क्या 'बीटी कॉटन' की नाकामी से गई 30 किसानों की जान?

  • 19 अक्तूबर 2017
खेती करता किसान इमेज कॉपीरइट VIVIAN FERNANDES

हाल ही में महाराष्ट्र के विदर्भ में बीटी कॉटन की खेतों पर कीटनाशक के छिड़काव के दौरान उसके चपेट में आने से 30 से ज़्यादा किसानों की मौत हो गई, जबकि सैकड़ों को अस्पताल में भर्ती कराया गया.

सरकार ने एसआईटी का गठन किया, कुछ अधिकारी सस्पेंड किए गए, कीटनाशक बेचने वालों के लाइसेंस रद्द किए गए और प्रतिबंधित कीटनाशक बेचने वालों को जेल भेजा गया.

मौत के कारणों पर पड़ताल अभी जारी है.

ये करते नहीं थकते बीटी कॉटन की वाहवाही, पर...

कीटनाशक कैसे बने 'किसाननाशक'

Image caption नरेंद्र गावंडे अपने बेटे के साथ

"बीटी कॉटन" में कीड़े लगे

हालांकि जांच के दौरान कुछ कारण सामने आए. पहला, किसानों के पास सुरक्षा के उपाय नहीं थे और दूसरा, अनुमति से ज़्यादा कीटनाशकों का इस्तेमाल हुआ.

जो कीटनाशक इस्तेमाल नहीं किए जाने थे वो भी इस्तेमाल किए गए. अब सवाल यह है कि उन कीटनाशकों के इस्तेमाल के लिए किसान मजबूर क्यों हुए? और क्या उसकी बड़ी वजह 'बीटी कॉटन' है?

2002 से भारत में 'जीएम' यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलों के रूप में 'बीटी कॉटन' बीज का इस्तेमाल सरकारी नीति के तहत बढ़ता गया.

गुजरात और आंध्र प्रदेश के साथ महाराष्ट्र भी कपास की खेती में 'बीटी कॉटन' का इस्तेमाल करने वाला अग्रणी राज्य है.

यवतमाल के साथ विदर्भ के कपास उत्पादक किसान 'बीटी' के भरोसे ही हैं. अन्य फ़ायदों के अलावा बीटी कॉटन नुकसानदायक कीटों से मुक़ाबला करने में सक्षम होते हैं इसलिए इसके प्रसार पर हमेशा ज़ोर दिया जाता रहा.

लेकिन यवतमाल की घटना के बाद बीबीसी ने जब विदर्भ के किसानों से बात की तो उन्होंने यह कहा कि पिछले दो साल से कपास की फ़सल पर वो ऐसे कीड़ों का प्रभाव देख रहे हैं जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखा.

Image caption बीटी कॉटन

'बीटी कॉटन' पर इल्लियों की मार

एक ख़ास किस्म का कीड़ा, जिसे इल्ली या स्थानीय भाषा में 'बोंडअली' कहते हैं, उसका प्रभाव अचानक बढ़ गया है. वे कहीं फ़सल को ख़त्म ना कर दें इस डर से किसान अधिक मात्रा मे कीटनाशकों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

यवतमाल के कलंब गांव के पास ही नरेंद्र गावंडे अपनी 28 एकड़ पुश्तैनी ज़मीन पर कपास की खेती करते हैं. वह भी अब कई सालों से यहां 'बीटी कॉटन' के बीजों की बुआई ही करते हैं. पिछले दो साल से वह भी इस नई समस्या से चिंतित हैं.

नरेंद्र गावंडे कहते हैं, "पहले 'बीटी' पर ये कीट नहीं आते थे. कीटनाशक का इस्तेमाल नहीं था. लेकिन अब वह बात नहीं रही. अब सब तरह के कीड़े हमें दिखने लगे हैं. तो अब इसे 'बीटी' कैसे कहा जाए? किसानों के पास ज्यादा कीटनाशक छिड़कने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता. कीड़े के लिए वह अलग अलग कीटनाशक इस्तेमाल कर देख लेते हैं. पिछले दो सालों से यह चल रहा है."

बढ़ गया कीटनाशकों का इस्तेमाल

किसान ये बीज और कीटनाशक सरकारी लाइसेंस प्राप्त केंद्रों से खरीदते हैं. जब हम इन केंद्रों पर गए तो वहां भी पिछले दो साल से अचानक बढ़ी कीटनाशकों की मांग की पुष्टि हुई. कलंब गांव में ही प्रफ़ुल्ल कापसे कई सालों से 'प्रगति कृषि सेवा केंद्र' चलाते हैं.

Image caption कीटनाशक

वो कहते हैं, "इल्ली से लड़ने की 'बीटी' की क्षमता अब कम हो गई है. किसानों ने अब उस पर भी कीटनाशक छिड़कना शुरू कर दिया है. इसी वजह से मांग और इस्तेमाल दोनों बढ़ गए हैं. इस साल इन गुलाबी रंग की इल्लियों का असर ज़्यादा दिखने लगा. फ़िर कीटनाशकों का इस्तेमाल 25 से 30 फ़ीसदी बढ़ गया."

कृषि विभाग की जानकारी के अनुसार, अकेले यवतमाल जिले में 2016-17 में कुल 6,53,316 लीटर कीटनाशक किसानों ने खरीदे. इस साल अप्रैल से 15 अक्तूबर तक, यानी सिर्फ़ सात महीनें में यह खरीदारी 5,65,648 लीटर की हुई है. इन आंकड़ों से कीटनाशक की बढ़ती मांग का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

स्थानीय प्रशासन, किसान और विक्रेताओं की मानें तो 'पोलिस' नाम के एक कीटनाशक मिश्रण का इस्तेमाल ज़्यादा हुआ, जो गन्ने की खेती में इस्तेमाल किया जाता है. प्राथमिक जानकारी के मुताबिक यही मिश्रण ज़्यादा जानलेवा रहा. इसी के साथ 'मोनोक्रोटोफ़ॉस' नाम के मिश्रण का भी इस्तेमाल हुआ. सरकार अब यह रसायन बनाने और बेचने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर रही है.

Image caption प्रफुल्ल कापसे

"बीटी कॉटन" की नीतियों का परिणाम

लेकिन जो वजह ज़्यादा कीटनाशक के इस्तेमाल के लिए मजबूरी बनी, उसके बारे में क्या किया जाना चाहिए?

कृषि विशेषज्ञ और 'पंजाबराव देशमुख कृषि विद्यापीठ' के उप कुलपति रह चुके डॉ शरद निंबालकर का कहना है कि सिर्फ़ 'बीटी' के दम पर तैयार नीति का यह परिणाम है और हमें इंटिग्रेटेड नीति की जरूरत है.

वो कहते हैं, "बीटी मे अब अप्रभावी जीन आ गए हैं. तो कंपनियां बोलगार्ड 1 को छोड़ बोलगार्ड 2 बीज मार्केट में लायीं. लेकिन ये सामान्य किसानों तक नहीं पहुंच रहीं. एक न एक दिन यह होना ही था."

अब सरकार भी खुले तौर पर 'बीटी' का विरोध कर रही हैं और अपनी नीति पर पुनर्विचार भी.

महाराष्ट्र के कृषिमंत्री पांडुरंग फ़ुंडकर ने बीबीसी के पूछे सवाल पर कहा, "इन कंपनियों ने सरकार से वादा किया था की 'बीटी' की फ़सल पर रोग नही आएंगे. लेकिन अब वैसी स्थिति नहीं है. अनेक तरह के रोग, कीड़े कपास की फ़सल पर दिखाई दे रहे हैं. इसीलिए हम 'बीटी' का विरोध कर रहे हैं. सरकार इसके सशक्त पर्याय देने का प्रयास कर रही है."

Image caption डॉ शरद निंबालकर

इल्लियों की प्रतिरोधक क्षमताएं बढ़ीं

किसानों की बताई वजहों और हमारे निरीक्षणों पर हमने बीज उत्पादक कंपनियों के संगठनों से भी पूछा.

'सीड इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ऑफ़ महाराष्ट्र' के कार्यकारी संचालक डॉ एस. डी. वानखेडे ने 'बीबीसी' को ईमल पर भेजे जवाब में लिखा, "बीटी कॉटन टेक्नोलॉजी का निर्माण इल्लियों से कपास की फ़सल को बचाया जा सके इसलिए किया गया है. लेकिन अगर बताए गए तरीके के अनुसार सावधानी नहीं बरती गई तो इल्लियों में प्रतिरोधक क्षमताओं का निर्माण हो सकता है. पिछले दो साल में कुछ इलाकों मे गुलाबी रंग की इल्लियां कपास पर दिखाई दिए हैं."

सवाल यही है कि 'बीटी' पर आने वाले कीड़ों के बदलाव के बारे में अगर सबको पता था तो कुछ प्रयास क्यों नहीं किए गए? अगर ज़रूरी कोशिशें की जातीं तो विदर्भ के किसान कुछ कम कीटनाशकों का इस्तेमाल करते? और अगर वह कम होता तो क्या 30 से ज़्यादा किसान अपनी जान गंवाने से बच जाते?

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