'मंत्री जी! छोटी बीमारियों के लिए नहीं आते हैं एम्स'

  • 17 अक्तूबर 2017

मोदी सरकार में शामिल स्वास्थ्य राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि हम लोगों की आदत हो गई है कि हर बात के लिए एम्स पहुंच जाते हैं.

उन्होंने कहा था, ''बिहार के लोग भी वहां छोटी बीमारियां लेकर चले जाते हैं. मैंने डाक्टरों को कह दिया है कि ऐसे लोगों को वापस बिहार भेज दें जिनका इलाज पटना एम्स में हो सकता है.''

इस बयान के बाद चौबे की आलोचना भी हुई थी.

'नेता रोड पर रहेंगे?'

लेकिन उनके इस दावे में कितना सच है? क्या वाकई बिहार के लोग छोटी-छोटी बीमारियों को लेकर दिल्ली के एम्स अस्पताल पहुंच जाते हैं?

इस बात का पता लगाने के लिए बीबीसी हिन्दी एम्स पहुंचा. और वहां क्या-कुछ देखा, ये ग्राउंड रिपोर्ट से पता चलता है.

एम्स दिल्ली के गेट नंबर 2 में घुसते ही कई मरीज़ और उनके परिवार वाले पेड़ के नीचे बैठे नजर आते हैं.

जहानाबाद के घनश्याम सिंह अपनी पत्नी के इलाज के लिए तीन महीने से एम्स आ रहे हैं.

पत्नी को डायबिटीज़ है और पांव में गहरा ज़ख्म हो गया है. पटना एम्स में भी 3-4 महीने तक जाते रहे लेकिन इलाज नहीं हो पाया.

घनश्याम कुछ ग़ुस्से में कहते हैं कि नेता जो बोल रहे हैं कि छोटी बीमारियां लेकर आ जाते हैं, नेता होते तो हमें बिहार से दिल्ली आने की क्या ज़रूरत होती.

उन्होंने कहा, ''दिल्ली आने में ही एक व्यक्ति का हज़ार रूपया लग जाता है. दिन-भर पेड़ के नीचे रहते हैं फिर शाम को बाहर सड़क किनारे सोते हैं.''

'बिहार में इलाज हो तो सही'

समस्तीपुर के दिलीप यादव अपने पिता के इलाज के लिए छह महीने से एम्स दिल्ली आ रहे हैं. उनके पिता तो लीवर कैंसर है. उन्होंने कहा कि बीमारी चाहे छोटी हो या बड़ी हो, पहले उसका इलाज तो बिहार में मुहैया करवाया जाए.

उन्हें एम्स दिल्ली में भर्ती होने के लिए सांसद की पैरवी लगवानी पड़ी. आने के लिए पैसा तो खर्च होता ही है, साथ ही हर बार हफ्ते भर के लिए आना पड़ता है क्योंकि इलाज से पहले टेस्ट होते हैं.

बलिया से आई रेशमा देवी पेट के कैंसर से जूझ रही हैं. उनके पास कहीं रहने की जगह नहीं है. वो पूछती हैं कि हम अपना घर छोड़ कर रोड पर सो रहे हैं तो क्या शौक से? हमारा इलाज बिहार में नहीं हुआ तो यहां अपनी परेशानी की वजह से रह रहे हैं.

अररिया के एक गांव से कुंदन देवी अपने पति के ब्रेन ट्यूमर के इलाज के लिए नौ महीने से एम्स के चक्कर काट रही हैं. उन्होंने बताया कि डॉक्टर ने ही उन्हें यहां भेजा है क्योंकि बिहार में इसका इलाज नहीं है.

देश भर से लोग दिल्ली आने को मजबूर

बिहार के लोगों से बात करते-करते आगरा की समीम मिल गईं. अपनी बेटी की आंख के इलाज के लिए साल भर से भटक रही हैं.

आगरा में इलाज करवाया लेकिन वहां से दिल्ली जाने को कहा. बेटी की आंखें बचाने के लिए 60 हज़ार कर्ज़ ले चुकी हैं और ये बताते-बताते फफक कर रो पड़ीं.

बरेली की गुड्डो देवी को बच्चेदानी का कैंसर है और दर्द से परेशान हैं. वो बताती हैं कि उन्हें एम्स में भी दो साल की वेटिंग दी है. वो कहती हैं कि उन्हें नहीं पता कि तब तक वो जीवित भी रहेंगी या नहीं.

पटना एम्स की रिपोर्ट

ऐसा नहीं कि बिहार में एम्स नहीं. है तो लेकिन शायद दिल्ली जैसा नहीं. पटना एम्स की ओपीडी चार साल पहले 2013 में शुरू हुई थी लेकिन अभी तक कई सामान्य सेवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं.

इमरजेंसी सेवाएं, ब्लड बैंक और डॉक्टरों की कमी है. किसी सामान्य टेस्ट के लिए भी छह महीने का इंतज़़ार करना पड़ता है.

इस साल बजट सत्र के दौरान खुद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने एक प्रश्न के जवाब में बताया था कि दिल के मरीज़ एम्स पटना से दिल्ली और लखनऊ रेफ़र किए जा रहे हैं.

इसके अलावा जुलाई में आई कैग रिपोर्ट में देश के कई राज्यों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवाल उठाए गए थे.

रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 50% से ज़्यादा प्राथमिक चिकित्सा केंद्र, सामुदायिक चिकित्सा केंद्रों की कमी है. यानि बिहार के लोग छोटी-छोटी बीमारियों के लिए भी बड़े अस्पतालों में लाइन लगाने के लिए मजबूर हैं.

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