4 चर्चित मामले, जब बड़ी अदालत ने फ़ैसले पलट दिए

  • 16 अक्तूबर 2017
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आरुषि हत्याकांड पर इलाहाबाद हाई कोर्ट से बरी होने के बाद सोमवार को राजेश और नुपुर तलवार जेल से रिहा हो गए.

आरुषि मर्डर केस में निचली अदालत ने तलवार दंपति को दोषी क़रार दिया था लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनकी अपील मंजूर कर ली और फ़ैसला पलट दिया.

निचली अदालतों के फ़ैसले ऊंची अदालतों में पहले भी पलटे जाते रहे हैं. जानिए ऐसे ही कुछ चर्चित मामले...

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सलमान ख़ान केस

मुंबई के बांद्रा में हुए हिट एंड रन केस में ट्रायल कोर्ट ने मई, 2015 में सलमान ख़ान को दोषी क़रार दिया था.

ट्रायल कोर्ट का फ़ैसला 13 साल की सुनवाई के बाद आया लेकिन उसी साल दिसंबर में बॉम्बे हाई कोर्ट ने सलमान ख़ान को इस मुक़दमे में सभी आरोपों से बरी कर दिया.

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जेसिका लाल केस

दिल्ली के महरौली इलाक़े में स्थित एक पब में जेसिका लाल काम करती थीं. 29 अप्रैल, 1999 की रात पब में उनकी हत्या कर दी गई.

जेसिका लाल के क़त्ल के आरोप में मनु शर्मा और अन्य अभियुक्तों पर निचली अदालत में सात साल मुक़दमा चला, जिसके बाद इन्हें रिहा कर दिया गया.

लेकिन दिल्ली पुलिस ने निचली अदालत के फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील की. हाई कोर्ट ने मनु शर्मा को इस मामले में दोषी क़रार दिया.

प्रियदर्शिनी मट्टू हत्याकांड

दिल्ली यूनिवर्सिटी की लॉ स्टूडेंट रहीं प्रियदर्शिनी मट्टू का शव 23 जनवरी, 1996 में दिल्ली स्थित उनके चाचा के घर पर पाया गया था.

साल 1999 में निचली अदालत ने उनके क़ातिल और कॉलेज के सीनियर संतोष कुमार सिंह को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया.

लेकिन अक्तूबर, 2006 में दिल्ली हाई कोर्ट ने संतोष कुमार सिंह को मौत की सज़ा सुनाई. लगभग चार साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को उम्रक़ैद में बदल दिया.

शिबू सोरेन केस

शशिनाथ झा नाम के एक व्यक्ति को 22 मई 1994 को कथित रूप से अगवा कर लिया गया था और फिर उनकी हत्या कर दी गई.

शशिनाथ झा झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेता शिबू सोरेन के निजी सचिव थे.

मामला 1993 में नरसिम्हा राव सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मत न डालने के लिए जेएमएम के चार पूर्व सांसदों को कथित तौर पर घूस देने का था और शशिनाथ झा को ये बात मालूम थी.

इस मामले में दिल्ली की निचली अदालत ने शिबू सोरेन को 28 नवंबर, 2006 को दोषी क़रार देते हुए उम्र क़ैद की सजा सुनाई.

लेकिन 23 अगस्त, 2007 को दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फ़ैसले को पलट दिया और शिबू सोरेन को मामले में बरी कर दिया.

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