महेंद्र नाथ पांडेय को यूपी की कमान, बीजेपी की सोच क्या?

  • 31 अगस्त 2017
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Image caption महेंद्र नाथ पांडेय, यूपी बीजेपी के नए अध्यक्ष

केंद्र सरकार में संभावित बदलाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश में पार्टी ने अपना अध्यक्ष बदलकर कई समीकरणों को साधने की कोशिश की है, ख़ासकर जातीय समीकरणों को.

केंद्रीय मानव संसाधन राज्य मंत्री महेंद्र नाथ पांडेय को बीजेपी ने उत्तर प्रदेश का पार्टी अध्यक्ष बनाया गया है, जो कि उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की जगह लेंगे.

विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी ने केशव प्रसाद मौर्य को पार्टी की कमान सौंपी थी. केशव मौर्य ने लक्ष्मीकांत वाजपेयी की जगह ली थी जिनके कार्यकाल में बीजेपी को साल 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से 71 सीटें हासिल हुई थीं. केशव मौर्य के नेतृत्व में पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 325 सीटों के साथ सरकार बनाई और मौर्य उप मुख्यमंत्री बनाए गए.

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जातिगत समीकरण

केशव मौर्य के उप-मुख्यमंत्री बनने के बाद ही ये तो तय था कि वे ज़्यादा दिन तक प्रदेश अध्यक्ष नहीं रहेंगे, लेकिन जिस तरह से पार्टी चौंकाने वाले फ़ैसले करती रही है, महेंद्र नाथ पांडेय का नाम भी प्रदेश अध्यक्ष के लिए कुछ वैसा ही है.

जानकारों का कहना है कि उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनते ही जिस तरह से अगड़ी जातियों के कुछ वर्गों में सरकार और पार्टी के प्रति मोहभंग की स्थिति आ रही थी, महेंद्र नाथ पांडे को संगठन की कमान सौंपना, उस स्थिति को रोकने की कोशिश है.

वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "बीजेपी दलित, मुस्लिम, पिछड़ा वर्ग समेत चाहे जिन जातियों और समुदायों में सेंध मार ले, लेकिन उसे पता है कि उसके असली मतदाता अगड़ी जातियों के ही हैं, ख़ासकर ब्राह्मण और ठाकुर. योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री बनाने के बाद प्रदेश अध्यक्ष की सीट ब्राह्मण को सौंप कर पार्टी ने इसी समीकरण को साधने की कोशिश की है. जहां तक पिछड़े वर्ग का सवाल है तो केशव मौर्य उपमुख्यमंत्री बने ही हैं."

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ब्राह्मण मतदाता को लुभाना

बताया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता योगी सरकार में ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है. गोरखपुर में बीएसपी विधायक विनय शंकर तिवारी के घर पर छापेमारी की घटना हो या फिर रायबरेली में ब्राह्मण समुदाय के पांच लोगों की ज़िंदा जलाकर हुई हत्या हो, ब्राह्मण समुदाय में सरकार के प्रति काफी ग़ुस्सा था. रायबरेली की घटना को लेकर तो सरकार के कई मंत्री तक आमने-सामने आ गए थे.

योगेश मिश्र कहते हैं कि महेंद्र नाथ पांडेय भले ही बहुत ज़्यादा चर्चित नेताओं में न गिने जाते हों लेकिन छात्र जीवन से ही वो आरएसएस के अनुयायी रहे हैं, संगठन और सरकार दोनों में उनका अच्छा अनुभव है और सबसे बड़ी बात कि व्यवहार कुशल हैं.

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Image caption उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र

कलराज मिश्र भी निशाने पर ?

महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पीछे एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी के बड़े नेता कलराज मिश्र हो सकता है कि अगले कुछ दिनों में केंद्र सरकार में होने वाले बदलाव में हटाए जाएं, क्योंकि वो 75 साल की उम्र पूरी कर चुके हैं. ऐसी स्थिति में डैमेज कंट्रोल न करना पड़े, पार्टी ने महेंद्र नाथ पांडेय को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर वो काम पहले ही कर दिया है.

वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं, "कलराज मिश्र फ़िलहाल यूपी बीजेपी में अकेले बड़े ब्राह्मण नेता माने जाते हैं. हालांकि उन्हें मंत्रिमंडल में कोई ख़ास जगह नहीं दी गई है, फिर भी यदि उन्हें मंत्रिमंडल से हटाया गया तो इसका संदेश ठीक नहीं जाएगा, ये सरकार को पता है. ख़ासकर तब जबकि ब्राह्मण वर्ग मौजूदा सरकार की कार्यप्रणाली से ख़ुद को बहुत ज़्यादा संतुष्ट नहीं पा रहा है."

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क्षेत्रीय समीकरण बिगड़ने का डर

महेंद्र नाथ पांडेय ग़ाज़ीपुर के मूल निवासी हैं और इस समय चंदौली से सांसद हैं. उनकी शिक्षा-दीक्षा बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हुई है और बीजेपी के पूर्वांचल के अहम नेताओं में उनकी गिनती होती है.

पार्टी ने जातीय समीकरण साधने की कोशिश ज़रूर की है, लेकिन जानकारों का कहना है कि इससे क्षेत्रीय समीकरण बिगड़ते भी नज़र आ रहे हैं. बकौल योगेश मिश्र, "मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों ही पूर्वी उत्तर प्रदेश से हैं. वाराणसी से प्रधानमंत्री सांसद हैं, राजनाथ सिंह भी पूर्वांचल से हैं. ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नेताओं में नाराज़गी स्वाभाविक है और पार्टी को इसका नुक़सान भी उठाना पड़ सकता है."

बहरहाल, जानकारों का कहना है कि पार्टी ने फ़िलहाल क़रीब 12 प्रतिशत ब्राह्मण मतों के साथ कुल क़रीब 22-23 प्रतिश अगड़ी जातियों पर फ़ोकस कर रही है. साल 2019 आते-आते दूसरी जातियों को साधने की कोई अलग रणनीति तैयार कर लेगी. रही बात क्षेत्रीय संतुलन की, तो उसे साधने के अभी कई मौक़े हैं.

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