बच्चों के दिमाग़ी बुख़ार से ऐसे बचा बिहार!

  • मनीष शांडिल्य
  • पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार में दिमाग़ी बुख़ार

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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में बीते 11 अगस्त को 30 से अधिक बच्चों की अचानक मौत हो गई थी.

इसके बाद कई दिनों तक यह मामला राष्ट्रीय से लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया रहा.

राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन मौतों का कारण जापानी बुखार यानी इंसेफेलाइटिस बताया था.

गोरखपुर के इलाके में बीते दशकों में हजारों बच्चों की मौत इस बीमारी से हुई है.

उत्तर प्रदेश का पड़ोसी राज्य बिहार भी बीते करीब तीन दशकों से एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम यानी एईएस का सामना कर रहा है.

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लगातार कम होते मामले

जापानी इंसेफेलाइटिस यानी कि जेई एईएस का ही एक रूप है. बिहार के तिरहुत और गया प्रमंडल का इलाका इससे सबसे अधिक प्रभावित माना जाता है.

आमतौर पर तिरहुत प्रमंडल में मॉनसून के पहले तो गया प्रमंडल में मॉनसून के बाद एईएस के मामले सामने आते हैं. अभी बिहार के कुल 16 ज़िले इससे प्रभावित हैं.

लेकिन बिहार ने बीते तीन सालों में एईएस के मामलों और इससे होने वाली मौतों को उल्लेखनीय रूप से कम करने में सफलता पाई है.

2014 में बिहार में इस बिमारी से जहां 379 बच्चे मारे गए थे वहीं 2016 में यह घटकर 103 पर पहुंच गया.

इस साल तो अब तक इसके केवल 71 मामले ही सामने आए हैं जिनमें कुल 29 बच्चों की मौत हुई है.

विभागीय रणनीति

अनिल कुमार स्वास्थ्य विभाग में संयुक्त सचिव हैं.

वह बताते हैं, "2014 में बच्चों की बड़ी संख्या में हुई मौतों की छानबीन की गई और इसके बाद एक स्टेट कोर कमिटी बनाई गई. इसने एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (मानक संचालन कार्यक्रम) यानी की एसओपी तैयार किया. इसमें पांच स्तरों वाली रणनीति के तहत यह तय किया गया कि इस बीमारी के किस-किस अवस्था में किन-किन जगहों पर क्या कदम उठाने हैं."

इस एसओपी के तहत प्रभावित इलाकों में प्रशिक्षित डाक्टरों को तैनात किया गया, एंबुलेंस की व्यवस्था की गई.

साथ ही केंद्र सरकार ने इस बीमारी से लड़ने के लिए जो दवा और उपकरण मुहैया कराए थे उनका सही जगह और समय पर उपयोग सुनिश्चित किया गया.

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जागरुकता कार्यक्रमों का बड़ा रोल

साथ ही एसओपी के ज़रिए यह भी तय किया गया कि भविष्य में इस बीमारी की रोकथाम और इलाज के लिए ग्रामीण स्तर से लेकर मेडिकल कॉलेज, अस्पतालों तक में क्या-क्या किया जाना है.

इसके लिए ग्रामीण स्तर के स्वास्थ्य केंद्रों के सात सौ से अधिक स्वास्थ्य कर्मियों और साढ़े तीन सौ से अधिक डाक्टरों को प्रशिक्षित किया गया.

दूसरी ओर इस रोग से बचाव और इससे लड़ने के तरीकों पर बड़े पैमाने पर जागरूकता फैलाने के लिए वॉल पेंटिंग, नुक्कड़ नाटक से लेकर पर्चे-पोस्टर का भी सहारा लिया गया.

टॉल फ्री नंबर जारी किया गया. मीडिया के ज़रिए प्रचार-प्रसार हुआ. समुदाय के स्तर पर जागरुकता फैलाने को इस एसओपी में बहुत ज़ोर दिया गया है.

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प्राथमिक इलाज

राज्य सरकार बच्चों पर काम करने वाली वैश्विक संस्था यूनिसेफ की तकनीकी मदद से प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है.

यूनिसेफ बिहार से स्वास्थ्य विशेषज्ञ सैयद हूबे अली बताते हैं, "बच्चों को बुख़ार आने से लेकर झटके लगने के साथ ब्रेन डैमेज होने में चार से छह घंटे का समय लगता है. इस दौरान अगर बच्चे का बुख़ार कम कर दिया जाए तो ब्रेन डैमेज का ख़तरा बहुत कम हो जाता है और बच्चे की जान बचाई जा सकती है. इस ख़तरे को स्वास्थ्य से जुड़ी आशा कार्यकर्ता और एएनएम के प्रशिक्षण के ज़रिए बहुत कम किया गया है."

स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक अब पीड़ित बच्चों को सीधे मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल रेफ़र करने की जगह पीएचसी स्तर पर ही उनके प्राथमिक इलाज का इंतजाम कर लिया गया है.

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पहले से शुरू होती है तैयारी

ऐसा कर उन्हें 'गोल्डन आवर' में उचित चिकित्सा मुहैया कर उनकी जान बचाई जा रही है.

एईएस के बहुत से मामलों में यह पाया गया है कि बच्चों का शुगर लेवल बहुत कम होने (हाइपरग्लेसेमिया) के कारण उनकी मौत हो गई.

ऐसे मामलों से निपटने के लिए प्रशिक्षण के दौरान सुझाए गए तरीकों के बारे में हूबे अली ने बताया, "आशा, आंगनबाड़ी, एएनएम जैसी स्वास्थ्य कार्यकर्ता समुदाय के साथ सबसे करीब से काम करती हैं. उन्हें यह हिदायत दी गई है कि वे घर वालों के ज़रिए यह सुनश्चित करें कि बच्चे कुछ मीठा खाकर ही सोएं और दूध पिलाने वाली माताएं रात को दो-तीन बजे के करीब बच्चों को दूध ज़रूर पिलाएं."

तिरहुत और गया प्रमंडल के इलाकों में एईएस के संभावित मौसम के तीन महीने पहले से इससे बचाव, इसके प्रचार और निगरानी की तैयारी शुरू हो जाती है.

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गोरखपुर के गांव-गांव बुखार से परेशान हैं!

जेई का टीका

साथ ही एसओपी में पांच बिदुंओं वाली चेक लिस्ट के ज़रिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर मेडिकल कॉलेज अस्पतालों तक में ज़रूरी दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है और इसकी निगरानी भी की जाती है.

बिहार के 24 जिलों में अब नौ महीने और डेढ़ साल के बच्चों को जेई का टीका नियमित रूप से दिया जा रहा है.

हूबे अली कहते हैं, ''इस बीमारी के कारणों का तो अब तक पता नहीं चला है लेकिन इसके बचाव के लिए जो एसओपी बना है वो कारगर साबित हो रहा है. सरकार को चाहिए कि वह इसे और मज़बूती से लागू करे. इसकी अच्छी निगरानी करे.''

बाकी कई दूसरी बीमारियों की तरह एईएस का ख़तरा भी गंदगी के कारण बढ़ जाता है.

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जुड़वां बच्चों की मौत पर कौन जवाब देगा?

सरकारी अभियान

ऐसे में सरकार ने प्रभावित इलाकों के गावों में स्वच्छता को सुनिश्चित करने लिए नलकों के आस-पास पक्का चबूतरा बनाया है. इन नलकों से शुद्ध पेयजल मुहैया कराने के लिए इनके पाइप की गहराई बढ़ाई गई है.

स्वास्थ्य पर काम करने वाले स्वतंत्र विशेषज्ञों का कहना है कि ये सही है कि सरकारी पहल का फ़ायदा अभी दिख रहा है. लेकिन वे साथ-साथ सरकारी अभियान में स्वच्छता पर पर्याप्त ध्यान न देने को एक बड़ी कमी मानते हैं.

जन स्वास्थ्य अभियान के संयोजक डॉक्टर शकील कहते हैं, ''ग्रामीण इलाकों, ख़ासकर गरीब बस्तियों में साफ-सफाई पर विशेष अभियान चलाने की ज़रूरत है. यह काम अभी पूरी मुस्तैदी से नहीं हो रहा है. ऐसे में इस बीमारी के फिर से घातक होने का खतरा बना हुआ है.''

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कुपोषण बड़ी समस्या है

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण यानी की एनएफएसएस के जो हालिया आंकड़े सामने आए हैं उसमें बिहार के बच्चों के पोषण की स्थिति थोड़ी सुधरी है लेकिन अभी भी सूबे के आधे से अधिक बच्चे कुपोषित हैं.

ऐसे में विशेषज्ञ बच्चों का पोषण सुनिश्चित करने की पुख्ता योजना चलाने पर भी ज़ोर देते हैं.

डॉक्टर शकील बताते हैं, ''सरकार के कार्यक्रम आयरन, कैलशियम जैसे अति सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिए बनते हैं. लेकिन जब दो वक्त भरपेट खाना ही नहीं मिलेगा, खाने में प्रोटीन, विटामिन फैट आदि उपलब्ध नहीं होगा तो सिर्फ ऐसे पोषक तत्व मुहैया कराने से बच्चों का कुपोषण दूर नहीं होगा.''

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गोरखपुर: अस्पताल में कुत्ते हैं, सिलेंडर में ऑक्सीजन नहीं?

शकील आगे कहते हैं, ''पोषण के सवाल को समग्रता से हल करने के लिए सरकार को हरेक के लिए भोजन के सुरक्षा का अधिकार सुनिश्चित करना होगा, रोज़गार की सुरक्षा देनी होगी, जनवितरण प्रणाली में जारी चोरी को रोकना होगा, समेकित बाल विकास योजना को सार्वभौमिक करना होगा.''

स्वास्थ्य विभाग द्वारा प्रभावित इलाकों में बच्चो को अतिरिक्त पोषक आहार भी बांटा जा रहा है. अनिल कुमार बताते हैं, ''आने वाले दिनों में हम यह सुनिश्चित करेंगे कि प्रभावित इलाकों में कोई बच्चा कुपोषित नहीं रहे. उच्च स्तर पर यह फ़ैसला किया जा चुका है और इसके लिए भी जल्द एसओपी तैयार की जाएगी.''

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