इंग्लिश स्कूल के लिए कुसुम चढ़ी ऊंचे टावर पर

  • 31 अगस्त 2017
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'प्रियंका भारती' यह नाम आज किसी पहचान की मोहताज नहीं है. चार साल पहले प्रियंका ने अपने ससुराल में शौचालय बनने तक ससुराल न लौटने की जिद ठानी और उसमें कामयाब भी रहीं.

उत्तर प्रदेश के महाराजगंज ज़िले की बहू प्रियंका भारती की ज़िद की गूंज ने गांव से लेकर सरकारी दफ्तरों तक को हिला दिया. रातोंरात प्रियंका भारती देश में साहसिक संकल्प का प्रतीक बन गईं.

बुधवार को महाराजगंज की एक और बेटी ने बेहतर मुस्तकबिल के लिए ऐसे ही एक साहसिक संकल्प से एक नई कहानी लिख दी.

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टावर पर चढ़ी कुसुम

महाराजगंज ज़िले के निचलौल कस्बे के एक गांव बाली में रहने वाले रतन राजभर की बेटी कुसुम बुधवार की सुबह पांच बजे अपने घर के पास बने एक मोबाइल टावर के पास पहुंची और टावर पर चढ़ना शुरू कर दिया.

उस वक्त काफ़ी अंधेरा था. कुसुम सीढ़ियां चढ़ती गई और थोड़ी ही देर में वह 120 फुट ऊंचे टावर के शीर्ष पर पहुंच गई. गांव में जब लोग खेतों की तरफ़ निकले तो उनकी नज़र टावर पर चढ़ी कुसुम पर पड़ी. तब तक बेटी को खोजते कुसुम के मां-बाप भी वहां पहुंच चुके थे.

नीचे जमा भीड़ कुसुम को उतरने के लिए कह रही थी. कोई उसके साहस को सलाम कर रहा था तो कोई अपने धड़कते दिल को बमुश्किल काबू करने की बात कह रहा था. बीच-बीच में शासन-सत्ता को कोसने का पसंदीदा शगल भी जारी था.

ऊपर कुसुम भी कुछ कह रही थी, लेकिन उसकी आवाज़ नीचे खड़े लोगों को सुनाई नहीं पड़ रही थी.

हर कोई यही जानना चाहता था कि कुसुम टावर पर चढ़ी क्यों ?

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इंग्लिश स्कूल में जाने की ज़िद

शिक्षक-पत्रकार अजय जायसवाल के मुताबिक लोगों को माजरा तब समझ में आया जब कुसुम के पिता रतन ने पुलिस द्वारा लाए गए माइक पर कुसुम से नीचे उतर आने की मनुहार की और वादा किया कि उसका नाम इंग्लिश मीडियम स्कूल में ही लिखवा देंगे.

फ़ीस जमा न होने की वजह से कुसुम का नाम गांव के इंग्लिश मीडियम स्कूल 'लिटिल एंजेल कॉन्वेंट' से कट गया था और अंडे-चाट का ठेला लगा कर आजीविका चलाने वाले रतन ने बेबस होकर बेटी से सरकारी स्कूल में दाखिला कराने की बात कही थी

कुसुम इस बात से बहुत निराश हो गई और उसने टावर पर चढ़ने का बड़ा फ़ैसला ले लिया.

कुसुम ने बीबीसी को बताया, ''फ़ीस जमा ना होने के चलते नाम कट गया था और पापा अब सरकारी स्कूल में नाम लिखवाने के लिए कह रहे थे. सरकारी स्कूल साफ़ नहीं है और वहां इंग्लिश मीडियम जैसी पढ़ाई भी नहीं होती है. यहां अच्छे बच्चे पढ़ते हैं और टीचर लोग अच्छा पढ़ाते हैं, इसीलिए हम दुखी होकर टावर पर चढ़ गए.''

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क्या कुसुम को डर नहीं लगा?

इस सवाल के जवाब में कुसुम मासूमियत से कहती हैं कि जब वह टावर पर चढ़ रही थी तो एकदम अंधेरा था, इसलिए उसको नीचे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. जब सुबह हुई और उसने नीचे देखा तो वह बुरी तरह डर गई थी. वह नीचे उतरना चाहती थी, लेकिन डर के मारे हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. हालांकि उसे नीचे जमा भीड़ देखकर लगने लगा था कि लोग उसका दुःख समझ जायेंगे.

बहरहाल ख़बर पाकर पहुंची पुलिस और अफ़सरों की पहल पर थोड़ी ही देर में वहां फ़ायर ब्रिगेड से लेकर मोबाइल टावर के कर्मचारी जमा हो गए. इनमें से कुछ लोग पानी की बोतल और बिस्कुट लेकर धीरे-धीरे ऊपर चढ़े, कुसुम की हिम्मत बंधाई और बाद में उसे लेकर सकुशल नीचे उतर आए.

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गांव वालों ने दी शाबाशी

छह घंटे से ज़्यादा देर तक चले इस हाई वोल्टेज ड्रामा के बाद हर कोई कुसुम की पीठ थपथपा रहा था और भरोसा दिला रहा था कि वह अच्छे स्कूल में ही पड़ेगी.

यह कहानी तब और खुशगवार अंजाम तक जा पहुंची जब लिटिल एंजेल कॉन्वेंट के प्रबंधक केशव सिंह ने खुद एलान किया कि वह अपने स्कूल में कुसुम को निशुल्क पढ़ाएंगे.

स्थानीय पत्रकार पुनीत मिश्रा के मुताबिक गांव के प्रधान सत्य प्रकाश सिंह ने भी रतन से वादा किया है कि बेटी की पढ़ाई के लिए जरूरी किताब-कॉपी वह मुहैया कराएंगे.

कुसुम की एक बहन और एक भाई है. कुसुम सबसे बड़ी है, उसकी छोटी बहन भी सरकारी स्कूल में जाती है. क्या अब वह भी कॉन्वेंट में जाएगी, इस सवाल पर कुसुम कहती है, ''अभी वह बहुत छोटी है जब थोड़ी बड़ी होगी तब जाएगी.''

बाली गांव की इस छोटी बिटिया कुसुम ने ये साबित कर दिया है कि उसके पास साहस का ऐसा ऊँचा हिमालय है जिसके आगे 120 फ़ीट ऊँचा मोबाइल टावर बौना ही लगता है.

प्रियंका से प्रेरित होकर 'टॉयलेट : एक प्रेम कथा' बनाने वाले फिल्मकार अगर चाहें तो अब कुसुम की कहानी पर 'टावर : एक विजय कथा' जैसी फ़िल्म बना सकते हैं.

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