ग्राउंड रिपोर्टः गजराज ने किया पेड़ों पर रहने को मजबूर

  • 21 अक्तूबर 2017
जंगली हाथी

पूर्वी भारत के घने जंगलों में एक ऐसा संघर्ष चल रहा है जिसमें एक तरफ इंसान हैं तो दूसरी तरफ जंगली हाथी. यहां लकीरें साफ़ खिंची हुई हैं.

अब तक इस संघर्ष में हज़ार से अधिक इंसान मारे गए हैं और सौ से अधिक हाथी.

पूर्वोत्तर राज्य असम के अलावा पूर्वी भारत के ओडिशा, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में ये लड़ाई अपने सबसे ख़राब रूप में है.

हाथी इंसानों पर हमला कर रहे हैं तो इंसान हाथियों पर. ये सिलसिला बदस्तूर जारी है और हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं.

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मुआवजे की राशि का इंतजार

ओडिशा और छत्तीसगढ़ की सीमा के एक गाँव में मदन राठिया के परिजन अब भी शोक में हैं. वो भैंस चराने जंगल गए थे तभी हाथियों के झुंड ने उन्हें कुचलकर मार दिया.

उनके परिजनों को मुआवज़े का इंतज़ार है. वो कहते हैं कि हाथियों की वजह से वो भी सुरक्षित नहीं हैं और उनके पालतू जानवर भी सुरक्षित नहीं हैं.

उनके बेटे भुवनेश्वर राठिया ने बीबीसी को बताया, "भैंसा जंगल में घुस गया. खोजने के लिए पिताजी अंदर चले गए होंगे. जंगल के अंदर. भैंसा वापस आ गया. मगर चराने वाला नहीं लौटा."

वो बताते हैं, "हमने गांव के लोगों को इकठ्ठा किया. जंगल गए तो वहाँ उनका शव पड़ा हुआ था. प्रशासन ने दाह संस्कार के लिए कुछ रक़म दी मगर हमें मुआवज़े की बाक़ी की राशि का इंतज़ार है."

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हाथी से 1,465 लोगों की मौत

हाल ही में संसद में दिए गए एक बयान में वन एवं पर्यावरण मंत्री हर्षवर्धन का कहना है कि वर्ष 2013 से लेकर इस साल के फरवरी महीने तक हाथियों के हमलों में 1,465 लोगों की मौत हुई है.

इस दौरान लगभग 100 से ज़्यादा हाथी भी मारे गए हैं. जिन लोगों पर हाथियों को मारने का आरोप लग रहा है वो ख़ुद को निर्दोष बताते हैं.

छत्तीसगढ़ के जशपुर और ओडिशा के संबलपुर की सीमा से लगे एक गांव में हमारी मुलाक़ात शिव प्रसाद यादव से हुई जो एक दिन पहले ही ज़मानत पर रिहा हुए हैं.

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हाथियों के हमले

उन पर हाथी को मारने का आरोप है. वो कहते हैं कि उन्होंने जंगल जाकर हाथी को नहीं मारा है. हाथी तो उनके खेत में आकर मरा था.

शिव प्रसाद कहते हैं, "मेरे घर के ठीक पीछे खेत में बिजली का तार लगा हुआ था पंप चलने के लिए. इसी पंप के सहारे हम खेती करते हैं. हाथी उस तार की चपेट में आया और मर गया. वन विभाग ने हम पर ज़बरदस्ती मामला दर्ज कर दिया और जेल भेज दिया. बताइए हमारा क्या कसूर है? "

गाँव पर हाथियों के हमले बढ़ते जा रहे हैं और हाथियों पर इंसानों के. ये सबकुछ इसलिए हो रहा है क्योंकि हाथियों के विचरण के इलाक़े में या तो बड़े-बड़े कल-कारखाने बन गए हैं या फिर खदानें.

क्यों हाथियों के रास्ते में आ रही रुकावटें?

भुवनेश्वर स्थित वन्य प्राणी विशेषज्ञ अजीत पांडा कहते हैं कि हाथियों के रास्ते में आ रही रुकावटों की वजह से ही इनके झुंड गावों और शहरों की तरफ आ जाते हैं. यहीं से संघर्ष की शुरुआत होती है.

पांडा कहते हैं कि इसके अलावा जंगलों में उन पेड़ों और घास की कमी है जो हाथी शौक़ से खाते हैं. झुंड धान खाने के लिए गांव की तरफ आ रहे हैं.

हाथियों के रास्ते में पैदा हो रहे अवरोधों की वजह से अब गांव असुरक्षित होते जा रहे हैं. ऐसा ही एक गाँव है पुसावडेरा.

यहाँ हाथियों के झुंड आए दिन उत्पात मचाते रहते हैं. गांव में शायद ही कोई ऐसा घर बचा हो जिसे हाथियों ने ना तोड़ा हो.

महीनों से टूटे हुए घरों में रह रहे

गाँव के लोग बताते हैं कि पिछले कई महीनों से 35 हाथियों का एक झुंड बार-बार उनके गांव में आ रहा है और तोड़-फोड़ मचा रहा है.

कई ऐसे ग्रामीण हैं जो महीनों से टूटे हुए घरों में ही रह रहे हैं. यहां दर्दनाक कहानियों की कमी नहीं है.

वो कहते हैं कि बार-बार घर की मरम्मत कराने के पैसे उनके पास नहीं हैं. हर बार वो अपना घर फिर से बनाते हैं और हाथियों का झुंड उसे तोड़ देता है.

Image caption गजन राम

दौड़ते-दौड़ते स्कूल की छत पर चढ़ गए

यहां के रहने वाले आदिम जनजाति के गजन राम के पास हाथियों के हमलों के कई क़िस्से हैं. एक सप्ताह पहले जब हाथियों ने उनके गांव पर हमला किया था तो वो लोग स्कूल की छत पर चले गए थे.

उन्होंने बताया, "हम दौड़ते-दौड़ते पास के स्कूल की छत पर चढ़ गए. बाइबल पढ़ रहे थे और छत पर ही थे मगर हाथियों का झुंड वहां भी आ गया. वो हम पर सूंड से हमला करने लगे. झुंड में 35 हाथी थे. बड़े-बड़े हाथी. बाप रे हाथी !!!"

दिन-रात सोना मुहाल

हाथियों के बढ़ते हमलों के बीच गांव के लोगों ने खुद को बचाने का एक तरीक़ा ढूँढा है.

उन्होंने अब आस-पास के बड़े और मज़बूत पेड़ों को अपना आशियाना बनाना शुरू कर दिया है.

झारखण्ड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के जंगलों से लगे कई गाँव ऐसे हैं जहां लोग ना दिन में सो पाते हैं और ना रात में.

चूंकि पुसावडेरा पहाड़ियों पर स्थित है इसलिए यहाँ समय पर मदद पहुंचाना मुमकिन नहीं.

सरकारी महकमे का दावा है कि वो इंसानों और हाथियों के बीच की तल्ख़ियों को कम करने की कोशिश कर रहा है.

जागरूकता अभियान

हाथियों के प्रति जागरूकता पैदा करने की कोशिश भी की जा रही है.

पिछले कुछ सालों से सरकारी अधिकारी जीतेन्द्र उपाध्याय, ओडिशा, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ में हाथियों के उत्पात को लेकर सरकारी महकमों के बीच समन्वय बनाने का काम कर रहे रहे हैं.

वो कहते हैं, "हाथियों का आना-जाना झारखण्ड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच लगा रहता है. इसलिए भय की स्थिति बनी हुई है क्योंकि हाथी लोगों की फसल को बर्बाद कर देते हैं और उन पर हमला करते हैं. लोगों को उनके साथ रहने की आदत नहीं है. मगर अब हमने लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाया है. इसी के तहत हाथी मित्र दल और हाथी सूचना दल का गठन किया गया है."

पलायन को मजबूर

इन कोशिशों के बावजूद इस जंग ने एक ऐसा रूप धारण किया है जहां अब लोगों को अपने गाँव छोड़कर पलायन करने पर मजबूर होना पड़ रहा है.

हर रात सब पर भारी गुज़र रही है. और इस संघर्ष का कोई अंत नज़र नहीं आता.

लोगों को पता नहीं कि पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत के जंगलों में हाथियों के साथ सामंजस्य के साथ वो किस तरह रह पाएंगे.

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