किसानों को पुआल जलाने की समस्या से छुटकारा कैसे?

  • 19 अक्तूबर 2017
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किसानों के लिए अपने खेत को अगली फ़सल के लिए तैयार करना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है.

पंजाब में यह चुनौती और भी बड़ी हो जाती है, क्योंकि बढ़ते प्रदूषण के मद्देनज़र राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के सख्त निर्देशों के बाद, सरकार ने पुआल के जलाने पर पूरी तरह से पाबंदी लगा दी है.

पंजाब: किसानों को पुआल जलाने की ज़रूरत नहीं

एक पशु, जो है लाखों रुपये का

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पुआल बनी किसानों की चिंता

पंजाब के मोहाली स्थित भागो माजरा गांव के संत सिंह चिंतित हैं.

उन्हें लगता है कि अगली फ़सल के लिए खेत को तैयार करना पुआल को जलाए बगैर संभव नहीं है.

वो कहते हैं कि सरकार नहीं चाहती कि हम पुआल जलाएं लेकिन अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो नई फ़सल बोना मुश्किल होगा.

वो कहते हैं कि उनके पास पुआल निकालने की मशीन नहीं है और न ही सरकार ने अन्य तरीके बताए हैं.

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पुआल जलाने पर जुर्माने का प्रावधान

2015 में एनजीटी ने पुआल जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया था क्योंकि इससे निकलने वाले धुएं से लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा था.

पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष कहान सिंह पन्नू कहते हैं कि राज्य में 60 लाख एकड़ में धान की फ़सल लगाई गई थी और प्रत्येक एकड़ में तीन टन पुआल निकलता है.

वो कहते हैं कि राज्य ने पुआल जलाने वाले किसानों पर जुर्माना लगाने का प्रावधान बनाया है.

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"फ़सल काटने की मशीन हैं समस्या"

कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि किसानों पर कार्यवाही की बजाय सरकार को उन कंपनियों पर कार्रवाई करनी चाहिए जो कंबाइन यानी फ़सल काटने की मशीनें बना रही हैं.

वो कहते हैं कि सरकार पहले से आत्महत्या की ओर मुड़ रहे किसानों पर और दबाव बना रही है. वो कहते हैं कि फ़सल काटने की मशीन समस्या का मूल कारण है और ऐसे फ़सल काटने की मशीनें बनायी जानी चाहिए जो फ़सल के साथ ही पुआल को भी इकट्ठा करती जाएं.

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हैप्पी सीडर मशीन है समाधान

संगरूर के एक गांव के किसानों ने पुआल नहीं जलाने का निर्णय लिया है. बीबीसी पंजाबी को एक किसान जगदीप सिंह ने कहा कि उनके पास 39 एकड़ ज़मीन है और पिछले 10 सालों में उन्होंने कभी पुआल नहीं जलाया.

उनका दावा है कि अन्य किसानों भी उनसे प्रोत्साहित होकर पुआल जलाना बंद कर दिया है.

उनका कहना है कि वो हैपी सीडर मशीन (बुआई के इस्तेमाल में आने वाली मशीन) की मदद लेते हैं जिसकी कीमत डेढ़ लाख रुपये है. सरकार इसके लिए 44 हज़ार रुपये की सब्सिडी देती है. लेकिन इस मशीन को खींचने के लिए बड़े ट्रैक्टर्स की ज़रूरत होती है और आम किसान इसको वहन नहीं कर सकते.

उन्होंने यह भी कहा, सब्सिडी पाना एक लंबी और कठिन प्रक्रिया है. फ़िर भी इस गांव के 150 किसान धान की खेती कर रहे हैं और उन्होंने पर्यावरण और खेत को उपजाऊ बनाए रखने की ख़ातिर पुआल को नहीं जलाने का फ़ैसला किया है.

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