यह भारत सवा अरब नहीं, 8 करोड़ लोगों का है!

  • 13 सितंबर 2017
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क्या भारत में आर्थिक सुधारों ने असमानता को बढ़ावा दिया है? फ़्रांस के अर्थशास्त्री लुकास चेंसल की नई रिसर्च और पूंजीवाद एवं बढ़ती असमानता पर 2013 में लिखी गई बेस्ट सेलिंग किताब कैपिटल के लेखक थॉमस पिकेटी स्पष्ट रूप से इस निष्कर्ष पर ध्यान दिलाते हैं.

घरेलू उपभोग सर्वे, फेडरल खातों और 1922 से 2014 के इनकम टैक्स आंकड़ों से पता चलता है कि नौकरीपेशा लोगों से मिलने वाली देश की राष्ट्रीय आय इस वक़्त उच्च स्तर पर है. 1922 में पहली बार व्यक्तिगत आय पर इनकम टैक्स लागू किया गया था उस समय राष्ट्रीय आय में नौकरी पेशा लोगों का योगदान एक फ़ीसदी था.

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अर्थशास्त्रियों के अनुसार, 1930 के आख़िर में कुल आय का 21 फ़ीसदी उन एक फ़ीसदी लोगों से प्राप्त होता था जिनकी आय सबसे अधिक थी, जिसमें 1980 में गिरावट देखी गई और आज वह 22 फ़ीसदी है.

वे कहते हैं, "वास्तव में भारत एक ऐसा देश है जहां पिछले 30 सालों में उन एक फ़ीसदी लोगों की आय में ख़ासी बढ़ोतरी हुई है." सचमुच भारत की अर्थव्यवस्था इस समय पिछले तीन दशकों के बड़े परिवर्तन के दौर से गुज़र रही है.

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पहले थी 3.5% की वृद्धि

1970 तक भारत समाजवादी योजना के साथ विनियमित और स्थिर अर्थव्यवस्था के रूप में बढ़ रहा था. हर साल 3.5 फ़ीसदी की वृद्धि हो रही थी जिसमें विकास कमज़ोर था. यह पूरी तरह तेज़ी से बदलती राजनीति में बाधा था और भारत ऐसा पहला ग़रीब देश बन गया जहां पूर्णतः लोकतंत्र था.

नियमों में ढील, टैक्स दरों में कमी और नए सुधारों के कारण 1980 में विकास में बढ़ोतरी हुई जो बढ़कर पांच फ़ीसदी हर साल हो गया.

इसके साथ ही 1990 की शुरुआत में इसमें पर्याप्त सुधार किए गए जिसके बाद 2000 के मध्य के आते-आते अर्थव्यवस्था में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई जो दो संख्याओं तक पहुंच गई.

विकास काफ़ी धीमा होता है लेकिन भारत अभी भी विश्व में तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है. इस समय विकास दर में गिरावट देखी गई है. अप्रैल-जून 2017 की तिमाही में यह 5.7 फ़ीसदी था जो तीन साल में सबसे निचले स्तर पर है. इसका मुख्य रूप से कारण नोटबंदी, निजी निवेश में गिरावट को माना जा रहा है.

तेज़ विकास के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेना मानते हैं कि दो दशकों के तेज़ विकास के बाद भी भारत विश्व में अभी भी सबसे ग़रीब देश हैं.

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8 करोड़ लोगों के लिए भारत

आय असमानता पर अपने काम पर लुकास चेंसल और थॉमस पिकेटी कहते हैं कि 1991 से 2012 तक आय बढ़ोतरी में काफ़ी बढ़ोतरी हुई है. साथ ही वे कहते हैं कि 10 फ़ीसदी यानी 8 करोड़ जनता के लिए भारत वास्तव में चमक रहा है.

अर्थशास्त्री दुनिया की पहली विश्व विषमता रिपोर्ट जारी करने पर विचार कर रहे हैं. इसमें 100 से अधिक रिसर्चर्स होंगे जो भारत की असमानता की तुलना दूसरा देशों से करेंगे.

वे मानते हैं कि एक समय की अवधि में असमान विकास भारत के लिए ख़ास नहीं है लेकिन बाज़ार की अर्थव्यवस्था असमान होने के लिए बाध्य नहीं हैं.

भारत का मामला थोड़ा अनोखा है क्योंकि इस देश की कुल जनसंख्या और एक फ़ीसदी लोगों के विकास में काफ़ी अंतर है और वास्तव में चीन के मुकाबले इनकी आय काफ़ी तेज़ी से बढ़ी है.

अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि सरकारों द्वारा जारी विकास रणनीति ने असमानता में तेज़ वृद्धि की है. चीन ने भी 1978 के बाद उदारवादी नीतियां अपनाईं और उसके यहां भी आय में वृद्धि के साथ-साथ असमानता में काफ़ी बढ़ोतरी देखी गई.

2000 में यह वृद्धि स्थिर हो गई थी और भारत की तुलना में आज यह निम्न स्तर पर है. रूस भी जब वामपंथ से बाज़ार अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ा तो वह क्रूर था और आज भारत के बराबर वहां असमानता है.

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सभी को मिलेगा विकास?

चेंसल कहते हैं, "यह दिखाता है कि नियमों से बंधी अर्थव्यवस्था से जब उदारवादी अर्थव्यवस्था की ओर कोई देश जाता है तो वह कितनी तरह की रणनीतियां अपनाता है. भारत ने दूसरा रास्ता अपनाया."

वह कहते हैं कि बाज़ार की अर्थव्यवस्था असमान नहीं है. उनका कहना है, "विश्व के कई हिस्सों में जब असमानता बढ़ रही है तो कई देश इस प्रवृत्ति का विरोध कर रहे हैं. उदाहरण के लिए वह कहते हैं कि असमानता उभरते हुए बाज़ारों में बढ़ रही है."

इससे साफ़ है कि नई रिसर्च भारत में अधिक समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए होने वाली बहस में मदद करेगी.

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