भगत सिंह नास्तिक क्यों थे?

  • 28 सितंबर 2017
स्मारक

23 मार्च, 1985 को भारत के नवनियुक्त प्रधानमंत्री, कांग्रेस के राजीव गाँधी, सरहदी क़स्बे हुसैनीवाला पहुंचे. वहां उन्होंने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की स्मृति में एक राष्ट्रीय स्मारक की नींव रखी थी.

तत्कालीन सरकार ने देश भर के अख़बारों में भगत सिंह के नाम पर इश्तेहार दिए. इन इश्तेहारों में भगत सिंह को एक सिख नौजवान के रूप में दिखाया गया. बाकायदा पगड़ी पहने हुए. भगत सिंह का यह स्वरूप थोड़ा चौंकाने वाला था.

इससे पहले तक देश में भगत सिंह की जो छवि प्रचलित थी, उसमें वे एक इंग्लिश हैट पहने दिखाए जाते थे, न कि पगड़ी. 1928 में भगत सिंह ने स्वयं ही यह स्टूडियो पोट्रेट खिंचवाया था.

यह सर्वविदित है कि भगत सिंह अपने आप को नास्तिक घोषित कर चुके थे, पर कांग्रेस सरकार मानो उन्हें पगड़ी पहना कर, उनका सिख स्वरूप उजागर करना चाह रही थी.

देश के अन्य शहरों में भी इन्हीं दिनों सरकार के सौजन्य से भगत सिंह को लेकर अनेक कार्यक्रम हुए. मुंबई में भगत सिंह के साथी शिव वर्मा ने एक कार्यक्रम में बताया था कि भगत सिंह जेल में सोवियत विचारधारा के हिमायती हो चुके थे.

वीडियो भगत सिंह का यह पोस्टर दुबारा क्यों नहीं बन सकता?

'भगत सिंह फांसी के 86 साल बाद भी आज़ाद नहीं'

Image caption वर्ष 1927 में पहली बार गिरफ़्तारी के बाद जेल में खींची गई भगत सिंह की फ़ोटो (तस्वीर साभारः चमन लाल)

नास्तिक क्यों बने?

इस कार्यक्रम के दौरान वर्मा ने कहा था कि अंग्रेजों ने भगत सिंह से संबंधित कागजात छुपा दिए थे ताकि लोगों को यह न पता चल सके की भगत सिंह सोवियत यूनियन से कितना प्रभावित थे.

शिव वर्मा जो सामान्यत: लखनऊ में रहते थे, सरकारी मदद से बंबई लाये गए थे. 81 साल की उम्र में उनका जिम्मा देशवासियों को भगत सिंह के नाम पर यह बताना था कि धर्म का सार्वजानिक जीवन में कोई स्थान नहीं है.

वर्मा ने भगत सिंह के लेख को पुनर्प्रकाशित किया था. 'मैं नास्तिक क्यों हूँ'. इस शीर्षक से 23 साल की उम्र में भगत सिंह ने अपने वरिष्ठ साथी भाई रणधीर सिंह को यह समझाने की कोशिश की थी कि देश और समाज को आगे बढ़ाने के लिए धर्म का रास्ता त्याग, विज्ञान का रास्ता अपनाना पड़ेगा.

अचानक इस तरह भगत सिंह के नाम पर सरकार द्वारा चर्चा शुरू करने के पीछे भी एक घटना थी. कई सालों से पंजाब में चरमपंथी सक्रिय थे और सिख धर्म के नाम पर नया राज्य बनाने की मांग चल रही थी.

'सिख किसी से डरता नहीं और अपना हक़ बंदूक के दम पर लेना जानता है', इस विचार को लेकर हरमंदर साहब (स्वर्ण मंदिर) में कट्टरपंथियों ने अपना अड्डा जमा लिया था. वहां से अराजकता फ़ैलाने का काम चल रहा था.

भगत सिंह, जिसने ठुकराया, अब उनके दुलारे

भगत सिंह की ज़िंदगी के वे आख़िरी 12 घंटे

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Image caption भगत सिंह की भूख हड़ताल का पोस्टर जिस पर उनके ही नारे छपे हैं. पोस्टर नेशनल आर्ट प्रेस, अनारकली, लाहौर ने प्रिंट किया था

अपने-अपने मतलब के लिए याद आए

अंत में सरकार को फ़ौज की मदद से इस अड्डे को ख़त्म करना पड़ा. पूरे पंजाब में सरकार के खिलाफ काफी दुराव फैला. नवम्बर, 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के ही दो सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी. ऐसी परिस्थिति में सरकार को 'पंजाब के महान सपूत' भगत सिंह की याद आई.

इस घटना के क़रीब 54 साल पहले अंग्रेजों ने भगत सिंह को फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया था. उस वक्त देश में शायद महात्मा गांधी ही एक अकेले व्यक्ति रहे होंगे जिन्होंने बंदूक के जरिए क्रांति लाने के हिमायती भगत सिंह की प्रशंसा नहीं की. पर सारा देश भगत सिंह पर फिदा था.

आने वाले सालों में भगत सिंह की याद तब ताजा हुई जब 1965 में दीन दयाल शर्मा की पटकथा वाली फ़िल्म 'शहीद' में मनोज कुमार ने भगत सिंह का रोल निभाया. फिल्म शहीद के तराने लोगों को राष्ट्रभक्ति की याद कराते रहते, पर सरकार को तो भगत सिंह तभी याद आए जब सरकार की अड़ी पड़ी. अन्य राजनैतिक दलों का भी यही हाल रहा.

1997 में आजादी के 50वें साल के अवसर पर भारतीय कम्युनिस्टों को याद आया की कांग्रेस सरकार आम तौर पर आजादी में क्रांतिकारियों के योगदान को अनदेखा कर देती थी. तब उन्होंने भगत सिंह का नाम लिया.

पाकिस्तान में भगत सिंह का केस दोबारा खुला

Image caption नेशनल कॉलेज लाहौर की फ़ोटो. पगड़ी पहने भगत सिंह (दाहिने से चौथे) खड़े नज़र आ रहे हैं (तस्वीर साभारः चमन लाल)

'यही मेरा हीरो हो'

दस साल बाद, दक्षिणपंथी भाजपा ने भगत सिंह को गले लगा लिया. सिख समुदाय के नाम पर खड़े अकाली दल ने भी भगत सिंह को अपना बताने में कोई कसर न छोड़ी. क्रांतिकारियों के नाम पर रोटी पकाने का काम बदस्तूर चलता रहा है.

जब-जब मौका पड़ने पर भगत सिंह को अपनाने की ये रवायत राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं. 'यह मेरा हीरो है', कहते हुए पंजाब का एक गबरू अपनी गाड़ी पर लगी तस्वीर की तरफ इशारा करता है. तस्वीर पगड़ी पहने एक नौजवान की है. 'भगत सिंह', वह समझाता है. लगता है की चाहे भारत के राजनेता 'देश के क्रांतिवीरों' को कितना भी भुलाएँ, लोग तो याद रखते हैं न. पर आमतौर पर इस ही गबरू की गाड़ी पर एक दूसरी भी तस्वीर लगी होती है.

भगत सिंह के ही बगल में तस्वीर होती है दोशाला ओढ़े हुए एक दूसरे सरदार की जिसने हाथ में एक तीर या फिर एक कलाशिनिकोव थामा हुआ है. 'संत जरनैल सिंह', नवयुवक समझाता है. 'दोनों स्वतंत्रता और आत्म-सम्मान के लिए लड़ रहे थे'.

यदि आप को इन दोनों के बारे में कुछ भी पता है तो एक चीज़ तो साफ़ हो जाती है - 'इन नवयुवक को न तो इनके बारे में कुछ पता है न ही उनके बारे में.' न ही उसने इनके बारे में जानकारी लेनी की कोई कोशिश ही की. बस, जो भी फैशनेबल दिखा वही करने लगा. तब थोड़ा दिल बैठता है.

यह नौजवान नाहक फोटो लगाए घूम रहा है. क्योंकि जहाँ भगत सिंह देश के सुद्रढ़ भविष्य के लिए अपनी जान न्योछावर करने को तैयार था वहीं जरनैल सिंह अपना उल्लू सीधा करने के लिए हज़ारों की जान लेने पर अमादा थे. पर इस नौजवान की बला से...

नेहरू या बोस, किससे प्रभावित थे भगत सिंह ?

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