प्रद्युम्न की याद में पल-पल बिलखता परिवार

  • 14 सितंबर 2017
गुड़गांव स्थित प्रद्युमन का स्कूल रायन इंटरनैशनल
Image caption गुरुग्राम स्थित प्रद्युम्न का स्कूल रायन इंटरनेशनल

बच्चों की लंबी उम्र और उसकी सुख-समृद्धि के लिए बिहार की मांओं ने बुधवार को जिउतिया का व्रत रखा. इस दिन माएं निर्जला उपवास रखती हैं और बच्चों की बेहतरी के लिए कामना करती हैं.

बिहार की एक मां हरियाणा के गुरुग्राम में भी थीं. उन्होंने भी सुबह से कुछ नहीं खाया था. पानी की एक बूंद तक नहीं पी थी. वह भी निर्जला उपवास में थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि वह अपने बेटे की याद में खाना-पानी त्याग चुकी हैं.

जब मैं प्रद्युम्न के घर पहुंचा तो नीचे के कमरे में उनकी मां सोफ़े पर बेसुध पड़ी दिखीं. उनके आसपास सात-आठ महिलाएं थीं. इनमें से एक महिला ने प्रद्युम्न की मां का हाथ थाम रखा था.

सभी महिलाएं शांत थीं, शोर सिर्फ़ पंखे का था.

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प्रद्युम्न के घर पर पसरा सन्नाटा

भरी दोपहरी में बाहर टेंट लगा था. वहां कुर्सी पर प्रद्युम्न कृष्ण रूप धारण कर तस्वीर में मुस्कुरा रहा था. लेकिन वहां बैठे लोगों के चेहरे पर गहरी उदासी छाई थी.

मेरे हाथ में बीबीसी का माइक था. जैसे ही उनके पास गया, उनमें से एक ने मुझे इशारे से ज़मीन पर बैठ जाने को कहा. माहौल काफ़ी गमगीन था. मुझे हिम्मत नहीं हुई कि मैं किसी से कुछ पूछ पाऊं.

बहुत देर तक बैठने के बाद मैं उठकर प्रद्युम्न के घर के भीतर गया. इस बार मुझे उनके फुफेरे भाई मुकुल मिले. मुकुल बेंगलुरू से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं. वो मौत की ख़बर सुनकर दिल्ली पहुंचे थे.

मुकुल ने धीमी आवाज़ में बताया, "प्रद्युम्न की मां बीमार की तरह पड़ी रहती हैं. आसपास की महिलाएं आती-जाती रहती हैं. लोग बहुत होते हैं पर सन्नाटा बना रहता है."

Image caption प्रद्युमन की साइकिल

'प्रद्युम्न ने स्केटिंग में लिया था एडमिशन'

सीढ़ियों से प्रद्युम्न के पिता वरुण चंद्र ठाकुर आते दिखे. वो मुझे देखकर रुक गए. मुझे कुर्सी पर बैठने को कहा. मेरे साथ वाली कुर्सी पर वो भी बैठ गए.

इससे पहले कि मैं कुछ पूछता, उनकी नज़र प्रद्युम्न की साइकिल पर पड़ी.

वो भावुक होकर उसकी ओर इशारा करते हुए बोले, "प्रद्युम्न खेल में काफ़ी ऐक्टिव था. उसे टीवी देखने या मोबाइल गेम से ज़्यादा पसंद था स्पिनर चलाना, क्रिकेट खेलना और साइकिल चलाना. वह स्पोर्ट्स ऐक्टिविटी में ज़्यादा दिलचस्पी लेता था. इस साल उसने ज़िद करके स्केटिंग में एडमिशन लिया था. ये उसकी तीसरी साइकिल है."

वह आगे बताते हैं, "आप उसके स्कूल के फ़ेसबुक पेज पर जाएंगे तो हर चार-पांच पोस्ट में से एक में प्रद्युम्न दिख जाएगा. पिछले टीचर्स डे पर उसने कार्यक्रम का संचालन किया था. इसके लिए प्रद्युम्न की टीचर ने उसकी मां से खूब तारीफ़ की थी."

प्रद्युम्न की बड़ी बहन भाई की हत्या के बाद काफ़ी ख़ामोश रहने लगी है. वरुण बताते हैं, "मेरी बड़ी बेटी बहुत ख़ामोश रह रही हैं, हम कोशिश कर रहे हैं कि उसे दूसरे बच्चों के साथ व्यस्त रखें ताकि उसका ध्यान अपने भाई की तरफ न जाए. लेकिन डर लग रहा है कि जब सभी चले जाएंगे तो वह कैसे रहेगी. हमलोग कैसे रहेंगे, पता नहीं."

Image caption प्रद्युम्न के चाचा तरुण चंद्र ठाकुर

'क्रिकेट की किट नहीं दिला पाने का अफ़सोस'

13 दिनों तक चलने वाला श्राद्ध कर्म उसके चाचा तरुण चंद्र ठाकुर कर रहे हैं. वह जमशेदपुर के ज़िला कलेक्टरेट में नौकरी करते हैं.

तरुण ने बताया, "प्रद्युम्न का जन्म 7 मई 2010 को हुआ था. हम दो भाइयों की तीन बेटियों में वह अकेला लड़का था. हालांकि हम बेटे-बेटी में फ़र्क नहीं समझते, लेकिन वह अपने दादा के लिए कुलदीपक (वंश बढ़ाने वाला) था. वे उसे कुलदीपक ही कह कर बुलाते थे."

उन्होंने कहा, "प्रद्युम्न हंसमुख बच्चा था. जब भी छुट्टियों में जमशेदपुर आता था, वह सुबह मेरे ऊपर चढ़कर खेलने लगता था. वह क्रिकेट का बहुत शौक़ीन था. वह हर मैच देखता था. हर प्लेयर को पहचानता था."

तरुण अफ़सोस भरे लहज़े में आगे कहते हैं, "मैं उसकी हर मांग को पूरा करता था, पर शायद एक बात की कसक पूरे जीवन रहेगी कि उसने क्रिकेट किट की मांग की थी, जिसे मैं पूरी नहीं कर पाया."

वो कहते हैं, "वह आम का भी शौक़ीन था. जब भी हमलोग मधुबनी में अपने गांव जाते थे, मैं 35 किलो आम उसके लिए लाता था. वह दिनभर खाता रहता था."

Image caption प्रद्युम्न की बुआ विनिता

'प्रद्युम्न कविताएं भी लिखता था'

प्रद्युम्न की बुआ विनिता जमशेदपुर में शिक्षिका हैं. वह उसे याद करते हुए कहती हैं, "प्रद्युम्न पढ़ने में बहुत अच्छा था. उसे हिंदी बहुत पसंद थी. वह कविताएं भी लिखता था. उसकी कविताओं की कुछ पंक्तियां दिल को छूने वाली होती थी. मैं उसकी मां से हमेशा कहा करती थी कि उसका बेटा बड़ा होकर कवि बनेगा क्योंकि उसे हिंदी में काफ़ी रुचि थी."

विनिता प्रद्युम्न की मां की देखभाल कर रही हैं. वे उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़तीं. वो कहती हैं, "बच्चे को किस वक्त क्या करना है, उसकी मां बखूबी जानती थीं. वह उसी में व्यस्त रहती थीं. शायद यह चीज़ें अब उन्हें खलेंगी."

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