गोधरा: साबरमती एक्सप्रेस और वो एस6 कोच

  • 9 अक्तूबर 2017
गोधरा ट्रेन बोगी

गोधरा रेलवे स्टेशन के बैकयार्ड में हमेशा एक खामोश सन्नाटा पसरा होता है. यही वह जगह है जहां साबरमती एक्सप्रेस के जले हुए डिब्बे खड़े हैं.

इसमें सवार यात्रियों की चीख़-पुकार सुनाई नहीं देती, लेकिन पिघली हुई लोहे की छड़ें, राख में तब्दील हो चुकी सीटें और मकड़ी की जालों से घिरे पंखे यह बताते हैं कि कई साल पहले इसी ट्रेन के दो कोचों में आगजनी की घटना में 59 लोग ज़िंदा जल गए थे.

27 फ़रवरी, 2002 को जिस साबरमती एक्सप्रेस के साथ ये हादसा हुआ था, उसके बाकी सारे कोच अपने गंतव्य तक पहुंचे, लेकिन दो कोच यहीं खड़े हैं. जिनके इर्द-गिर्द सुरक्षाबलों का घेरा है. आज भी गोधरा स्टेशन पर जब नीले रंग की साबरमती एक्सप्रेस का नया एस6 कोच ठहरता है तो हर बार लोगों की आँखें इस कोच को देखने के लिए उठ जाती हैं.

25 फ़रवरी, 2002 को अयोध्या से 2000 से ज़्यादा कारसेवक साबरमती एक्सप्रेस पर सवार हुए, अहमदबाद जाने के लिए.

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गोधरा रेलवे स्टेशन

27 फ़रवरी को चार घंटे की देरी से ट्रेन गोधरा स्टेशन पहुंची. जाँच रिपोर्टों के मुताबिक़ जब ट्रेन स्टेशन से रवाना होने लगी, तब ट्रेन की आपातकालीन चेन खींची गई और अचानक से जमा हुई एक भीड़ ने ट्रेन पर पत्थर फेंके और कुछ कोचों में आग लगा दी.

क़रीब एक दशक तक चली जांच और लंबी सुनवाइयों के बाद फ़रवरी, 2011 में अदालत ने इस मामले में 31 लोगों को दोषी ठहराया और 63 लोगों को रिहा कर दिया.

अदालत ने इसे पहले से सोची हुई साज़िश बताया. दोषियों में 11 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई. हालांकि जांच में जिस मौलवी सईद उमरजी की ओर मुख्य साजिशकर्ता होने का संकेत किया गया, वे रिहा हो गए.

वैसे स्थानीय हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों के लोग मानते हैं कि पूरे मामले की सच्चाई सामने नहीं आई.

बहरहाल, गोधरा रेलवे स्टेशन के बैकयार्ड में हादसे की भयावहता को आज भी देखा जा सकता है.

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तस्वीरें गोधरा की वो ट्रेन

विश्व हिंदू परिषद

एस6 और एस7 के अवशेष पड़े कोच की सुरक्षा व्यवस्था में गुजरात रेलवे पुलिस सुरक्षा बल का एक दल चौबीसों घंटे तैनात रहता है. चार सुरक्षाकर्मियों का दल ट्रेन के कोच के पास ही बने मेकशिफ्ट होम में रहता है.

इस सुरक्षादल में तैनात एक पुलिसकर्मी ने बताया, "पिछले कुछ सालों से मीडिया के फ़ोटोग्राफ़रों के सिवाय यहां कोई नहीं आया. स्थानीय लोग तो यहां कभी नहीं आते. हम भी नहीं जानते कि हम किस चीज़ की सुरक्षा कर रहे हैं क्योंकि कोच के अंदर तो सब कुछ जला हुआ है. ऐसा लगता है कि हम लोग रेलवे बोगी के अंदर पड़ी राख और अवशेष की सुरक्षा कर रहे हैं."

कोई फ़ोटोग्राफ़र या मीडियाकर्मी ट्रेन की बोगी के अंदर नहीं प्रवेश करे, यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी इन्हीं सुरक्षाकर्मियों पर है.

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नानावटी आयोग

ट्रेन की बोगी को लोहे की जालियों से बंद कर दिया गया है. हादसे में मारे गए लोगों की याद में हर साल 27 फरवरी को विश्व हिंदू परिषद जले हुई कोचों के पास एक कार्यक्रम आयोजित करता है, लेकिन इसमें भी ज़्यादा लोग शामिल नहीं होते हैं.

हालांकि अभी तक यह रहस्य कायम है कि ट्रेन के अंदर आग कैसे लगी, जिसमें एस6 कोच के अंदर सब कुछ राख में तब्दील कर दिया.

साबरमती एक्सप्रेस में लगी आग की न्यायिक जांच के लिए नानावटी आयोग गठित किया गया. अपने निष्कर्ष का एक हिस्सा सौंपा था, जिसमें साबरमती एक्सप्रेस के एस6 कोच में लगी आग को सोची-समझी साजिश ठहराया था. नानावटी आयोग की पूरी रिपोर्ट को सर्वजनिक नहीं किया गया है.

(अंकुर जैन की ये रिपोर्ट 27 फ़रवरी 2014 को बीबीसी हिंदी प्रकाशित हुई थी)

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