नांदेड़ चुनाव : शिवसेना और एआईएमआईएम की हार के क्या हैं मायने

  • 13 अक्तूबर 2017
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नादेड़ महापालिका चुनाव के नतीजों में 73 सीटों की जीत के बाद कांग्रेस जश्न मना रही है.

तो दूसरी तरफ ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तिहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) पार्टी में सन्नाटा है. पिछले चुनाव में जहां पार्टी को 11 सीटें मिली थीं, वहीं इस चुनाव में पार्टी शून्य पर सिमट गई है.

नतीजों के बाद पार्टी में चिंतन बैठक का दौर शुरू हो गया है. शिवसेना का हाल भी एआईएमआईएम से ज़्यादा बेहतर नहीं है. नादेड़ महापालिका चुनावों में पार्टी को सिर्फ एक सीट मिली है.

महाराष्ट्र की राजनीति में इस चुनाव के नतीजों के बाद राज्य की अलग अलग पार्टियों की हैसियत में बड़ा फ़र्क नज़र आ रहा है. इन चुनावों में कांग्रेस की जीत से ज़्यादा बड़ी बात एआईएमआईएम और शिवसेना की हार को माना जा रहा है.

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नतीजों से लेंगे सबक : एआईएमआईएम

एआईएमआईएम की बात करें तो माना जाता है कि इस पार्टी का उदय महाराष्ट्र से ही हुआ, और उससे भी बड़ी बात यह की पार्टी के नेता अपनी जन्मस्थली नादेड़ को ही मानते हैं.

पार्टी के विधायक इम्तियाज़ जलील का मानना है कि पार्टी ने जब महाराष्ट्र में ज़मीन तलाशनी शुरू की थी, तो उन्हें सबसे बड़ी सफलता नांदेड़ में ही मिली थी.

बीबीसी से बात करते हुए इम्तियाज़ जलील ने कहा, "हमारी पार्टी का क्रेज़ आज भी नादेड़ में कम नहीं है. इसकी झलक चुनावी रैलियों के दौरान सभी पार्टियों ने देखी भी थी. लेकिन स्थानीय नेतृत्व से पार्टी के दूसरे नेताओं की नाराज़गी की वजह से हमें चुनाव में ये नतीज़े देखने पड़े."

गौरतलब है कि नादेड़ महापालिका चुनाव से ठीक पहले एआईएमआईएम के आठ नेताओं ने कांग्रेस का हाथ थाम लिया था.

क्या इन नतीज़ों के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में एआईएमआईएम की हैसियत पर भी असर पड़ेगा, इस सवाल के जवाब में इम्तियाज़ जलील का कहना है, "बीजेपी भी 2 सीट की पार्टी से 200 सीटों की पार्टी बनी है. लोग ये न भूलें. जो आज हमारे वजूद पर सवाल उठा रहे हैं उनसे भविष्य में हम सवाल पूछेंगे."

इम्तियाज़ जलील के मुताबिक पार्टी के शीर्ष नेता भी नतीजों से चिंतित है. पार्टी वहां के स्थानीय नेतृत्व में परिवर्तन पर विचार कर रही है और अगले दो सप्ताह के भीतर इस पर निर्णय ले लिया जाएगा.

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हार के लिए बीजेपी जिम्मेदार : शिवसेना

शिवसेना की स्थिति एआईएमआईएम से बेहतर नहीं है.

पार्टी की नेता नीलम गोहरे का कहना है, "हमने चुनाव बीजेपी से अलग हो कर ज़रूर लड़ा लेकिन जनता में बीजेपी के ख़िलाफ़ जो नाराज़गी थी, उसका ख़ामियाज़ा हमें उठाना पड़ा क्योंकि हम केन्द्र और राज्य दोनों में उनके साथ ही हैं."

चुनाव से ठीक पहले शिवसेना के 14 में से 9 पार्षद बीजेपी में शामिल हो गए थे.

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इस चुनाव में बीजेपी की स्थिति पहले से बेहतर हुई है. बीजेपी 2 सीटों पर पहले जीती थी और इस बार उसके खाते में 6 सीटें आई हैं.

क्या बीजेपी के साथ रह कर विपक्ष जैसा व्यवहार करना शिवसेना को भारी पड़ा, इस पर शिवसेना की नीलम गोहरे का कहना है, "सत्ता में साथ रहने का ये मतलब नहीं की हम उनके बंधुआ मज़दूर हो गए है. एक ही परिवार में लोगों की एक दूसरे से अलग राय भी हो सकती है."

नादेड़ महापालिका चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम ज़रूर करेगी.

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