‘तुम विकलांग हो, तुम्हारे बलात्कार से किसी को क्या मिलेगा?’

इलस्ट्रेशन

मैं तुम सब की तरह चल नहीं सकती, इसीलिए सब लोग मेरा मज़ाक उड़ाते हैं.

लंगड़ाती हूं, इसीलिए पुलिस मेरी बात पर यक़ीन नहीं करती.

कहती है कि, "तुम विकलांग हो, तुम्हारे बलात्कार से किसी को क्या मिलेगा?".

पर मैं सच कह रही हूं, दो आदमियों ने मेरा बलात्कार किया है.

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उनमें से एक मेरा पड़ोसी राघव था. मैं अक़्सर उसके घर जाती थी क्योंकि वहां कलर टीवी था.

टीवी देखना तो अच्छा लगता ही था, राघव भी पसंद था.

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मुझे लगता था कि उसे भी मैं अच्छी लगती हूं.

एक दिन उसने मुझसे पूछा भी, "शादी करोगी?". कमरे में जितने लोग थे, सब हंस दिए. मैं शर्मा गई.

राघव का परिवार भी मेरा ख़्याल रखता था. इसीलिए मेरी मां की नज़र में उनका घर मेरे लिए सुरक्षित था.

पर एक दिन जब मैं राघव के घर टीवी देखने गई, वो मुझे बाहर ले गया. एक कार में उसका दोस्त था और दोनों ने मुझे चिप्स और कोल्ड ड्रिंक पिलाई.

चिप्स और कोल्ड ड्रिंक तो अच्छे थे पर फिर मानो मैं नशे में चली गई.

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उसके आगे कुछ याद नहीं है. पर समझती हूं, जानती हूं कि क्या हुआ.

बाद में मेरी मां और परिवार को मैं पास की सड़क पर बेहोश पड़ी हुई मिली.

मेरी मां ही थीं जिन्होंने मेरा यक़ीन किया, मेरी चोटों को देखा, मेरा ख़्याल किया. और फिर मुझे पुलिस थाने लेकर गईं.

मैं राघव और उसके दोस्त को सज़ा दिलाना चाहती हूं. मुझे उसके दोस्त का नाम तो नहीं पता पर मैंने पुलिस को राघव का नाम बताया.

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लेकिन पुलिस को लगता है कि मैं झूठ बोल रही हूं.

मेरी चोटों के लिए पुलिस ने मुझे अस्पताल में तो भर्ती करवाया पर मेरे बार-बार कहने पर भी मेरी बात नहीं मानी.

उन्होंने मेरी मां से कहा, "तुम्हारी बेटी 'नॉर्मल' नहीं है, हम कैसे मान लें उसने सही लड़के का नाम दिया है?"

पुलिस ने केस दर्ज तो कर लिया है पर उनकी नज़र में मैं झूठी हूं. तो ना जाने तहक़ीकात कैसी होगी, अदालत में वो कैसे सबूत पेश करेंगे?

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मैं बहुत रोई. सारी हिम्मत टूट गई. आस-पड़ोस में भी सबने राघव का यक़ीन किया.

सबने कहा, "वो बहुत अच्छा लड़का है और तुम विकलांग हो, तो उसे तुमसे शारीरिक रिश्ता बनाने में दिलचस्पी क्यों होगी?"

पर मैंने तो सचमुच उसका यक़ीन किया था. जब उसने मुझे शादी के लिए पूछा था, मैंने मन में हां भी कह दिया था.

मैं उसे प्यार करती थी. लेकिन उसने इतना बुरा किया. उस एक रात ने सब बदल दिया. मेरे बड़े भाई मुझसे बहुत नाराज़ हो गए.

वो बोले, "ख़बरदार जो तुम पुलिस के पास गई, परिवार की इज़्ज़त पर दाग़ लग जाएगा."

जब मां नहीं मानीं तो हम दोनों को घर से निकाल दिया.

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अब मैं और मेरी मां, मेरी बड़ी बहन के पास रहते हैं. पर मैं अपने घर वापस जाना चाहती हूं. मैं वहीं पली-बढ़ी. वहां सब अपना था.

अब सारे दोस्त छूट गए. अब हर व़क्त डर लगता है.

मैं अपनी बहन के यहां नहीं रहना चाहती. कुछ काम कर पैसे कमाना चाहती हूं ताकि किराए पर घर लेकर मैं और मां अपने तरीके से रहें.

लेकिन ये भी आसान नहीं. मेरी पढ़ाई पूरी नहीं हुई है. स्कूल में मैं बाक़ि बच्चों से पीछे रह जाती थी, तो टीचर ने निकाल दिया.

फिर मां ने घर में पढ़ाने की कोशिश की पर मुझे वो भी समझ नहीं आता था.

इसीलिए अब एक संस्था, 'श्रुति डिसएबिलिटी राइट्स सेंटर' में छोटा व्यवसाय करने की ट्रेनिंग लेना चाहती हूं.

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लेकिन मां डरती हैं, वो चाहती हैं कि पहले अदालत में बलात्कार का केस पूरा हो जाए, बाक़ि सब उसके बाद करेंगे.

मेरा सामूहिक बलात्कार हुआ है और लोग मुझे झूठी मानते हैं. मां के लिए इस कलंक को धोना सबसे अहम् है.

मेरे लिए भी. पर ये तो दुनिया का नज़रिया है. मेरी नज़र में इस सबके बावजूद मेरे सपने ज़िंदा हैं. मैं काम भी करना चाहती हूं और शादी भी.

टीवी में देखा है, आख़िर में सब ठीक हो ही जाता है.

(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित एक विकलांग लड़की की सच्ची कहानी)

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