नज़रिया: 'शिष्टाचार की उम्मीद सिर्फ़ मोदी भक्तों से न की जाए'

  • 19 सितंबर 2017
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बदतमीज़ी, बेहूदगी और बेहयाई पर किसी राजनीतिक समूह का एकाधिकार नहीं है लेकिन इस मामले में सत्ताधारी दल के समर्थकों और नेताओं की लानत-मलामत ज़्यादा होती रही है.

ऐसा होने की कुछ जायज़ वजहें भी रही हैं. संयम-शिष्टता का सत्ताधारी दल के नेताओं-समर्थकों का ट्रैक रिकॉर्ड उतना सदाचारी-संस्कारी नहीं रहा है जैसा देश बनाने के वे रोज़ नारे लगाते हैं.

जब पता चला कि पीएम मोदी एक ऐसे व्यक्ति को फॉलो करते हैं जिसने बंगलौर में मारी गई पत्रकार गौरी लंकेश को 'कुतिया' और संवेदना व्यक्त करने वालों को 'बिलबिलाते पिल्ले' कहा है, तो उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा.

सोशल मीडिया में भाषा को लेकर ज़ोरदार बहसें हुईं, पीएम और उनके समर्थकों को काफ़ी प्रवचन सुनना पड़ा कि भाषा से संवेदनहीन सोच का पता चलता है, पीएम से माँग की गई कि वे 'देशभक्त व्यापारी' निखिल दधीच को अनफॉलो करें, उन्होंने इस माँग को अनसुना कर दिया.

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Image caption निखिल दधीच को फॉलो करते हैं पीएम

तब तुम कहां थे?

ख़ुद को निष्पक्ष, संतुलित और सभ्य की श्रेणी में रखने वाले लोगों ने भी 'हिंदुत्व के सैनिक' के बहाने उसके सबसे बड़े फॉलोअर को घेरा, ऐसा करना उनका लोकतांत्रिक हक़ था और उन्हें ये अपना फ़र्ज़ भी लगा.

पाँच सितंबर को गौरी लंकेश की हत्या होने के बाद कई दिनों तक वही लोग नाराज़गी प्रकट कर रहे थे जिन्हें भरपूर अभद्रता के साथ 'शेख़ुलर', 'लिबटार्ड' और 'प्रेस्टीट्यूट' कहा जाता है.

उन्हें अक्सर इन सवालों का सामना करना पड़ता है, "तब तुम कहाँ थे?" और "उस मामले पर क्यों नहीं बोले?" ऐसा पूछने का एक मक़सद है, पूछने वाले साबित करना चाहते हैं कि जो तबका ख़ुद को पढ़ा-लिखा, संतुलित, उदार, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और शिष्ट मानता है वो दोहरे मापदंड अपनाता है.

कई बार इस दाँव का इस्तेमाल मुद्दे से ध्यान हटाने या सवाल उठाने वालों को उलझाने के लिए भी किया जाता है, कश्मीरी पंडितों की पीड़ा और केरल में आरएसएस के कार्यकर्ताओं की हत्या की मिसालें 'भक्तों' के सबसे ज़्यादा काम आती हैं.

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Image caption वीके सिंह ने सबसे पहले प्रेस्टीट्यूट शब्द का इस्तेमाल किया

'प्रेस्टीट्यूट' का हुआ इस्तेमाल

वैसे 'भक्त' संबोधन में 'प्रेस्टीट्यूट' जैसा कुछ भी अपमानजनक नहीं है, जब बात निकली है तो बता दें कि प्रेस्टीट्यूट को पहली बार आधिकारिक मान्यता विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने दी थी.

अब लौटें मुख्य मुद्दे पर, जिन्हें 'भक्त' कहा जाता है उनका ये कहना कई बार, कुछ हद तक सही लगता है कि उनसे जिस शिष्टता-शालीनता की उम्मीद की जाती है, वही पैमाना दूसरों के मामले में क्यों नहीं अपनाया जाता.

मसलन, सात सितंबर को जब दधीच की भाषा पूरे देश में ट्रेंड कर रही थी तब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, उन्होंने लिखा कि "ये मेरा नहीं है, लेकिन इसे पोस्ट करने से ख़ुद को रोक नहीं पा रहा हूँ." कांग्रेस नेता ने जो ट्वीट किया वो मोदी की एक तस्वीर थी जिस पर लिखा है-- "मेरी दो उपलब्धियाँ हैं-- मैंने भक्तों को चू*या बनाया और चू*यों को भक्त बनाया."

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Image caption दिग्विजय सिंह का ट्वीट

'चू' को 'भ' और 'भ' को 'चू'

साफ़ तौर पर इस पोस्ट की भाषा अभद्र थी, ये पहली बार नहीं था कि दिग्विजय सिंह को ग़ैर-ज़िम्मेदार और फूहड़ ट्वीट के लिए आलोचना झेलनी पड़ी हो लेकिन उनकी वैसी आलोचना नहीं हुई जैसी निखिल दधीच की हो रही थी जबकि वे राह चलते कार्यकर्ता नहीं, बल्कि कांग्रेस पार्टी के महासचिव हैं.

2013 में अन्ना हज़ारे को 'भ्रष्ट' बताने और इस पर लिखित माफ़ी माँगने वाले मनीष तिवारी को पता नहीं क्या सूझी. उन्होंने भी 'चू' को 'भ' और 'भ' को 'चू' बनाने वाला फूहड़ फिकरा ट्वीट कर दिया. कई लोगों को महसूस हुआ कि इसकी भी उतनी और वैसी आलोचना नहीं हुई जैसी होनी चाहिए थी.

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Image caption मनीष तिवारी का ट्वीट

कुछ महीने पहले गधे का ज़िक्र अखिलेश यादव ने यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान छेड़ा था, गधा एक बार फिर चर्चा में आया, वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे के ट्वीट की वजह से जिसमें उन्होंने एक गधे की तस्वीर के साथ लिखा- "जुमला जयंती पर आनंदित, पुलकित, रोमांचित वैशाखनंदन."

मृणाल पांडे अब तक अपनी परिष्कृत भाषा-शैली और संयत टिप्पणियों के लिए जानी जाती थीं, उनकी टिप्पणी में परिष्कृत इतना भर है कि उन्होंने गधे की जगह संस्कृत शब्द वैशाखनंदन का प्रयोग किया है.

कोई और वक़्त होता तो इसे व्यंग्य, वक्रोक्ति या कटाक्ष समझकर लोग मुस्कुरा देते, लेकिन इन दिनों सोशल मीडिया युद्धभूमि बना हुआ है जिसका एक बड़ा शिकार 'सेंस ऑफ़ ह्यूमर' है. इन हालात में मोदी के समर्थकों को गधा कहना वाक़ई अपमानजनक लग सकता है.

इस टिप्पणी के लिए उन्हें कई वरिष्ठ पत्रकारों और लिबरल कहे जाने वाले लोगों की आलोचना का सामना करना पड़ा है, बीसियों लोगों ने कहा है कि यह ओछी हरकत है जो उन्हें शोभा नहीं देती.

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Image caption मृणाल पांडे का ट्वीट

विरोधियों को स्पेस दीजिए

लेकिन कई लोग जिन्होंने 'भक्तों' के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर युद्ध छेड़ा हुआ है. वे मृणाल पांडे और मनीष तिवारी का किसी तरह बचाव करने में जुटे हैं. कुछ लोग चू*या शब्द की मीमांसा करने लगे, उसे अपशब्द की जगह भदेस अभिव्यक्ति बताने लगे. ये भी बताने लगे कि उसका स्त्री शरीर के अंग-विशेष से कोई संबंध नहीं है, ये वैसा ही तर्क है जब दधीच ने कहा था कि उनका ट्वीट पड़ोस में रहने वाली कुतिया के बारे में था.

इन लोगों की दलील ये है कि "सरकार समर्थक ट्रोल आर्मी" की बेहूदगियों के मुक़ाबले इन दोनों प्रतिष्ठित व्यक्तियों के ट्वीट बिल्कुल भी बुरे नहीं हैं.

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इस बचाव से जुड़ी दो बातें समझने वाली हैं—पहला तो ये कि जिनकी बुराई आप करते हैं उनसे मुक़ाबला करने और जीतने की कोशिश आपको उन्हीं के स्तर पर ले जाएगी. दूसरा, ये कि सोशल मीडिया पर शिष्टाचार और संयम की बात करने वाले लोग अपना 'मोरल हाइग्राउंड' खो देंगे.

और उससे भी ज़रूरी बात, अगर आप शिष्ट हैं तो और शिष्ट बनिए, अगर लिबरल हैं तो और उदारता दिखाइए, डेमोक्रेटिक हैं तो विरोधियों को और स्पेस दीजिए, अगर पढ़े-लिखे हैं तो तथ्यों-तर्कों की बात करिए.

किसी को गधा और कुत्ता बनाकर आप बड़े नहीं, छोटे ही बनते हैं.

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