'चुनाव आयोग बताए क्या नीतीश ने जानकारी छिपाई?'

  • 13 सितंबर 2017
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बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ दायर एक जनहित याचिका पर सोमवार को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस भेजा.

नीतीश पर आरोप है कि उन्होंने चुनावी हलफनामों में अपने ऊपर दर्ज हत्या के एक मामले की जानकारी नहीं दी थी. इस आधार पर नीतीश की विधान परिषद सदस्यता रद्द करने के लिए दाख़िल की गई याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस भेजा गया है.

इसी साल 31 जुलाई को मनोहर लाल शर्मा ने यह जनहित याचिका दायर की थी.

पेशे से वकील मनोहर कहते हैं, "नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ एक आपराधिक मामला लंबित है. उन्होंने अपने चुनावी हलफनामों में इस तथ्य की जानकारी नहीं दी."

"इस आधार पर मैंने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि वह चुनाव आयोग को उनका निर्वाचन रद्द करने का निर्देश दें. इस तरह जानकारी छिपाना भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध है और इसके लिए नौ साल की सजा का प्रवाधान है."

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क्या है नीतीश कुमार पर हत्या के आरोप का मामला?

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क्या है मामला?

मनोहर के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से दो सप्ताह में जवाब मांगा है. इस मामले में अक्टूबर के पहले सप्ताह में अगली सुनवाई हो सकती है.

करीब 26 साल पुराना यह मामला पटना जिले के पंडारक थाने का है. 1991 के 16 नवंबर को लोकसभा चुनाव के दौरान मतदान का दिन था.

उस दिन इस थाना इलाके के ढीवर गांव के प्राथमिक विद्यालय में सीताराम सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. इस हत्याकांड से संबंधित एफ़आईआर में नीतीश कुमार सहित पांच लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया गया. यह इलाका बाढ़ लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है और तब नीतीश इस सीट पर जनता दल के उम्मीदवार थे.

2009 में नीतीश कुमार पर दफा 302 और आर्म्स एक्ट के तहत निचली अदालत ने संज्ञान लिया था. नीतीश कुमार ने संज्ञान लेने के मामले को हाइकोर्ट में चुनौती दी थी और वहां यह मामला फिलहाल लंबित है. इस आपराधिक मामले में नीतीश कुमार को बरी नहीं किया गया है.

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लालू का नीतीश पर हमला

ठंडे बस्ते में पड़ा यह मामला 26 जुलाई को उछला जब लालू प्रसाद यादव अचानक इसे चर्चा में ले आए. इसी दिन नीतीश कुमार ने महागठबंधन के मुख्यमंत्री के रूप में इस्तीफ़ा देकर भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से नई सरकार बनाने का दावा किया था.

26 जुलाई को नीतीश के इस्तीफ़े के बाद से ही लालू रह-रह कर इस मामले के बहाने नीतीश कुमार पर निशाना साधते रहे हैं.

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बीते दिनों में उन्होंने अपने एक फ़ेसबुक पोस्ट में लिखा, "नीतीश पर 302, हत्या और आर्म्स एक्ट का केस है लेकिन फिर भी कंबल ओढ़कर और दूसरों को मायावी छवि का सफेद कंबल ओढ़ाकर 'गॉड ऑफ मोरलिटी' बने हुए हैं."

इसी फेसबुक पोस्ट में उन्होंने यह सवाल भी किया था, "मित्रों, क्या हत्या जैसे संगीन जुर्म में आरोपित मुख्यमंत्री को कुर्सी पर बैठने का नैतिक अधिकार है. जहां केस ही मुख्यमंत्री बनाम बिहार राज्य का हो?"

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नीतीश की प्रतिक्रिया

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर नीतीश कुमार की प्रतिक्रया भी सामने आई है. सोमवार को पटना में उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में कहा, "सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्शन कमीशन से पूछा है तो सही बात है. कमीशन बताएगा कि क्या उनके नियम हैं. नियम के मुताबिक क्या किसको डिक्लेअर करना है.

नीतीश ने साथ ही यह भी बताया कि उन्होंने कब-कब इस मामले की जानकारी चुनाव के दौरान दी है. उन्होंने कहा, "इस मामले की जांच की अंतिम रिपोर्ट जमा किए जाने के कई वर्षों बाद कोर्ट ने शिकायत याचिका स्वीकार कर इसका संज्ञान लिया जिस पर हाइाकोर्ट ने स्टे लगा दिया. संज्ञान लेने के बाद के चुनावों में इस मामले की जानकारी मैंने दी है."

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Image caption 2012 के बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए नीतीश ने जो हलफ़नामा दायर किया था, उसमें बाढ़ के पंडारक पुलिस थान में दर्ज एक मामले का ज़िक्र किया गया है.

वहीं इस संबंध में राजद के राष्ट्रीय प्रवक्ता मनोज झा ने कहा, "अगर आप सार्वजनिक जीवन में अपने ऊपर लगे मुकदमे छिपाते हैं कहीं-न-कहीं पूरी कोशिश कुछ चीजों पर पर्दा डालने की है. और ये उचित नहीं."

जानकारों का मानना है कि अगर इस मामले में फ़ैसला नीतीश के ख़िलाफ़ जाता है तो बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ी हलचल देखने को मिल सकती है.

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