नज़रिया: आरक्षण से आया है तो बीड़ी ही पियेगा अफ़सर?

  • राजेश जोशी
  • रेडियो एडिटर, बीबीसी हिंदी
शॉर्ट फ़िल्म का एक दृश्य

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शॉर्ट फ़िल्म के दृश्य में मयंक नामक पात्र

एक गोरा-चिट्टा लंबा सा सुदर्शन नौजवान नौकरी के लिए इंटरव्यू देने के लिए अपनी बारी के इंतज़ार में एक दफ़्तर में बैठा है.

इंटरव्यू लेने वाला अधिकारी जिस कमरे में बैठा है उसके बाहर उसके नाम की तख़्ती लगी है, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा है- जगन नाथ.

व्हॉट्सऐप और सोशल मीडिया पर पिछले छह महीने से शेयर की जा रही एक छोटी सी मगर खुले तौर पर आरक्षण विरोधी फ़िल्म का पहला दृश्य है.

आरक्षण के ख़िलाफ़ संदेश देने के अलावा ये फ़िल्म अपने दर्शकों को इशारे ही इशारे में दलितों और कथित ऊँची जातियों के बारे में बहुत सारे स्टीरियोटाइप्स को और मज़बूत करती है, मसलन:

दलित काले, भदेस और देहाती होते हैं.

ऊँची जाति के लोग लंबे, गोरे, शहरी और डैशिंग होते हैं

दलित लोग मंदबुद्धि होते हैं और ऊँची जाति के बच्चों की नक़ल करके पास हो जाते हैं

दलित पढ़ाई में फिसड्डी होने के बावजूद वो आरक्षण के कारण अफ़सर बन जाते हैं

जबकि अगड़े पढ़ाई में तेज़ होने के बावजूद नौकरी के लिए दर दर भटकते रहते हैं

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मेज़ पर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर

हमें पता चलता है कि गोरे और सुदर्शन नौजवान का नाम मयंक शर्मा (यानी ब्राह्मण) है और इंटरव्यू लेने वाला 'जाति-विहीन' जगन नाथ.

अपनी बारी आने पर मयंक शर्मा दरवाज़ा खटखटाता है और अंदर आने की इजाज़त चाहता है. दरवाज़ा खुलने पर हमें एक ख़ाली कुर्सी दिखती है. इंटरव्यू लेने वाला पीठ फेरकर खिड़की के पास खड़े-खड़े विलेन की तरह बीड़ी फूँक रहा है.

उसकी मेज़ पर बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और महात्मा गाँधी की तस्वीर नज़र आती है. ये पहली निशानी है जो दर्शकों को बताती है कि इंटरव्यू लेने के लिए अंदर बैठा अफ़सर 'अंबेडकरवादी' हो सकता है.

कैमरा फिर उस अफ़सर पर जाता है जो खिड़की के पास पीठ मोड़े खड़ा है और सिगरेट फूँक रहा है और वो अचानक फ़िल्मी अंदाज़ में पलटता है. सुदर्शन नौजवान उसे देखता है और चौंक जाता है.

गोरे और सुदर्शन नौजवान से उलट ये अफ़सर साँवले - बल्कि काले - रंग का है और जब बोलता है तो देहाती लहज़े की हिंदी में किसी विलेन की तरह सुदर्शन नौजवान से पूछता है - क्यों, चौंक गए?

फ़िल्म ब्लैक-एंड-व्हाइट के ज़रिए फ़्लैशबैक में जाती है और मयंक शर्मा परीक्षा देते हुए नज़र आता है. पिछली सीट पर बैठा एक काले रंग का छात्र रुआँसा होकर मयंक से नक़ल करवाने की चिरौरी करता नज़र आता है. "मयंक, दोस्त… दिखा दो ना.. मैं फ़ेल हो जाऊँगा."

ये जग्गू है. और वही जग्गू अब जगन नाथ बन चुका है और अफ़सर के तौर पर मयंक शर्मा का इंटरव्यू लेने को तैयार है.

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जगन नाथ नामक पात्र नक़ल करते हुए

मयंक शर्मा और जगन नाथ के बीच का संवाद पढ़िए:

जगन नाथ - चौंक गए जग्गू को जगन नाथ बना देखकर. देखो भाय, ये सब किस्मत का खेल है.

मयंक - जग्गू, ये किस्मत का नहीं हमारे देश के सिस्टम का खेल है. जिन्हें कभी क़लम चलानी भी नहीं आई उन्हें देश चलाने के लिए दे दिया जाता है.

जगन नाथ - तुम यहाँ इंटरव्यू देने के लिए आए हो.

मयंक - ये मेरी बदक़िस्मती है कि मैं इंटरव्यू देने के लिए आया हूँ.

जगन नाथ - ये मत भूलो कि मैं तुम्हें फ़ेल भी कर सकता हूँ.

मयंक - जो कभी अपने दम पर पास नहीं हुआ वो मुझे क्या फ़ेल करेगा.

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सोशल मीडिया पर शेयर हो रहा

मयंक शर्मा बाहर निकलता है और स्क्रीन पर शब्द उभरते हैं - ग़रीबी जाति देखकर नहीं आती, फिर आरक्षण जाति देखकर क्यों?

पर ये सवाल सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही छह मिनट की इस फ़िल्म के ज़रिए ही नहीं उठाया गया है. हिंदू समाज को एकजुट करने और उसे एक राजनीतिक ताक़त में बदलने के काम में लगे तमाम संगठन इस सवाल को अलग-अलग बार अपने तरीक़े से उठा चुके हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले ये सवाल उठाया गया और भारतीय जनता पार्टी को उसके नतीजे भुगतने पड़े. इसके बाद फिर से जयपुर में हिंदुत्ववादी नेताओं ने आरक्षण पर प्रश्न चिन्ह लगाया लेकिन तुरंत उन्हें सफ़ाई देनी पड़ी. मगर आरक्षण के ख़िलाफ़ अभियान चलता रहा.

महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन हो, गुजरात का पाटीदार आंदोलन, या फिर हरियाणा में खाती-पीती जातियों की ओर से आरक्षण की माँग. इन सभी में एक बात साफ़तौर पर कही जाती रही है कि अगर आरक्षण ख़त्म नहीं किया जा सकता तो ऊँची जातियों को भी आरक्षण दिया जाए.

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आरक्षण विरोधी माहौल बनेगा

अगले दो से पाँच बरसों में ये माँग कमज़ोर पड़ने की बजाए और तेज़ की जाएगी और आरक्षण विरोधी माहौल बनाने की कोशिश की जाएगी. ठीक उसी तरह जैसे सबसे पहले बीस बरस पहले लालकृष्ण आडवाणी ने धर्मनिरपेक्षता के पेड़ की जड़ों में मट्ठा डालने की कोशिश की और उसे छद्म या विकृत धर्मनिरपेक्षता कहा.

इसी तरह उदारवाद या लिबरल शब्द की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए गए जिसका नतीजा ये हुआ कि लोग ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष, लिबरल कहने में हिचकने लगे.

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दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को आरक्षण की व्यवस्था के ख़िलाफ़ समाज में पहले से ही मौजूद संवेदनाओं को और मज़बूत करने के लिए ये ज़रूरी हो गया है कि दलितों को नक़लची, मंदबुद्धि और आरक्षण के बल पर सफल होने वालों की तरह दिखाया जाए.

और इस कोरस को इतना तेज़ कर दिया जाए कि आरक्षण का लाभ लेने वाला ख़ुद को समाज से बहिष्कृत महसूस करे.

देहाती दिखने वाले जगन नाथ को खलनायक और लंबे-गोरे शहरी युवक मयंक शर्मा को उसका पीड़ित दिखाने वाली ये सतही-सी दिखने वाली फ़िल्म गहरी राजनीतिक समेटे हुए है. और ये राजनीति बराबरी और सामाजिक न्याय के विरोध में खड़ी है. इसे समझना होगा.

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