नज़रिया: संघ और पढ़ी-लिखी लड़कियों का टकराव तो बढ़ेगा ही

  • 26 सितंबर 2017
बीएचयू की छात्राएं इमेज कॉपीरइट Samiratmaj Mishra

पीएम के चुनाव क्षेत्र बनारस में जो हुआ है, उसे बीएचयू की छात्राओं और प्रशासन के बीच टकराव की तरह देखने वाले ग़लती कर रहे हैं.

ये संघ की सोच और अपना भला-बुरा ख़ुद तय करने वाली लड़कियों का टकराव है. संघ हिंदू राष्ट्र में जैसी नारी शक्ति की कल्पना करता है वह देश की पढ़ी-लिखी लड़कियों के सपनों के ठीक उलट है.

आने वाले दिनों में संघ और सबल लड़कियों का टकराव बढ़ेगा और फैलेगा, ऐसा कहने की ठोस वजहें हैं.

सर संघचालक को आरएसएस में 'परम पूज्य' (प.पू.) कहा जाता है, आरएसएस के सर संघचालक आजीवन पद पर रहते हैं और उनके विचारों को 'देववाणी' जैसा महत्व दिया जाता है.

"पति और पत्नी एक अनुबंध में बंधे हैं जिसके तहत पति ने पत्नी को घर संभालने की ज़िम्मेदारी सौंपी है और वादा किया है कि मैं तुम्हारी सभी ज़रूरतें पूरी करूँगा, मैं तुम्हें सुरक्षित रखूँगा. अगर पति इस अनुबंध की शर्तों का पालन करता है, और जब तक पत्नी इस अनुबंध की शर्तों को मानती है, पति उसके साथ रहता है, अगर पत्नी अनुबंध को तोड़ती है तो पति उसे छोड़ सकता है."

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बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (बीएचयू) के कुलपति प्रोफ़ेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी कह चुके हैं कि "मैं आरएसएस से जु़ड़ा हुआ हूँ और मुझे इस पर गर्व है." ये कैसे संभव है कि वे लड़कियों को 'घर संभालने की ज़िम्मेदारी' के लिए तैयार न करें, जैसा मार्ग प.पू. सर संघचालक ने दिखाया है.

छात्राओं पर लाठीचार्ज के बाद बीबीसी से बातचीत में प्रोफ़ेसर त्रिपाठी ने कहा है कि वे बीएचयू को जेएनयू नहीं बनने देंगे, हालाँकि जेएनयू देश की नंबर वन यूनिवर्सिटी है.

बीएचयू में छात्राओं के जीवन को संघ के दर्शन के अनुरूप ढालने के कई प्रयास किए गए हैं. दरअसल, बीएचयू आरएसएस की मॉडल यूनिवर्सिटी है, और उसका ठीक उल्टा जेएनयू है जिसे 'राष्ट्रविरोधी' बताया जाने लगा है.

बीएचयू के जेएनयू बनने का मतलब होगा लड़कियों और लड़कों के लिए एक ही नियम जो कुलपति प्रोफ़ेसर त्रिपाठी को मंज़ूर नहीं है.

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Image caption बीएचयू के वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर गिरीश चंद्र त्रिपाठी

बीएचयू में लड़कियों के ऊपर जो पाबंदियाँ हैं, उनकी सूची काफ़ी लंबी है- लड़कियों को हर हाल में अपने हॉस्टल में आठ बजे तक लौटना होता है, लड़कों को मेस में माँसाहारी भोजन मिलता है लेकिन लड़कियों को नहीं, लड़कियाँ रात दस बजे के बाद मोबाइल फ़ोन का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं, छात्राओं को लिखित शपथ लेनी होती है कि वे किसी राजनीतिक गतिविधि या विरोध प्रदर्शन में हिस्सा नहीं लेंगी, यहाँ तक कि गर्ल्स हॉस्टल के भीतर भी छोटे कपड़ों पर पाबंदी है.

बीएचयू और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी शुरू से ही परंपरावादी संस्थानों में गिने जाते हैं, जहाँ लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग नियम-क़ानून रहे हैं. लेकिन आरोप है कि नवंबर 2014 में बीजेपी के शासनकाल में वीसी नियुक्त होने के बाद से प्रोफ़ेसर त्रिपाठी ने इन नियमों को अतिरिक्त सख़्ती से लागू करना शुरू किया है.

गर्ल्स हॉस्टल के भीतर भी ड्रेस कोड लागू करना और रात दस बजे के बाद मोबाइल के इस्तेमाल पर पाबंदी, मौजूदा वीसी ने ही लगाई है. वीसी प्रोफ़ेसर त्रिपाठी पर 'मोरल पुलिसिंग' करने और लड़कियों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिस पर सुनवाई चल रही है.

संघ और नारी शक्ति के रिश्ते

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है क्योंकि संघ का नेतृत्व हमेशा से ब्रह्मचर्य का व्रत लेने वालों के हाथों में रहा है, जिनकी नज़रों में स्त्रियाँ माता या पुत्री हो सकती हैं, उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व संभव नहीं है.

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1936 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समानांतर महिलाओं की अलग संस्था राष्ट्रीय सेविका समिति गठित की गई थी. वरिष्ठ लेखक-विचारक राम पुनियानी लिखते हैं कि "महिलाएँ 'स्वयंसेवक' नहीं बल्कि सेविका हैं. इसके पीछे एक सोच है कि वे सेवा तो कर सकती हैं लेकिन स्वयं यानी स्वेच्छा से नहीं, बल्कि पुरुषों के कहे अनुसार."

राष्ट्रीय सेविका समिति का नेतृत्व गुमनाम ही रहा है. समिति की उत्तर क्षेत्र की कार्यवाहिका चंद्रकांता ने इसी साल जून में 'इंडियन एक्सप्रेस' से कहा, "पुरुष का कार्य है बाहर का काम करना, धन का काम करना, पौरुष उसका गुण है. स्त्री का गुण मातृत्व है."

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इस साल अप्रैल महीने से संघ ने गाँव-क़स्बों में जाकर परिवारों से खान-पान, पोशाक और संस्कृति पर बातचीत करने का एक अभियान चलाया है जिसे 'कुटुंब प्रबोधन' कहा जाता है, इसके तहत परिवारों को बताया जा रहा है कि लड़कियों को साड़ी पहननी चाहिए, शाकाहारी भोजन करना चाहिए और विदेशी संस्कृति का परित्याग करना चाहिए, जैसे कि जन्मदिन पर केक काटना. साथ ही, क्रिकेट और राजनीति पर चर्चा करने की जगह धार्मिक कार्यों में समय लगाना चाहिए.

'मातृत्व', पति-परिवार की सेवा और हिंदू संस्कृति की रक्षा, यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली शायद ही किसी लड़की की चिंताओं में सबसे ऊपर हो.

बीएचयू के गेट पर प्रदर्शन कर रही सभी लड़कियाँ इन 'संस्कारों' से दूर हैं, 'विदेशी संस्कृति' और 'वामपंथी सोच' से प्रभावित हैं, आप तस्वीरें देख सकते हैं उनमें से किसी ने साड़ी नहीं पहनी थी.

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Image caption लाठीचार्ज के बाद ज़ख्मी हुईं लड़कियां

इन लड़कियों की आँखों में माँ बनने के नहीं, करियर के सपने हैं. वे बहुत जद्दोजहद के बाद घर से निकल पाई हैं, वे इज्ज़त से रहना चाहती हैं, हॉस्टल में रहने की अनुमति उन्हें आसानी से नहीं मिली होगी. अब इतने बवाल के बाद पिटकर घर लौटी बहुत सारी लड़कियों पर ज़बान बंद करके चुपचाप रहने या घर लौट आने का भारी दबाव होगा.

लेकिन ये सिर्फ़ बीएचयू की लड़कियों की बात नहीं है, ये दबाव हर जगह होगा और ज़िंदगी को देखने के नज़रिए का टकराव भी हर ऐसी जगह दिखाई देगा जहाँ लड़कियों के मुँह में ज़बान है और वे उसका इस्तेमाल करना सीख गई हैं.

बीएचयू की लड़कियाँ छेड़खानी से सुरक्षा की माँग कर रही थीं, सीसीटीवी लगाने का अनुरोध कर रही थीं, रास्ते में लाइटें लगाने की बात कह रही थीं, जबकि संघ का प्रतिनिधित्व करने वाले वीसी उनसे बात तक करने को तैयार नहीं थे.

नवरात्र में देवी की अराधना करने वाले प्रोफ़ेसर त्रिपाठी ने लड़कियों को पुलिस के हाथों पिटने दिया.

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Image caption बीएचयू की छात्राओं का मांगपत्र

बीएचयू की छात्राओं के साथ जो व्यवहार हुआ है उससे देश में, ख़ास तौर पर कैम्पसों में गुस्सा है, कई शहरों में यूनिवर्सिटी की छात्राओं ने इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया है जो ये दिखाता है कि वे इस टकराव में अपना पक्ष चुन रही हैं, और इसके लिए किसी राजनीतिक रुझान या समर्थन की ज़रूरत नहीं है.

जब देश की महिलाएँ हर क़दम पर मर्दवादी वर्चस्व के ख़िलाफ़ लड़ रही हैं, क़दम-क़दम पर संघर्ष और कई बार जीत की कहानियाँ लिख रही हैं, ज़ाहिर है, उन्हें हिंदू राष्ट्र की रक्षा के लिए सबल और संस्कारी पुत्र पैदा करने की भूमिका में धकेला जाना कैसे मंज़ूर होगा?

वे साक्षी महाराज के चार बच्चे पैदा करने के आह्वान में योगदान करने वाली माताएँ बनने के इरादे से यूनिवर्सिटी नहीं जा रही हैं.

संघ की पौधशाला से उमा भारती और साध्वी निरंजन ज्योति ही आ सकती हैं जिन्होंने कभी किसी यूनिवर्सिटी की शोभा नहीं बढ़ाई है.

ये लड़कियाँ वहाँ से बहुत आगे निकल आई हैं. उन्हें आदर्श बहू या संस्कारी हिंदू माता बनाने की कोशिश जिस किसी यूनिवर्सिटी में होगी, वहाँ ये टकराव देखने को मिलेगा.

अगर उनकी राह कभी बीजेपी की तरफ़ मुड़ी तो वे निर्मला सीतारामन की तरह आएंगी.

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