#70yearsofpartition: 'छोले भटूरे और हलवा तो पाकिस्तानी यहां लेकर आए'

  • 31 अगस्त 2017
Image caption पीएल गोगिया अपने बेटे ललित गोगिया के साथ अपनी दुकान पर मौजूद

86 साल के पुरुषोत्तम लाल गोगिया नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से सटे मुल्तानी डांढा में अपनी दुकान पर बैठे हैं.

रेडिमेड गार्मेंट की उनकी 'चलती' दुकान अब उनके बेटे ललित संभालते हैं. लेकिन 86 साल के बुर्जुग जब अपनी कहानी बयां करते हैं तो एहसास होता है कि यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें किन मुश्किलों को पार करना पड़ा होगा!

मात्र 16-17 साल के थे पुरुषोत्तम लाल, जब विभाजन हुआ. वे कहते हैं, "अपना सबकुछ छोड़कर हमारा परिवार दिल्ली आ गया था. दिल्ली के पहाड़गंज का इलाक़ा तब सुनसान था. लकड़ी का काम होता था इधर, वहीं मजदूरी करने लगा."

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दिल्ली में पाकिस्तान से आए लोगों के बनाए बाज़ार

मुल्तानी डांढा के बारे में वे बताते हैं, "यहां तो कुछ था ही नहीं, मुल्तान से आए लोग धीरे-धीरे इक्ट्ठे होने लगे थे, काफ़ी समय तक तो यहां मुल्तान में मिलने वाली मिट्ठी बड़े पैमाने पर बेची जाती थी, नाम भी पड़ गया मुल्तानी डांढा. अब तो हर तरह के सामान मिलते हैं यहां."

पुरुषोत्तम लाल ये भी बताते हैं कि शुरुआती दिनों में जिन लोगों ने मेहनत करके इस बाज़ार को रूप दिया उनमें से ज़्यादातर लोग अब इधर-उधर चले गए हैं, पर मुल्तानी डांढा की पहचान बनी हुई है.

भारत-पाकिस्तान को आज़ाद हुए 70 साल हो गए हैं, इन 70 सालों में पुरुषोत्तम लाल कभी मुल्तान नहीं जा पाए. वे कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि मुल्तान की याद नहीं आती, लेकिन जाना नहीं हो पाया. अब तो पता नहीं वहां क्या हाल होगा. जब अप्रैल, 2004 में वीरेंद्र सहवाग ने मुल्तान टेस्ट में तिहरा शतक बनाया था, तब भी मुझे अपना मुल्तान बहुत याद आया था."

पाकिस्तान की डिशेज़

इसी बाज़ार में चावला जेनरल स्टोर्स की दुकान चलाने वाले श्याम सुंदर भी मुल्तान से ही दिल्ली आए थे. वे कहते हैं, "आज़ादी से ठीक पहले हमारा परिवार आ गया, लुधियाना कैंप में रहे वहां से हरिद्वार चले गए, फिर इधर आ गए. छोटा मोटा काम करते करते यहीं ठहर गए."

कश्मीर स्वीट शॉप के विजय कुमार बताते हैं, "चांदनी चौक से सटे होने के चलते ये इलाक़ा आबाद था, लोग बहुत कम थे, लेकिन लोग थे, अनाज और लकड़ी की कुछ दुकानें भी थीं."

विजय टंडन कहते हैं, "मुल्तानी डांढा ही नहीं पहाड़गंज में 80 फ़ीसदी से ज़्यादा दुकानें पाकिस्तान से आए लोगों ने शुरू की थी. छोले भटूरे, हलवा, गुलाब जामुन जैसी डिश तो पाकिस्तान से आए लोग दिल्ली लेकर आए."

Image caption मुल्तानी डांढा में सबसे पुरानी खाने पीने की दुकान विजय टंडन के परिवार वालों ने शुरू किया था

विजय टंडन का दावा है कि उनके दादा और पिता ने पूरी सब्ज़ी बेचने से इस दुकान की शुरूआत की थी और ये "दिल्ली की सबसे पुरानी छोले भटोरे की दुकानों में है."

वो कहते हैं दिल्ली में चार ऐसी दुकानें हैं - सीताराम भटूरे वाले, पानमंडी में नंद भटूरे वाले, हमारी दुकान और एक अन्य दुकान है. ऐसी दुकानें तब थी ही नहीं. करोल बाग से आगे दिल्ली नहीं थी."

सुभाष चंद्र अरोड़ा कहते हैं कि 'मुल्तानी डांढा अब काफ़ी बदल गया है, हर घर में दुकान में खुल गई है.'

मुल्तानी डांढा एक तरह से सदर बाज़ार का ही एक्सटेंशन है.

कराची हलवा

सदर बाज़ार में एक इमारत है मुल्तानी बिल्डिंग. इस तीन मंजिली इमारत में छोटी-बड़ी 200 दुकानें हैं और इसे दिल्ली का सबसे बड़ा क्राकरी बाज़ार बताया जाता है.

वैसे तो इस इमारत के नाम का मुल्तान से कोई नाता नहीं है, लेकिन ये पूरा बाज़ार भी पाकिस्तान से आए लोगों की वजह से बना है. सचदेवा ब्रदर्स के नाम से क्रॉकरी दुकाने चलाने वाले 85 साल के एल. सचदेवा का परिवार लाहौर से यहां आया था.

वे बताते हैं, "ये इमारत यहीं के किसी मुल्तानी नाम के कारोबारी की थी, वे बंटवारे के समय में पाकिस्तान चले गए. उनके नाम पर ये मुल्तानी बाज़ार तब भी था, जब हम लोग आए तो इस इमारत में जगह मिली और हमने यहीं से अपना काम शुरू कर दिया."

इसी इमारत में एक दुकान है पेशावर गैस अप्लायंस का. दुकान पर बैठे रोहित आहूजा बताते हैं, "हमारे दादाजी तो पेशावर से आए थे. शरणार्थी कैंपों में जगह मिली, फिर इधर एक छोटी-सी दुकान हमारे दादाजी ने खोली, अब तो हमारी चार पांच दुकानें हैं, सबके सब पेशावर नाम से ही. इस नाम के चलते हमें कोई दिक्कत नहीं हुई."

दिल्ली के कई इलाक़े और बाज़ार पाकिस्तान से आए लोगों की वजह से ही गुलज़ार हैं. दिल्ली की सबसे मशहूर ख़ान मार्केट हो या फिर लाजपत नगर का बाज़ार, इन्हें रिफ्यूज़ी लोगों ने ही शुरू कर इतना बड़ा बनाया है कि ये अब दिल्ली की पहचान बन चुके हैं.

इन बाज़ारों की तरह की कुछ ख़ास दुकानें भी अपने ख़ास नाम और पहचान की वजह से मशहूर रही हैं, इनमें एक है गोल मार्केट का कराची हलवा हाउस. नाम से ही ज़ाहिर है कि इसे कराची से आए चेतन राम खेमानी ने शुरू किया था.

चेतन राम खेमानी आज़ादी से कुछ साल पहले ही दिल्ली आ गए थे, चांदनी चौक में दिहाड़ी मज़दूरी करते करते हुए उन्होंने ये हलवे की दुकान खोली थी.

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Image caption कराची हलवा हाउस की एक पुरानी तस्वीर

अब परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य भरत खेमानी इस दुकान को संभालते हैं. होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर चुके भरत खेमानी बताते हैं, "दादाजी दिहाड़ी मज़दूरी करते थे, वहां से शुरू होकर उन्होंने कराची के ख़ास हलवा बनाने का काम शुरू किया जो चल निकला, यही वजह है कि हमारी शॉप बेहद मशहूर हो गई."

भरत कहते हैं, "कराची हलवे की ख़ासियत होती है वो काफ़ी गर्म होता है, ठंडे प्रदेशों में इसकी मांग ज़्यादा होती है, लिहाजा इधर हमारी बिक्री कम हुई है, लेकिन मैं इसे अब निर्यात करने की दिशा में काम कर रहा हूं."

भरत ख़ुद तो कराची नहीं गए हैं, लेकिन उनकी दुकान पर कराची और लाहौर से दिल्ली आए लोग भी हलवा खाने की लिए पहुंचते रहे हैं.

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