मोदी जापान से क्यों चाहते हैं टू-प्लस-टू ?

  • 13 सितंबर 2017
शिंज़ो अबे और मोदी इमेज कॉपीरइट Getty Images

डोकलाम सीमा पर 73 दिनों तक भारत और चीन के बीच चली तनातनी के समाप्त होने के बाद जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो अबे के भारत दौरे को काफ़ी अहम माना जा रहा है.

जापान के मीडिया में भी प्रधानमंत्री मोदी के कार्यकाल में शिंज़ो अबे की दूसरी यात्रा को लेकर काफ़ी गहमागहमी है.

जापानी मीडिया का कहना है कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा पर अहम समझौते हो सकते हैं. जापान के राष्ट्रीय अख़बार द मइनिची ने लिखा है कि क्षेत्रीय समुद्रो में चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच दोनों देश कई सुरक्षा समझौतों पर सहमति बना सकते हैं.

अख़बार ने यह भी लिखा है कि प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य अहमदाबाद में शिंज़ो अबे बुलेट ट्रेन की शुरुआत को लेकर आयोजित होने वाले समारोह में भी शामिल होंगे.

मइनिची ने लिखा है, ''शिंज़ो अबे ने टोक्यो छोड़ने से पहले कहा कि वह चिनकनसेन प्रोजेक्ट में बड़ा क़दम उठाना चाहते हैं. यह भारत और जापान दोनों की आर्थिक प्रगति के लिए अग्रदूत साबित होगा.''

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द मइनिची ने लिखा है, ''पूर्वी और दक्षिणी चीनी सागर के साथ हिन्द महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता के बीच शिंज़ो अबे भारत में सुरक्षा उपकरणों के साथ अमरीका, जापान और भारत के बीच साझा सैन्य अभ्यास पर बात कर सकते हैं. जापानी सरकार ने भी इस बात की पुष्टि की है.''

जापानी सरकार के सूत्रों ने मंगलवार को क्योडो न्यूज़ से कहा कि मोदी की इस बात से जापानी पीएम अबे सहमत हैं कि 'टू-प्लस-टू सिक्यॉरिटी टॉक' को बेहतर किया जाना चाहिए. इसके तहत चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच रक्षा और विदेश मंत्रियों के बीच संवाद को और सक्रिय बनाया जाना है. मोदी के साथ शिंज़ो अबे उत्तर कोरिया के उकसावे पर भी बात कर सकते हैं.

जापान टाइम्स ने भी इस बात की पुष्टि की है कि शिंज़ो अबे मोदी के टू-प्लस-टू डायलॉग को लेकर सहमत हैं. जापान टाइम्स ने एक डिप्लोमैटे के हवाले से लिखा है कि 2014 में जापान ने भी इस तरह का प्रस्ताव रखा था लेकिन अमल में नहीं आ पाया था क्योंकि भारत चीन को नाराज़ नहीं करना चाहता था.

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जापान टाइम्स ने आगे लिखा है कि हाल के दिनों में जापान, भारत और अमरीका के बीच गहरे हुए सुरक्षा सहयोग के कारण जापान को लग रहा है कि अब इसे अमल में लाने का सही वक़्त है.

अगस्त में भारत अमरीका से टु-प्लस-टु डयलॉग पर सहमत हो गया था. अब जापान भी इसका हिस्सा बनेगा. इसके तहत हिन्द महासागर में नियमित रूप से भारतीय और अमरीकी नेवी का वार्षिक मालबार नौसना अभ्यास होगा.

जापान टाइम्स ने लिखा है कि अबे परमाणु हथियार उपकरण और टेक्नलॉजी भारत को देने पर बातचीत कर सकते हैं. अभी दोनों देशों के बीच सिविल न्यूक्लियर को लेकर सहमति है.

भारत और जापान के बीच गहारते संबंधों को लेकर चीनी मीडिया भी हरकत में है. ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री ने जापान के सामने एशिया अफ़्रीका ग्रोथ कॉरिडोर का प्रस्ताव रखा है. ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि दोनों देश वन बेल्ट वन रोड की काट ढूंढ रहे हैं.

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ग्लोबल टाइम्स को चीन की सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी की सोच का मुखपत्र माना जाता है. ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि चीन को इस प्रस्ताव के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए.

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है कि जापान भी मोदी के प्रस्ताव से समहत है. इसने लिखा है कि भारत और जापान नया समुद्री मार्ग बनाना चाहते हैं जिसके ज़रिए एशिया और प्रशांत महासागर के देशों को अफ़्रीका से जोड़ा जा सके. ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक भारत और जापान चीन का प्रभाव कम करने के लिए ऐसा करना चाह रहे हैं.

ग्लोबल टाइम्स ने लिखा है, ''भारत और जापान अफ़्रीका में सक्रिय रूप से इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पर निवेश करना चाहते हैं. ऐसा कहा जा रहा है कि जापान भारत के साथ ईरान के चाबहार पोर्ट के विकास में शामिल हो सकता है. हाल के सालों में जापान और चीन के संबंध ठीक नहीं रहे हैं. दूसरी तरफ़ चीन और भारत के संबंध भी अच्छे नहीं हैं. इसी महीने दोनों देशों के बीच डोकलाम सीमा पर तनाव ख़त्म हुआ है. पिछले साल चीन ने भारत की एनएसजी सदस्यता का विरोध किया था. दूसरी तरफ़ भारत ने दलाइ लामा को लेकर चीन की आपत्तियों को ख़ारिज कर दिया था.''

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जापान और चीन के संबंध हमेशा से ख़राब रहे हैं. दूसरे विश्व युद्ध से पहले चीन को जापान से करारी मात खानी पड़ी थी.

इस मसले पर भारत के पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने बीबीसी से बातचीत करते हुए कहा था कि जापान से मिली हार को चीन आज तक नहीं भूल पाया है. उनका कहना है कि चीन को इस युद्ध में व्यापक पैमाने पर नुक़सान हुआ था.

इस तरह 1962 में भारत पर चीन ने आक्रमण किया था और भारत को हार का सामना करना पड़ा था. आज की तारीख़ में दोनों देश परमाणु शक्ति संपन्न हैं. दोनों देश एक दूसरे को प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखते हैं. कंवल सिब्बल कहते हैं कि ऐसे में जापान और भारत स्वाभाविक रूप से दोस्त बन जाते हैं.

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