ब्लॉग: #MeToo: वो आदमी जो औरतों का यौन उत्पीड़न करने के लिए शर्मिंदा हैं

  • दिव्या आर्य
  • बीबीसी संवाददाता
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सबसे पहले तो इस ब्लॉग को पढ़नेवाले मर्दों के लिए एक संदेश. आज मैं आपसे मुख़ातिब नहीं हूं. ये मसला मर्दों के बारे में है और मर्दों ने ही उठाया है.

इसलिए पढ़ते व़क्त असहज महसूस करने लगें तो कंधा झिड़क कर आगे मत बढ़ जाइएगा, बल्कि पूरा पढ़िएगा.

क्या आपने कॉलेज में किसी लड़की की ब्रा का स्ट्रैप खींचकर छोड़ा है और उसे मज़ाक समझा है?

क्या लड़की के बार-बार मना करने के बावजूद आपने भद्दी टिप्पणियां करते हुए ज़बरदस्ती उससे दोस्ती करने की कोशिश की है?

क्या आपने 'बेशर्म फ्लर्ट' कहे जाने को तमगे की तरह पहना है?

क्या आपने बिना ज़रूरत के कभी एक औरत को छुआ है जबकि आप जानते हैं की वो इससे परेशान हो सकती है?

शारिक रफ़ीक ने किया है. और ऐसा बुरा बर्ताव करने के लिए वो बुरा महसूस भी करते हैं. वो मानते हैं कि उनके अंदर 'गंदगी भरी थी'.

मुझे रफ़ीक तब मिले जब मैं ट्विटर पर #MeToo के साथ मर्दों के द्वारा की जा रही पोस्ट देख रही थी.

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आवाज़ें सुन कर भी अनसुनी

#MeToo ट्विटर पर तब ट्रेंड करने लगा जब हॉलीवुड प्रोड्यूसर हार्वे वाइनस्टाइन के ख़िलाफ़ आरोप सामने आने के बाद औरतें अपने यौन उत्पीड़न और हिंसा की आपबीती लिखने लगीं.

पर मेरी दिलचस्पी औरतों की बातों में नहीं थी. क्योंकि साफ़ बताऊं तो मैं थक गई हूं. चिढ़ गई हूं. बल्कि नाराज़ हूं.

एक और हैशटैग से, फिर एक बार औरतों से सामने आकर आवाज़ उठाने की मांग से.

हम तो अब बहुत लंबे अरसे से आवाज़ उठा रही हैं. पर लगता है कि वो सुन कर भी अनसुनी ही है.

उत्पीड़न को कैसे पहचानें?

इसलिए मेरी दिलचस्पी मर्दों की बातों में थी. अगर औरतें अपने उत्पीड़न के बारे में ख़ुलकर बोलने की हिम्मत कर रही हैं तो क्या मर्द भी साहस करेंगे और मानेंगे कि वो उत्पीड़न कर चुके हैं?

क्या वो ये समझ भी पाएंगे कि उन्होंने जो किया वो दरअसल उत्पीड़न है? कि वो बुरा कर रहे थे?

या वो उत्पीड़न में साझीदार थे क्योंकि उन्होंने और मर्दों को बुरा करते हुए देखकर भी अपनी आंखें बंद कर ली थीं?

शारिक रफ़ीक अकेले नहीं थे जो अनुचित बर्ताव की ज़िम्मेदारी मान रहे थे. औरतों की बात ना सुनने-समझने और औरतों के उत्पीड़न को लगभग सही क़रार देनेवाली आम सोच से प्रभावित होने को स्वीकार कर रहे थे.

उमर अहमद ने भी ट्वीट किया और कहा कि वो शर्मिंदा हैं कि उन्होंने मुंह फेर लिया, और उनकी काम की जगह पर हो रहे यौन उत्पीड़न को बढ़ावा दिया.

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"अफ़सोस की मैं आंखे मूंदे रहा"

जब उनकी महिला सहकर्मी ने उनसे आमने-सामने बात की और कहा कि उन्हें बहुत निराशा हुई कि उमर ने उस आदमी का पक्ष लिया, तब उमर समझे.

उमर जानते थे कि उस मर्द का दोस्ताना रवैया अक़्सर सीमाएं पार कर जाता था और उससे आगे भी जा सकता था पर उनके सामने कुछ नहीं हुआ तो वो आंखें मूंदे रहे.

और ऐसा उन्होंने इसलिए किया क्योंकि वो आदमी उन्हें लाखों यूरो के एक प्रोजेक्ट के लिए चाहिए था.

यानी सबसे पहले तो ये पहचानना कि कैसा बर्ताव उत्पीड़न के दायरे में आता है और फिर लड़ाई ये समझाने की कि उसका समाधान ढूंढना ज़रूरी है!

हमेशा कुछ ना कुछ तो दांव पर होगा ही. पैसा, इज़्ज़त, करियर.

आसान तो कुछ नहीं है.

जैसे औरतों को कहते आए हैं, लोग उस आदमी का भी मज़ाक बना सकते हैं. कह सकते हैं कि 'चिल' (आराम) करो.

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मर्दों ने मर्दों से की बात

क्योंकि उनके मुताबिक ये सब मज़ाक की बात है, तो इसका बतंगड़ क्यों बनाया जाए.

पर शारिक और उमर की ही तरह मर्दों को अब आराम का ये रवैया छोड़ना होगा #SoDoneChilling.

और सोचना होगा कि वो अब कैसे जिएंगे, औरतों की बात सुनेंगे और उन्हें महफ़ूज़ महसूस कराएंगे.

शुक्र है आज ये सिर्फ मेरी सोच नहीं है. बल्कि अब ये बात मर्दों ने मर्दों से सीधे कह डाली है.

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