जब एक विकलांग ने गाया 'कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है…'

  • 10 अक्तूबर 2017
इलस्ट्रेशन

'कभी कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है…', साहिर लुधियानवी की ये ग़ज़ल सुनते हुए ना जाने किस-किस का चेहरा आपके ज़हन में आया होगा.

आज एक बार इसे याद कीजिए और सोचिए कि व्हीलचेयर पर बैठा एक मर्द एक नेत्रहीन औरत का हाथ पकड़े उसे ये ग़ज़ल सुना रहा है.

'के ये बदन ये निगाहें मेरी अमानत हैं…'

या सोचिए कि मर्द की एक बांह नहीं है और जिस औरत के लिए वो ये गा रहा है, वो बोल नहीं सकती.

'ये गेसुओं की घनी छाँव हैं मेरी ख़ातिर… ये होंठ और ये बाहें मेरी अमानत हैं...'

मुश्किल हो रही होगी. विकलांग लोगों की दुनिया के बारे में जानकारी और कौतूहल इतना कम है कि हमारे ख़यालों का दायरा भी बहुत सीमित है.

किसी विकलांग औरत और मर्द के बीच प्यार, जिस्मानी चाहत या शादी की तस्वीर हमारे मन में क्यों नहीं उभरती?

और कैसी है वो तस्वीर? आने वाले तीन दिनों में मेरे लेख इसी दुनिया में झांकने की कोशिश करेंगे.

'विकलांग को दिव्यांग ना कहें'

विकलांग नहीं हूँ मैं.......

मैं एक कॉलेज जाने वाली नेत्रहीन लड़की से मिली. उसके लंबे बाल, तीखे नैन नक्श और दिल से कही बातें ज़हन में बस गईं.

पढ़ाई और खेल में अव्वल उस होनहार लड़की की ज़िंदगी के अनुभव मेरे और मेरी सहेलियों के बहुत क़रीब थे.

पहली बार प्यार उसे भी हुआ था. एक लड़के के क़रीब आने की चाहत थी.

धोखा ना हो जाए, ये डर था. और रिश्ता ख़त्म हो गया तो ख़ालीपन की बेचैनी.

बस ये सब महसूस करने का उसका अनुभव अलग था.

एक और लड़की की कहानी जानी मैंने. उसका सामूहिक बलात्कार हुआ. उसी के पड़ोसी और उसके दोस्त ने किया.

पर कोई मानने को तैयार नहीं है की एक विकलांग लड़की का बलात्कार हो सकता है.

पुलिस, पड़ोसी और ख़ुद उसका परिवार उसका विश्वास नहीं करता. पूछते हैं कि विकलांग लड़की के बलात्कार से किसी को क्या मिलेगा?

ये उसके लिए सबसे दर्दनाक है. बलात्कार की हिंसा से भी ज़्यादा.

हिंसा ने उसे तोड़ा नहीं है. वो आगे बढ़ना चाहती है, फिर प्यार करना चाहती है.

जब किसी को बोझ समझा जाए तो उससे प्यार होगा, हमदर्दी, उस पर तरस आएगा या उसका ग़लत फ़ायदा उठाया जाएगा?

किसी विकलांग के लिए ये समझना सबसे ज़रूरी है. ख़ास तौर पर तब जब वो प्यार या शादी का रिश्ता बनाना चाहते हों.

सामान्य व्यक्ति किसी विकलांग से शादी करे ऐसा कम ही होता है. अक़्सर दो विकलांग ही आपस में शादी करते हैं.

पर वो भी बहुत कम होता है क्योंकि विकलांग व्यक्तियों की शादी को उनके परिवार अहमियत ही नहीं देते. साथ ही इसे बोझ बढ़ाने जैसा मानते हैं.

विकलांग व्यक्ति से शादी को बढ़ावा देने के लिए ही भारत के कई राज्यों में एक सरकारी योजना लाई गई है जिसके तहत पैसों से मदद दी जा रही है.

बिहार में एक विकलांग दम्पति से मिलकर मैंने ये जानने की कोशिश की कि पैसे की नींव पर बने इन रिश्तों की उन लोगों के लिए क्या अहमियत है.

एक वायदा कीजिए कि जब पढ़ लेंगे इन तीन अनुभवों को तो एक बार फिर गुनगुनाएंगे, 'कभी-कभी मेरे दिल में, ख़याल आता है…'

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