ब्लॉग: 24 अकबर रोड में जब रहती थीं सू ची!

  • रशीद किदवई
  • राजनीतिक विश्लेषक
आंग सान सू ची

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नोबेल पुरस्कार विजेता और म्यांमार की नेता आंग सान सू ची पर इस समय नैतिक ज़िम्मेदारी की उपेक्षा करने और रोहिंग्या मुसलमानों के विस्थापन के आरोप लग रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र ने इस मामले पर सख़्त टिप्पणी की लेकिन सू ची ने बोला कम और किया कुछ भी नहीं. वह बेहद ज़िद्दी और बेपरवाह नज़र आती हैं.

सू ची जब युवा थीं तब उन्होंने दिल्ली के जीज़ज़ एंड मैरी स्कूल और लेडी श्रीराम (एलएसआर) कॉलेज में अपनी पढ़ाई की. उस समय के दिल्ली के कई लोग मानते हैं कि उनका स्टैंड थोड़ा विचित्र था. 1960 की शुरुआत में नई दिल्ली में सू ची को राजनीति की जटिलताएं क्लास के द्वारा पता चलीं.

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रोहिंग्या संकट को मानवीय नज़र से देखें सू ची: शेख़ हसीना

24 अकबर रोड में रहने आईं

सू ची मुश्किल से 15 साल की थीं जब वह अपनी मां डॉ खिन की के साथ 24 अकबर रोड आई थीं जो अब कांग्रेस का मुख्यालय है. उनकी मां को भारत में म्यांमार का राजदूत नियुक्त किया गया था. डॉ खिन की ख़ास हैसियत के मद्देनज़र जवाहरलाल नेहरू ने 24 अकबर रोड का नाम बर्मा हाउस रखा था.

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नज़रबंदी के दौरान 1995 में सू ची

1911 से 1925 के बीच सर एडविन लुटियंस द्वारा बनाया गया यह घर आधुनिकता और ब्रिटिश औपनिवेशिक वास्तुकला का अद्भुत नमूना माना जाता था.

स्कूल और एलएसआर की अपनी पढ़ाई के दौरान सू ची ने आधुनिक लोकतंत्र के गुणों को सीखा और 'बहुआयामी' प्रणाली की विशेषता को जाना. भारत में बिताए समय ने सू ची को एक राजनीतिज्ञ के रूप में गढ़ने में मदद की जिसके कारण 1991 में उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार मिला.

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सू का कमरा आज राहुल के पास

एलएसआर में सू ची ने राजनीति और महात्मा गांधी के दर्शन को औपचारिक और पढ़ाई के रास्ते से जाना. गांधी की अहिंसा की वकालत, सविनय अवज्ञा द्वारा किया गया प्रतिरोध और सत्याग्रह द्वारा सत्तावादी शासनों के विरोध के तरीकों ने सू के दिमाग में बैठ गए.

सालों बाद एलएसआर में पढ़ाई और 24 अकबर रोड में रहने के दौरान उन्होंने जो सीखा वह बताया था कि, "ताक़त नहीं बल्कि डर भ्रष्ट करता है. ताक़त खोने का डर उन लोगों को भ्रष्ट कर देता है जो इसे चलाने की कोशिश करते हैं और ताक़त के अभिशाप का डर उनको भ्रष्ट कर देता है जो इसके अधीन हैं."

1961 में सू ची जब युवा, दुबली-पतली हुआ करती थीं और उनकी लंबी चोटी थी तब उन्होंने वह कमरा चुना था जो अब राहुल गांधी को कांग्रेस उपाध्यक्ष होने के नाते मिला हुआ है. सू ने यह कमरा इसलिए चुना था क्योंकि उनके पास एक बड़ा पियानो था.

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संजय-राजीव के साथ राष्ट्रपति भवन

हर शाम एक शिक्षक उन्हें पियानो सिखाने आती थीं और सू जल्द ही पश्चिमी शास्त्रीय संगीत की सूक्ष्म बारीकियों में जल्द ही रुचि लेने लगीं. सालों बाद जब रंगून में यूनिवर्सिटी एवेन्यू के झील के किनारे के एक पुराने घर में सू ची को नज़रबंद किया गया था तब उनको दिए गए पियानो ने उन्हें काफ़ी राहत दी और अपनी सज़ा के अवसाद को कम करने के लिए वह घंटों पियानो बजाती थीं.

सू 24 अकबर रोड को बहुत पसंद करती थीं और भव्यता, शांति भरे कमरों के कारण उन्हें लगाव था. उनकी जीवनी के लेखक जस्टिन विंटल बताते हैं कि 24 अकबर रोड ऐसी जगह थी जहां सू ने अपने जीवन में पहली बार विलासिता का अनुभव किया था.

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क्या नोबेल वापस करेंगी आंग सान सू ची?

24 अकबर रोड पर सू ने जापानी फूलों की व्यवस्था करना सीखा और वह शानदार बगीचे में संजय और राजीव गांधी के साथ खेला करती थीं. दोनों उनके समकालीन थे, एक उनसे एक साल बड़ा था और दूसरा उनसे एक साल छोटा था. तीनों को अक्सर राष्ट्रपति भवन में देखा जाता था जहां वह राष्ट्रपति के अंगरक्षकों के साथ घुड़सवारी का सबक सीखते थे.

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सू पर प्रशंसकों को आश्चर्य

हालांकि, यह साफ़ नहीं है कि सू पर इंदिरा गांधी का कोई असर था या नहीं. सू जब किशोर थीं तब उन्होंने जीज़ज़ एंड मैरी स्कूल से पढ़ाई शुरू की थी जो नई दिल्ली में गोल डाक खाने के पास सेंट जोज़फ़ चर्च के पास एक स्थित है.

सू ने स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद एलएसआर में राजनीति शास्त्र के कोर्स में दाख़िला लिया. यह दरियागंज में था तब इसमें 300 छात्र थे. इसके संस्थापक लाला श्री राम एक प्रसिद्ध उद्योगपति, समाजसेवी और नेहरू के दोस्त थे.

सू ची के समकालीन और प्रशंसक आश्चर्य में हैं कि म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचार के ख़िलाफ़ उन जैसी नेता बोलती क्यों नहीं हैं.

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