ब्लू व्हेल से ख़ौफ़ से क्यों सहमा हुआ है भारत?

  • अपर्णा अल्लूरी
  • बीबीसी न्यूज़
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प्रतीकात्मक तस्वीर

ब्लू व्हेल चैलेंज को लेकर भारत में भय का सा माहौल बन गया है. पिछले दिनों कई किशोरों और युवाओं की आत्महत्या के कई मामलों को इस चैलेंज से जोड़ा गया है.

हालांकि पुलिस ने इन मौतों और चैलेंज के बीच कोई सीधा संबंध होने की पुष्टि नहीं की है. कई देशों में किशोरों द्वारा आत्महत्या करने के मामलों में इस चैलेंज का ज़िक्र है, मगर पुलिस पक्के तौर पर नहीं कह पाई है कि इस तरह का कोई चैलेंज वास्तव में है भी या नहीं.

पिछले दिनों ख़ुदकुशी करने वाले कुछ बच्चों के माता-पिता ने पत्रकारों को बताया कि उन्होंने ऐसा ब्लू व्हेल के प्रभाव में आकर किया. इस आरोप की भी पुलिस पुष्टि नहीं कर सकी है.

मगर भारतीय मीडिया ने किशोरों की आत्महत्या और ब्लू व्हेल के बीच कथित रूप से रिश्ता होने की खबरों को बड़े स्तर पर कवर किया है और अब प्रशासन को 'ब्लू व्हेल के ख़तरे' से निपटने में मुश्किल हो रही है.

शुक्रवार को भारत का सुप्रीम कोर्ट इस कथित चैलेंज को बैन करने की मांग कर रही याचिका की सुनवाई करने वाला है.

इससे पहले, केंद्र सरकार ने फेसबुक, गूगल, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप को ब्लू व्हेल से संबंधित ग्रुप या साइट्स के कथित 'लिंक' हटाने के लिए कहा था, मगर यह स्पष्ट नहीं है कि यह काम कैसे किया जा सकता है.

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एक्सपर्ट मान रहे हैं अफ़वाह

इस बीच, स्कूलों ने भी छात्रों को ब्लू व्हेल के खतरों से आगाह करना शुरू कर दिया है.

उत्तर प्रदेश में प्रशासन ने स्कूलों में स्मार्टफोन बैन कर दिए हैं और पंजाब के एक स्कूल ने अपने छात्रों को आधी बांह वाली कमीज़ पहनने को कहा है ताकि वे व्हेल जैसे दिखने वाले टैटू चेक कर सकें. कथित तौर पर इस टैटू को ब्लू व्हेल चैलेंज में शामिल होने का सबूत माना जाता है.

मगर इंटरनेट के एक्सपर्ट मानते हैं कि ब्लू व्हेल चैलेंज एक अफवाह मात्र है. यूके सेफर इंटरनेट सेंटर ने इसे 'सनसनीखेज फर्ज़ी ख़बर' करार दिया है.

सबसे पहले रूसी मीडिया में इस चैलेंज की वजह से आत्महत्या होने की खबरें आई थीं मगर अब वे झूठी बताई जा रही हैं.

रूसी सोशल मीडिया नेटवर्क Vkontakte, जहां पर यह चैलेंज कथित तौर पर शुरू हुआ था, ने ब्लू व्हेल हैशटैग के लिए 'हज़ारों बॉट्स' को ज़िम्मेदार पाया है.

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मीडिया में लगातार आ रही हैं खबरें

मगर भारत के मीडिया में कथित रूप से ब्लू व्हेल को लेकर आत्महत्या करने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं और स्कूल किसी तरह किसी तरह की ढील नहीं बरतना चाह रहे.

पंजाब के स्प्रिंग डेल स्कूल के प्रिसिंपल राजीव शर्मा ने 16 साल के बच्चों से भरे कमरे में कहा, "मेरी राय में यह एकदम ड्रग्स की तरह है. इस दिशा में एक कदम तक नहीं बढ़ना चाहिए."

उन्होंने कहा, "बस एक मंत्र याद रखें- ज़िंदगी से बढ़कर कुछ भी नहीं है."

राजीव शर्मा का भाषण सुनने के बाद एक छात्र शिवराम राय लूथरा ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मैं बहुत डर गया था. अगर कोई चीज़ आपके साथ ऐसा कर सकती है तो आपको इसे ट्राइ भी नहीं करना चाहिए. आपको इसे सर्च करना तो दूर, इसके बारे में सोचना तक नहीं चाहिए."

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स्कूल अनजाने में कर रहे प्रचार

मगर ब्लू व्हेल को लेकर स्कूलों में चल रहे इस तरह के कार्यक्रमों को सभी लोग सही नहीं मानते.

इंटरनेट रिसर्चर सुनील अब्राहम बीबीसी से कहते हैं, "स्कूल ब्लू व्हेल पर सेशन करके दरअसल उसका प्रचार कर रहे हैं." वह कहते हैं कि सिर्फ़ ब्लू व्हेल पर क्यों बात हो रही है. इंटरनेट से जुड़ी हर समस्या पर बात होनी चाहिए, जिसमें ऑनलाइन बुलिइंग और सेक्स्टिंग शामिल हैं."

वह कहते हैं, "हम नैतिक घबराहट के दौर से गुज़र रहे हैं. इससे उन कारणों की उपेक्षा होती है, जिनके कारण लोग आत्महत्या करते हैं."

2012 में हुआ एक शोध बताता है कि भारत में युवाओं की मौत की दूसरी सबसे बड़ी वजह आत्महत्या है. ध्यान देने वाली बात यह भी है कि आत्महत्या के जिन मामलों को ब्लू व्हेल से जोड़ा गया है, उन मामलों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं उपलब्ध है.

खुदकुशी के मामलों को ब्लू व्हेल से जोड़े जाने की यह वजह बताई जाती है कि अपनी जान लेने से पहले टीनेजर ने व्हाट्सएप ग्रुप में ब्लू व्हेल का ज़िक्र किया होता है या फिर पिछले कुछ वक्त से उसके फोन पर चिपके रहने की बात कही जाती है.

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टेक्नोलॉजी पर लिखने वालीं माला भार्गव कहती हैं, "किसी ने भी इन बच्चों के बीते कल के बारे में जानने की कोशिश नहीं की. आराम से बैठकर कयास लगाना आसान है."

कहानियां गढ़ने लगते हैं लोग

दिल्ली के साइकाइट्रिस्ट डॉक्टर अचल भगत बताते हैं कि वह हर रोज़ युवाओं से बात करते हैं, लेकिन आज तक ब्लू व्हेल के एक भी केस से उनका सामना नहीं हुआ.

डॉक्टर भगत ने कहा, "लोग अपने अनुभवों के बारे में बताने के लिए गप्पें बनाने में लग जाते हैं. शायद इसीलिए बहुत से बच्चों ने इस चैलेंज में शामिल होने का दावा कर दिया, भले ही इस गेम के अस्तित्व का कोई सबूत नहीं है."

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डॉक्टर भगत कहते हैं कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दिया जाता क्योंकि भारत में आत्महत्या को रोकने या के लिए न तो कोई नेशनल प्रोग्राम है और न ही स्कूलों में मेंटल हेल्थ को बेहतर करने के लिए किसी तरह के दिशा-निर्देश हैं.

वह कहते हैं, "जब आपको यही नहीं मालूम कि बच्चों से रोज़ाना कैसे बात करनी चाहिए, तो आप उस वक्त कैसे बातचीत कर पाएंगे जब वे किसी परेशानी में होंगे?बच्चों को कुछ न करने से रोकने और हिदायतें देते रहने के बजाय उनकी बातों को सुनना-समझना चाहिए."

क्या है ब्लू व्हेल?

ब्लू व्हेल की शुरुआत को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है. मगर माना जाता है कि इसका नाम उन ब्लू व्हेल्स के आधार पर रखा गया है, जो अक्सर खुद तट पर आ जाती हैं, जिससे उनकी मौत हो जाती है.

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ब्लू व्हेल चैलेंज और ख़ुदकुशी के बीच लिंक होने की पुष्टि नहीं हो सकी है.

कथित तौर पर एक ऑनलाइन समूह इस नाम को इस्तेमाल कर रहा है. यह समूह कथित तौर पर चैलेंज में हिस्सा लेने वालों के लिए एक मुखिया चुनता है और फिर यह मुखिया अगले 50 दिनों तक इस चैलेंज में हिस्सा ले रहे लोगों को अलग-अलग टास्क देता है.

बताया जाता है कि टास्क की शुरुआत बेहद डरावनी फिल्म या वीडियो देखने से होती है और आखिर में ख़ुदकुशी तक ये टास्क और भयावह होते चले जाते हैं.

दुर्भाग्य से टीनेजर्स ऐसे सोशल मीडिया ग्रुप्स की तरह आसानी से आकर्षित हो जाते हैं, जिनका उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है.

ब्लू व्हेल से जुड़े ऑनलाइन ग्रुप के फ़ेसबुक और यूट्यूब पर हज़ारों सदस्य और सब्सक्राइबर बताए जाते हैं. ब्लू व्हेल नाम रूस, यूक्रेन, स्पेन, पुर्तगाल, फ्रांस और यूके जैसे देशों में भी सामने आ चुका है.

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