नज़रिया: 'राजस्व के लिए तेल पर टैक्स के सिवा सरकार के पास दूसरा रास्ता नहीं'

  • 15 सितंबर 2017
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आज की तारीख में पेट्रोलियम और डीज़ल की क़ीमत उससे भी आगे निकल गई है जो तीन साल पहले देश में पेट्रोलियम और डीज़ल की क़ीमत थी.

लेकिन इन तीन सालों में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत आधी हो गई है. जून, 2014 में कच्चे तेल की क़ीमत लगभग 115 डॉलर प्रति बैरल हुआ करता था, जो आज की तारीख में गिर कर 50 डॉलर के आसपास पहुंच गया है.

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भारत अपना 80 फ़ीसदी कच्चा तेल विदेश से आयात करता है. भारत पैसों के हिसाब से जितनी चीज़ों का आयात करता है उसमें 33 फ़ीसदी हिस्सा कच्चे तेल का ही है.

कच्चे तेल को तैयार करके जब पंपों पर बेचा जाता है, उसमें लागत के अलावा एक्साइज ड्यूटी और कस्टम ड्यूटी जुड़ जाती है. एक्साइज और कस्टम ड्यूटी भारत सरकार का वित्त मंत्रालय बढ़ाता है, लगाता है और ये पूरा का पूरा पैसा सरकार की झोली में जाता है.

सरकार का फ़ायदा

तो इस लिहाज से देखें तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत गिरने से जो भी फ़ायदा हुआ है इसका 75 से 80 फ़ीसदी फ़ायदा सरकार अपने पास रख रही है, केवल 20 से 25 फ़ीसदी लाभ उपभोक्ताओं को मिला है.

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एक उपभोक्ता के लिहाज से देखें तो प्रति लीटर जो पैसा हम आप प्रति लीटर दे रहे हैं, उसका क़रीब आधा पैसा सरकार के पास पहुंच रहा है. अलग अलग राज्यों में अलग अलग कर ज़रूर है लेकिन उपभोक्ता जो पैसा चुकाते हैं और उसका आधा हिस्सा सरकार के पास पहुंचता है.

सरकार को फ़ायदा हो रहा है लेकिन इसका बोझ आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है. अर्थशास्त्रियों के मोटा मोटी अनुमान है कि पिछले तीन साल में कम से कम पांच लाख करोड़ रुपये सरकार के पास इस तरह जमा हुआ है.

आज आप पाकिस्तान में देखें, बांग्लादेश, श्रीलंका में देखें, हर देश में पेट्रोल और डीज़ल का दाम भारत से कम है. लेकिन भारत में ये दाम कम नहीं हो रहा है क्योंकि केंद्र सरकार एक्साइज और कस्टम ड्यूटी कम नहीं कर रही है.

महंगाई बढ़ रही है

आम आदमी की जेब पर केवल पेट्रोल और डीज़ल का ख़र्चा नहीं बढ़ता है, हर चीज़ महंगी होती है. हर चीज़ जो एक जगह से दूसरी जगह जाती है, वह महंगी होगी ही क्योंकि उसको लाने-ले जाने का ख़र्च बढ़ जाता है. मुद्रा स्फ़ीति बढ़ रही है. थोक मूल्य सूचकांक में बढ़ोत्तरी होती है.

बीते तीन साल में जो महंगाई कम नहीं हो रही है उसकी एक वजह तो पेट्रोलियम और डीज़ल की क़ीमतों का कम नहीं होना भी है.

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पेट्रोलियम और डीज़ल की क़ीमतें कम नहीं करके सरकार अपनी तिजोरी भर रही है. क्योंकि इंडियन ऑयल हो या भारत पेट्रोलियम, ये सब सरकार की कंपनियां हैं. हालांकि तेल की क़ीमतें कम नहीं होने से कुछ निजी कंपनियों को भी फ़ायदा हो रहा है, लेकिन उनका हिस्सा अभी कम ही है.

सरकार पेट्रोलियम पर ड्यूटी कम क्यों नहीं कर रही है, इसका जवाब तो प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ही दे सकते हैं. लेकिन जो तस्वीर सामने है, उससे इसकी वजह का पता तो चलता है. भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक ही कुल सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट देखने को मिल रही है.

अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत ख़राब है. निजी क्षेत्रों में निवेश नहीं हो रहा है. लोगों को नौकरियां नहीं मिल रही हैं. बैंकों का बहुत सारा पैसा डूबा हुआ है.

आमदनी का दूसरा रास्ता नहीं

इन सबके बीच सरकार ने नोटबंदी का फ़ैसला ले लिया. उससे सबकुछ अनिश्चित सा हो गया. सरकार के पास आमदनी का कोई दूसरा रास्ता नहीं है. राजस्व जुटाने के लिए मौजूदा सरकार के पैसा पेट्रोलियम पर टैक्स वसूलने के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं है.

और यही वजह है कि मौजूदा सरकार पेट्रोलियम तेलों पर टैक्स को कम नहीं कर रही है और ना ही उसकी ऐसा करने की कोई राजनैतिक इच्छाशक्ति नज़र आती है.

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लेकिन भारत के पेट्रोलियम मंत्री ये ट्वीट करते हैं कि दुनिया के कई देशों में भारत से महंगा पेट्रोल-डीज़ल मिलता है. लेकिन मंत्रीजी ये नहीं बताते हैं कि वे विकसित देशों की तुलना भारत जैसे विकासशील देश से कर रहे हैं.

जापान जैसे देश में आम आदमी की आमदनी भी भारत के प्रति व्यक्ति आय की तुलना में दस गुना ज़्यादा होती है. दरअसल ऐसी तुलनाएं भ्रम फैलाने का काम करती हैं ताकि आम आदमी असलियत से दूर रहे.

( बीबीसी संवाददाता प्रदीप कुमार से बातचीत पर आधारित )

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