़त हुंडरमन पहुंचा

'1971 की जंग सात दिन जारी रही. फिर हिंदुस्तान ने गांव पर कब्ज़ा कर लिया और पाकिस्तानी यहां से भाग खड़े हुए,'

अली मोहम्मद उस वक़्त को बयां करते हुए कहते हैं, 'आठवें दिन हिंदुस्तानी फ़ौज ने पूरे गांव को घेर लिया. गांव के औरत, मर्द और बच्चे सभी को खेतों में खड़ा किया गया जिसके बाद एक-एक घर की तलाशी ली गई कि कहीं कोई दुश्मन तो नहीं छुपा है वहां, या फिर हथियार. लेकिन फौज को कुछ मिला नहीं.'

अली मोहम्मद पाकिस्तान में पैदा हुए थे. कुछ ही घंटों में वो हिंदुस्तानी हो गए थे!

दो सालों बाद भारतीय फौज ने गांव में स्कूल खोला अली मोहम्मद ने वहां दाख़िला लिया.

फिर छूटे अपने

Image caption फ़ैसल मोहम्मद अली के साथ मोहम्मद काज़िम साथ ..

दो मुल्कों के बीट हुई हफ़्ते की लड़ाई के बाद अली मोहम्मद पाकिस्तानी से हिंदुस्तानी शहरी हो गए; तो हुसैन ख़ान बलेरमो में फंसे रह गये जो पाकिस्तान में रह गया था.

साल 1985 में उनका एक ख़त अपनी बहन को पहुंचा जिसमें उन्होंने उलाहना किया था कि उनके 'पिछले ख़तों का जवाब नहीं मिला और अगर उनसे जाने-अनजाने कोई ग़लती हो गई है तो वो माफ़ी मांगते हैं.'

दो पहाड़ियों के बीच बसे हुंडरमन ने पिछले 70 सालों में चार जंग और भारत-पाकिस्तान के बीच हुई अनगिनत गोलीबारियों का दर्द सहा है.

इलियास 32 साल के हैं - करगिल युद्ध उनके ज़हन में एक तस्वीर की तरह साफ़ है.

'रात में दोनों तरफ़ का गोला दिखता था आसमान में ... रेड-रेड,' इलियास कहते हैं.

न भारत के पास, न पाकिस्तान के

1965 में, जब भारत पाकिस्तान जंग इस क्षेत्र में किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही थी, हुंडरमन चार माह के लिए किसी मुल्क के हिस्से में न था - दुनियां से बिल्कुल कटा हुआ, जैसे, हर किसी के ज़रिये त्याग दिया गया हो!

करगिल युद्ध के वक़्त गांव में हाई-स्कूल नहीं था. बच्चों को ऊंची कक्षा में पढ़ाई के लिए करगिल जाना होता था, और लड़के-लड़कियों को फ़ायरिंग की वजह से 'कभी-कभी पूरे-पूरे दिन रास्ते में कहीं छुपे रहने होता था.'

जब गोल बरस रहे हों तो खेती-बाड़ी की कौन सोचे, हालांकि 'करगिल से सप्लाई लाईन बंद हो गई थी और ग्रामीणों को कई बार ख़ुबानी, सेब और घर में पड़े जौ के सत्तू से दिन काटना पड़ता था.'

सत्तू वैसे लद्दाख़ का पुश्तैनी भोजन रहा है जैसे कि सलमान कहते हैं, 'पकाने की ज़रूरत नहीं, जहां पानी मिला तैयार किया, भूखा नहीं रहना पड़ता है.'

कल्चरल प्रिज़रवेटर एजाज़ हुसैन मुंशी कहते हैं कि उन्हें गांवों में बहुत सारे ऐसे लोग भी मिले जिन्होंने '1971 से पहले चावल और किरोसीन तक नहीं देखा था.'

क़ीमत सिर्फ़ गधे की

Image caption हुंडरमन सिल्क रूट के पास पड़ता था और इसके कई चिन्ह वहां मौजूद संग्रहालय में मौजूद हैं

तमाम दिक्क़तों के बाद 'करगिल के वक़्त मर्द हो या औरत सभी ने फौज की मदद की,' अली मोहम्मद बताते हैं, 'सुबह में माल लेकर जाते थे, रात में गोला-बारूद भी ढ़ोना पड़ता था.'

फ़ौज का सामान पहुंचाना हुंडरमन और पहाड़ों में बसे दूसरे गांवों का पीढ़ियों से पेशा रहा है. चाहे वो 85 के काज़िम हों, या अब उनके बेटे या फिर 27 साल के मोहम्मद.

दस साल की उम्र से पोर्टर के काम में लगे मोहम्मद कहते हैं कि ये काम ख़तरनाक है.

वो कहते हैं कि 'गधे पर क़रीब 30-35 किलो सामान लादकर सात से आठ किलोमीटर की चढ़ाई चढ़नी होती है ऊपर के आर्मी पोस्ट तक पहुंचने को, लेकिन सकरे पत्थरीले रास्ते पर अगर कोई गधा बिदक जाता है तो बाक़ी गधों की और आपकी ज़िंदगी ख़तरे में पड़ जाती है.'

दूसरी तरफ़ सैकड़ों फुट गहरी खाई मुंह खोले खड़ी होती है.

'प्यास से गधों की मौत भी हो जाती है,' फिर भी वो कम से कम याक से बेहतर हैं जिनका इस्तेमाल गांववाले पहले पाकिस्तानी और भारतीय फौज के लिए सामान ढ़ोने में लेते थे.

मोहम्मद को फौज से एक गधे पर सामान ढ़ोने के 300 रूपयों के आसपास मिलते हैं, लेकिन वो हंसते हुए शिकायती लहजे में कहते हैं कि पैसा सिर्फ़ गधे का मिलता है आदमी की मज़दूरी का नहीं!'

'हम भी हिंदुस्तानी ...'

शिकायत तो अली मोहम्मद को भी है लेकिन ....

वो कहते हैं, 'हमारी पुश्त-दर-पुश्त मुल्क की ख़िदमत कर रही है. करगिल में इस गांव ने जीन-जानकर मदद की लेकिन हमारे बच्चों को नौकरी तक नहीं मिलती, फौज में भी नहीं.'

'ऐसा नहीं होना चाहिए. हमलोग भी हिंदुस्तानी है.'

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