नहीं रहे भारत के एकमात्र मार्शल अर्जन सिंह

  • 16 सितंबर 2017
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भारतीय वायुसेना के सबसे वरिष्ठ और पांच तारे वाले रैंक तक पहुंचे इकलौते मार्शल अर्जन सिंह की मौत हो गई है.

उन्हें शनिवार सवेरे दिल का दौरा पड़ा था जिसके बाद उन्हें आर्मी अस्पताल में भर्ती कराया गया था. वो 98 साल के थे.

अर्जन सिंह को 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में अहम भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है. वह इकलौते फाइव स्टार रैंक के अफ़सर थे.

सरकारी समाचार एजेंसी पीआईबी ने उनकी मौत की पुष्टि की है.

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शनिवार दोपहर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण उनसे मिलने अस्पताल पहुंचे थे और उनके जल्द स्वस्थ्य होने की कामना की थी.

19 की उम्र में पायलट बनने के लिए चुने गए

1970 में भारतीय वायुसेना से रिटायर हुए अर्जन सिंह को सम्मान में भारत सरकार ने जनवरी 2002 में उन्हें वायुसेना का मार्शल रैंक दिया था.

मार्शल रैंक फ़ील्ड मार्शल के बराबर होता है जो केवल थल सेना के अफ़सरों को दिया जाता रहा था. के.एम. करियप्पा और सेम मानेकशॉ दो ऐसे थल सेना के जनरल थे जिन्हें फ़ील्ड मार्शल बनाया गया था.

अर्जन सिंह वायु सेना और ग़ैर थल सेना के ऐसे पहले अफ़सर थे जिन्हें मार्शल का रैंक दिया गया था.

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Image caption 23 सितंबर 1965 को आर्मी जनरल जेएन चौधरी के साथ मार्शल अर्जन सिंह.

15 अप्रैल 1919 में पंजाब के लायलपुर में जन्मे अर्जन सिंह ने अपनी प्रारंभिक शित्रा मॉन्टेगोमेरी स्कूस से पूरी की थी. 19 साल की उम्र में रॉयल एयरफ़ोर्स कॉलेज क्रानवेल में एंपायल पायलट ट्रेनिंग कोर्स के लिए उन्हें चुना गया था.

1944 में स्क्वॉड्रन लीडर के रूप में उन्हें पदोन्नति दी गई और उन्होंने बर्मा में अराकन अभियान के दौरान जापानी सेना के ख़िलाफ़ अपने हवाई दस्ते का नेतृत्व किया. इसके लिए उन्हें ब्रिटिश सेना का प्रतिष्ठित फ्लाइंग क्रॉस पुरस्कार से नवाज़ा गया.

हवा से दी थी आज़ाद भारत को सलामी

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Image caption मार्शल अर्जन सिंह के परिवारवालों के साथ प्रधानमंत्री मोदी

देश जब 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ तब अर्जन सिंह को 100 भारतीय वायु सेना के उन विमानों का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई जो दिल्ली और लाल किले के ऊपर से गुज़रे थे.

1 अगस्त 1964 को 45 साल की उम्र में वह भारतीय वायु सेना के प्रमुख बने और अर्जन सिंह ऐसे पहले वायु सेना प्रमुख थे जिन्होंने चीफ़ ऑफ़ एयर स्टाफ़ यानी प्रमुख रहते हुए भी वो विमान उड़ाते रहे और अपनी फ्लाइंग कैटिगरी को बरकार रखा.

उन्होंने अपने कार्यकाल में 60 तरह के विमान उड़ाए जिनमें विश्वयुद्ध 2 के वक्त के बाइप्लेन से ले कर नैट्स और वैम्पायर प्लेन शामिल हैं.

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युद्ध में भारतीय वायु सेना की भूमिका को देखते हुए चीफ़ ऑफ़ एयर स्टाफ़ के पद को बढ़ाकर एयर चीफ़ मार्शल कर दिया गया और वह वायु सेना के पहले एयर चीफ़ मार्शल नियुक्त हुए. 44 साल की सेवा के बाद अगस्त 1969 में अर्जन सिंह मात्र 50 साल की उम्र में भारतीय वायु सेना के प्रमुख पद से रिटायर हो गए.

भारतीय वायु सेना को अपनी सेवाएं देने के लिए उनको देश के दूसरे सबसे बड़े सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया जा चुका है.

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