ब्लॉग: तो पत्नी ‘भोग्या वस्तु’ है साक्षी महाराज?

  • 3 सितंबर 2017
साक्षी महाराज इमेज कॉपीरइट Facebook

भारतीय जनता पार्टी के सांसद साक्षी महाराज जिस वक़्त ग़ुरूर और आत्मविश्वास से लबरेज़ आवाज़ में एक बलात्कारी को सिर्फ़ इस वजह से निर्दोष बता रहे थे कि उसके करोड़ों भक्त हैं और शिकायत करने वाली सिर्फ़ एक महिला. पता नहीं उस वक़्त 'निर्भया' की मां आशा देवी टीवी देख रही थीं या नहीं.

सिर्फ़ अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है कि अगर वो टीवी देख रही होंगी तो उन्होंने ख़ुद को कितना असहाय, कितना बेचैन और कितना अकेला महसूस किया होगा. शायद साक्षी महाराज का चेहरा देखकर उन्होंने ग़ुस्से में अपने दाँत भींच लिए हों, पर कुछ न कर पाने की हताशा में आँखों में आँसू आ गए हों.

पाँच लाख से ज़्यादा वोटरों का भरोसा हासिल करके उन्नाव से दिल्ली की संसद तक पहुँचे भगवा वस्त्रधारी साक्षी महाराज जिस विश्वास और खम के साथ बलात्कार के आरोप में सज़ा पाए डेरा सच्चा सौदा के मुखिया गुरमीत राम रहीम सिंह को पाक साफ़ बता रहे थे, उसे देखकर नहीं लगता कि आशा देवी का ख़्याल भी उनके दिमाग़ मे आया होगा.

इमेज कॉपीरइट AFP

दिल्ली गैंगरेप से राजनीतिक दलों ने क्या सीखा?

आशा देवी की बेटी ज्योति सिंह के साथ दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती बस के अंदर छह लोगों ने 2012 में बलात्कार किया और उनके शरीर में सरिया डालकर आँतें तक बाहर निकाल दीं. कुछ दिन बाद ज्योति चल बसी. मीडिया ने उसे निर्भया नाम दिया.

उसके बलात्कारी उसी बस के ड्राइवर और खलासी थे. मौत के मुँह में जाती हुई ज्योति सिंह को न्याय दिलाने के लिए ग़ुस्से में भरे नौजवान लड़के-लड़कियाँ हज़ारों की तादाद में दिल्ली की सड़कों पर उतर पड़े.

सरकार की नींद खुली और वो बलात्कार के क़ानून बदलने पर मजबूर हुई. बलात्कारियों को अदालत ने फाँसी की सज़ा सुनाई और एक नाबालिग अपराधी को भी क़ानून के मुताबिक़ सज़ा हुई.

पर किसी ने भी सभी को दहला देने वाले इस कांड के बारे में किंतु-परंतु लगाकर बलात्कारियों का पक्ष लेने की हिम्मत नहीं की. पर उस घटना से "पाँच हज़ार वर्ष पुरानी सभ्यता वाले विश्व के इस महान लोकतांत्रिक देश'' की राजनीतिक पार्टियों ने क्या सीखा?

इमेज कॉपीरइट AFP

बलात्कारी को सज़ा 'हिंदू संस्कृति को बदनाम करने की साजिश'?

निर्भया कांड के कुछ साल बाद समाजवादी पार्टी के अनुभवी नेता मुलायम सिंह यादव ने खुली जनसभा में बलात्कारी लड़कों का ये कहकर बचाव किया कि ''लड़के हैं ग़लती हो जाती है कभी तो क्या उन्हें फाँसी पर चढ़ाओगे?''

ऐसे ही ''ग़लती करने वाले लड़कों'' के हाथों अपनी बेटी खो चुकी कितनी आशा देवियों ने शायद मुलायम सिंह यादव का ये बयान सुनकर समाजवादी पार्टी के ख़िलाफ़ अपना मन बना लिया हो और सोचा हो कि इससे अच्छी तो भारतीय संस्कृति में रची बसी भारतीय जनता पार्टी और उसके नेता हैं.

लेकिन क्या उन्हें पता था कि भारतीय जनता पार्टी में साक्षी महाराज जैसे लोग हैं जो डेरा चलाने वाले एक बाबा को सज़ा मिलने पर इसे हिंदू संस्कृति को बदनाम करने की साज़िश मानते हैं और कहते हैं कि जिस महिला ने शिकायत की, वो झूठ भी बोल सकती है और अदालतें जो "सीधे सादे" गुरमीत सिंह को तलब करके सज़ा देती हैं वो जामा मस्जिद के इमाम को क्यों नहीं बुलातीं?

इमेज कॉपीरइट AFP

मोदी, शाह की आलोचना का ख़तरा और साक्षी की पल्टी

लेकिन जब उनके इस बयान के कारण भारतीय जनता पार्टी की और अंतत: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की आलोचना होने का ख़तरा बढ़ने लगा तो हमेशा की तरह साक्षी पल्टी मार गए.

इस बार बयान बदलते हुए चाहे जितने सावधान रहे हों पर अनजाने में उनके मन की बात उनकी ज़बान पर आ गई और उन्हें अहसास तक नहीं हुआ कि सफ़ाई देते-देते वो दरअसल क्या कह गए.

उन्होंने साफ़-साफ़ जता दिया कि वो पत्नियों को उपभोग की वस्तु मानते हैं. उनके इस बयान पर या तो किसी का ध्यान नहीं गया या फिर लोग उनके ऐसे बयानों के इतने आदी हो चुके हैं कि न वो चौंकते हैं, न नाराज़ होते हैं और न विरोध करना चाहते हैं. साक्षी महाराज जैसे लोगों की मौजूदगी से इस लोकतंत्र के नागरिक की संवेदनाएँ भोथरी-सी हो गई लगती हैं.

एक टीवी चैनल ने जब साक्षी महाराज से राम रहीम के समर्थन के बारे में सवाल किया तो उन्होंने साफ़ कह दिया कि उनके बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है क्योंकि हिंदुस्तान में तो साधु-संत महिलाओं को अपनी माँ, बहन या बेटी मानते हैं.

इमेज कॉपीरइट FACEBOOK

'नाथूराम गोडसे भी एक राष्ट्रभक्त था'

उनका शब्दश: बयान ये है: "जब कोई संत बनता है, संन्यासी बनता है तो कपड़े पहनाने के बाद सबसे पहले उसे उसकी पत्नी के पास भेजा जाता है और वो अपनी पत्नी से भिक्षापात्र आगे करके कहता है - माँ, भिक्षाम् देहि. तो जिसकी भोग्या वस्तु थी, उसके आगे जब वो माँ कह रहा है तो संन्यास ग्रहण करने के बाद साधु के लिए हिंदुस्तान की सारी स्त्रियाँ या तो बहिन हैं या माँ हैं और छोटी हैं तो बेटी हैं."

ये वही साक्षी महाराज हैं जिन्होंने हिंदू महिलाओं को कम से कम चार बच्चे पैदा करने का सुझाव दिया था ताकि मुसलमानों की बढ़ती आबादी का जवाब दिया जा सके. महिलाओं को "भोग्या वस्तु" माने बग़ैर उन्हें चार चार बच्चे पैदा करने का सुझाव कोई कैसे दे सकता है?

ये वही साक्षी महाराज हैं जिन्होंने संसद के बाहर खड़े होकर महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया था, "नाथूराम गोडसे भी एक राष्ट्रभक्त था… आख़िरकार उसके दिल में भी दर्द था… उसका स्टेटमेंट राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत था." मगर विवाद खड़ा होने और बीजेपी की किरकिरी होने पर कह दिया कि ग़लती से कुछ कह दिया होगा.

इमेज कॉपीरइट FACEBOOK/ANIL VIJ

'गाँधी को धीरे-धीरे हटा दिया जाएगा'

पर गाँधी और गोडसे के मामले में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं का रिकॉर्ड बहुत साफ़ यूँ भी नहीं रहा है और न ही उन्हें इसकी परवाह ही है. वरना हरियाणा सरकार में वरिष्ठ मंत्री और संघ के पुराने कार्यकर्ता अनिल विज नरेंद्र मोदी को "महात्मा गाँधी से बड़ा ब्रैंड नेम" नहीं कहते और ये एलान नहीं करते कि करंसी नोटों से भी "महात्मा गाँधी को धीरे-धीरे हटा दिया जाएगा."

पर फ़िलहाल बात साक्षी महाराज की जो ख़ुद एक से ज़्यादा बार हत्या और बलात्कार के आरोपों में घिरने के बाद साफ़ बरी होकर आ चुके हैं.

उन्हें एक बार भारतीय जनता पार्टी से भी किनारा करना पड़ा और उन्हीं मुलायम सिंह यादव का दामन थामना पड़ा जिनका ज़िक्र ऊपर किया जा चुका है. अटल बिहारी वाजपेयी ने 1999 के आम चुनाव में साक्षी महाराज को टिकट नहीं दिया क्योंकि वो भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और अटल बिहारी वाजपेयी के नज़दीकी ब्रह्म दत्त द्विदेवी की हत्या के मामले में आरोपी थे. तब मुलायम सिंह यादव ने साक्षी को गले लगाया.

इमेज कॉपीरइट AFP

साक्षी महाराज बलात्कार के आरोपों में भी घिरे जब एटा की एक अध्यापिका ने उन पर ये आरोप लगाया था, जिसके कारण साक्षी महाराज एक महीने तिहाड़ जेल में बंद रहे. पर बाद में इस मामले से भी वो छूट गए.

एक बार उन्हीं के आश्रम की एक महिला ने भी उन पर बलात्कार का आरोप लगाया था, लेकिन जब मामला अदालत में पहुँचा तो पुलिस ने कह दिया कि तफ़्तीश में बलात्कार के कोई सबूत नहीं मिले. ज़ाहिर है साक्षी महाराज तभी छूटे जब ये साबित हो गया कि इन अपराधों में उनकी कोई भूमिका नहीं थी.

पर अपनी बेटी निर्भया की अनुपस्थिति के एहसास के साथ जीवन गुज़ार रही आशा देवी के लिए ये ब्यौरे किस काम के? मुलायम सिंह यादवों या साक्षी महाराजों को टीवी पर देखते हुए ग़ुस्से में जबड़े भींचने और कुछ न कर पाने की हताशा में आँसू बहाने के अलावा उनके पास रास्ता भी क्या है?

'जब गोडसे ने गांधीजी पर दागी थी तीसरी गोली'

महात्मा गांधी पर हरियाणा के मंत्री अनिल विज का विवादित बयान

सोशल: गुरमीत राम रहीम सिंह के बचाव में उतरे साक्षी महाराज

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए