मुस्लिम शासक विदेशी तो मौर्य शासक देसी कैसे थे?

  • 17 अक्तूबर 2017
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ताजमहल दुनिया भर में अपनी स्थापत्य कला की ख़ूबसूरती के लिए जाना जाता है, लेकिन अभी भारत की राजनीति में यह विवादों के केंद्र में है. कई लोगों का मानना है कि केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद से इतिहास पर लक्षित हमले बढ़े हैं.

पहले उत्तर प्रदेश की बीजेपी सरकार ने राज्य पर्यटन की बुकलेट से ताजमहल को निकाला तो अब बीजेपी विधायक संगीत सोम ने कहा है कि ताजमहल बनाने वाले गद्दार थे. संगीत सोम ने ताजमहल को भारतीय संस्कृति पर धब्बा क़रार दिया है.

इससे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्मंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था कि ताजमहल भारतीय संस्कृति को परिलक्षित नहीं करता है. योगी ने अकबर को हमलावर कहा था.

दूसरी तरफ़ राजस्थान में बच्चों को पढ़ाया जा सकता है कि हल्दी घाटी की लड़ाई में राजपूत शासक महाराणा प्रताप ने मुग़ल बादशाह अकबर को मात दी थी.

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भारत में दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोग अंग्रेज़ों के शासन को ही केवल ग़ुलाम भारत नहीं मानते हैं बल्कि मध्यकाल को भी ग़ुलाम भारत कहते हैं.

तो क्या अंग्रेज़ों के 200 साल के पीछे भी भारत ग़ुलाम था? क्या मुग़ल शासक विदेशी थे? इन्हीं सारे सवालों को मध्यकाल के इतिहासकार प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब, प्रोफ़ेसर रामनाथ और प्रोफ़ेसर हरबंस मुखिया के सामने रखा.

इरफ़ान हबीब

इतिहास को कोई मिटा नहीं सकता है. जो हमारे इतिहास का हिस्सा है वो हमेशा रहेगा. ये ताजमहल को गिरा भी देंगे तब भी इतिहास का हिस्सा रहेगा.

इन्हें कोई रोक नहीं सकता है. जो दिल में है वो बकते रहें. ये मुसलमानों को विदेशी मानते हैं. दुनिया भर में विदेशी होने की परिभाषा यह है कि आपके देश की संपत्ति कोई बाहर ले जा रहा हो, जैसा कि उपनिवेशों में होता था.

मुग़ल शासन और विदेशी शासन में फ़र्क़ तो करना चाहिए. जिन शासकों को ये विदेशी बताते हैं उनका जन्म भी यहीं हुआ और मौत भी यहीं हुई.

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अगर कोई कहता है कि मुग़ल हमलावर थे तो क्या मौर्यों का शासन गुजरात में था तो वो भी हमलावर थे? मौर्य तो मगध के थे. उनका शासन गुजरात में क्यों था? इस आधार पर तो ये भी कहा जा सकता है कि शासन अपर कास्ट का था तो लोग अपर कास्ट के ग़ुलाम थे.

अगर आप ये समझते हैं गुजरात और मगध अलग-अलग मुल्क हैं तो मौर्य विदेशी हुए. अगर आप सोचते हैं कि पूरे मुल्क पर कोई शासन कर रहा था तो मुग़ल आगरा और दिल्ली से कर रहे थे. इनसे यही पता चलता है कि ये मुस्लिम और दलित विरोधी रवैया चुनावी राजनीति के लिए अपना रहे हैं.

हरबंस मुखिया

जिसे हम आक्रमण कहते हैं वो दरअसल पलायन है. आक्रमण की बात तो 50-60 साल पहले ही झुठला दी गई. बाबर और हुमायूं मध्य एशिया से आए थे. अकबर का जन्म तो उमरकोट में एक राजपूत के घर में हुआ था.

अकबर हिन्दुस्तान से बाहर कभी नहीं गए. अकबर के बाद जितने मुग़ल शासक हुए सब का जन्म हिन्दुस्तान में ही हुआ. इन्होंने तो हिन्दुस्तान के बाहर क़दम तक नहीं रखा. तब तो देश और विदेश की परिकल्पना भी नहीं थी.

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मुग़ल शासकों के वंशज कहां हैं? वे इस ज़मीन पर हैं या फिर यहीं मर खप गए. इससे पहले ख़िलजी और तुग़लक़ वंश के शासक थे. आख़िर इन सबके वंशज कहां हैं? ये आए, यहां लड़ाइयां लड़ीं, बस गए और ख़त्म हो गए. विदेशी तो अंग्रेज़ थे. वे आए और 200 सालों तक लूटपाट कर वापस चले गए. विदेशी तो ये हुए. विदेशी आप उन्हें कैसे कहेंगे जो आए और यहीं बस गए और इसी मिट्टी में मिल गए.

किस लिहाज से आप इन्हें विदेशी कहेंगे? ये सिर्फ़ बाहर से आए थे इसलिए? अगर देशी और विदेशी के आधार पर निकाल बाहर किया जाए तो क्विन एलिजाबेथ को भी ब्रिटेन छोड़ना पड़ेगा. इसलिए हम विदेशी राज केवल अंग्रेज़ों का कहते हैं क्योंकि वो आए और लूटपाट मचाकर चले गए.

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जैसे अंग्रेज़ दक्षिण अफ़्रीका में गए और वहीं पर रह गए. अगर भारत में भी ऐसा ही करते तो उन्हें विदेशी नहीं कहा जाता. ग़ुलाम भारत तो 200 साल ही था. अंग्रेज़ों ने हमारा शोषण किया और करने के बाद निकल लिए. हमारे साथ उनका वास्ता शोषक और शोषित से ज़्यादा नहीं था.

वो मुग़लों की तरह यहां बस जाते तो कौन विदेशी कहता. क्या हम टॉम अल्टर को विदेशी कहते हैं? दुनिया का ऐसा कोई इलाक़ा नहीं है जहां से लोग आकर बसे हुए नहीं हैं. मुग़लों के शासन में संस्कृति का एक जबर्दस्त पहलू था. जिस भाषा में हम बात कर रहे हैं वो तो मध्यकालीन भाषा है. भाषा और खाना-पीना सारा कुछ इसी ज़माने की देन है.

अब इतिहास के मुद्दे बदल चुके हैं. अब फिर से लोग हिंदू बनाम मुस्लिम इतिहास लिखना चाहते हैं, जिसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है. ये फिर से वहीं वापस जाना चाहते हैं.

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देश और उसके बरक्स जो विदेश की परिकल्पना है, ये 18वीं और 19वीं सदी की है. 16वीं सदी में देश, विदेश और विदेशी जैसी परिकल्पना कहीं नहीं थी. और राष्ट्र का तो बिल्कुल सवाल ही नहीं था. ये सारी परिकल्पाएं बाद की हैं और इनका अपना महत्व है.

प्रोफ़ेसर रामनाथ

अकबर और शाहजहां को ये डकैत कह रहे हैं, इन्हें नहीं पता है कि वो क्या थे. अकबर ने भला किस हिन्दू रीति-रिवाज़ को नहीं अपनाया. अकबर ने मुग़ल साम्राज्य को एक तरह से राष्ट्र का रूप दे दिया था. क्या ये वो करना चाहते हैं जो तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान में किया.

वहां बुद्ध की प्राचीन मूर्तिया तोड़ी गईं, क्या ये वही करना चाहते हैं. मुग़ल हमारे इतिहास और संस्कृति के हिस्सा हैं. हम भला अमीर खुसरो को कैसे भूल सकते हैं. ये आएं और साथ बैठे तो बात हो सकती है. या तो ये अपनी बातें मुझे समझा दें या फिर मेरी बातें समझ लें.

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