कैसी होती थी लुडलो केसल की ब्रिटिश दिवाली?

  • 19 अक्तूबर 2017
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Image caption लुडलो केसल

पिछली शताब्दी की शुरुआत में लुडलो केसल की दिवाली कुछ इस तरह मनायी जाती थी, मानो वो क्रिसमस के आने की सूचना दे रही हो.

वहां पूजा, अगरबत्तियों के धुंए और खील-बताशा तो नहीं होते. लेकिन गुजरिया (हाथ और सिर पर दीये लिए मिट्टी से बनी महिला) होती थी, क्योंकि यह सात बार विवाहित उस महिला की याद दिलाती थी जिसने कुएं पर प्यासे यीशु को पानी पिलाया था.

ये महिला ठीक उसी तरह दोनों हाथों को जोड़ कर पानी पीती नज़र आती, जैसे आज भी इस शहर की पुराने बासिंदे प्याउ या सबील पर पिया करते हैं.

पुरानी कहानियों के मुताबिक, साहिब के लिए गुजरिया गुड़िया नहीं थी और न ही वो उसकी पूजा करते थे, लेकिन एक प्रतीक के रूप में इसके और इस त्योहार के वो आदि हो चुके थे.

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सनडाउनर शराब परोसी जाती

दिवाली की रोशनी उन्हें आकर्षित करती थी और लुडलो केसल (1968 में ध्वस्त) ब्रिटिश क्लब को आकर्षक तरीके से जगमगाया जाता था.

सनडाउनर शराब परोसी जाती, साथ ही पटाखे फोड़े जाते लेकिन वहां से करीब आधा किलोमीटर दूर कश्मीरी गेट या बॉम्बे हाउस जितने नहीं.

बॉम्बे हाऊस पर ओल्ड लुईस का अधिकार था. उन्हें ओल्ड लुईस कहा जाना, उनकी उम्र से अधिक उनके प्रति स्नेह को दर्शाता है.

वह मूल रूप से बॉम्बे से थे और इसलिए उन्होंने अपने विशाल बंगले को अपने होम टाउन का नाम दिया था.

सेंट जेवियर्स के स्कूल के जेसुइट (कैथोलिक) पादरियों को घर बेचने के बाद भी उनके कुछ वंशज अब भी वहां रहते हैं.

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जुआ खेला जाता

क्लब में पी रहे लोगों में जॉन के परिवार के सदस्यों के अलावा अन्य मिल के मालिक भी थे, इनमें से अधिकतर वो बड़े सेठ होते जिन्हें त्योहारों के उत्साह के साथ महंगे उपहार देने के लिए जाना जाता था.

यह वो अवसर होता, जब भारतीयों के प्रवेश के लिए क्लब के नियमों को हटा दिया जाता था. शराब के बाद पत्तियों के साथ जुआ खेला जाता था. शुरुआत में दांव पर कम पैसे लगते लेकिन डिनर (सेठ चम्मच, कांटे से नहीं खाने को तरजीह देते) के बाद जैसे जैसे रात होती जाती दांव बढ़ते जाते और कुछ को बहुत का नुकसान होता. लेकिन यूनानी रत्न व्यापारी एंटनी जॉन के पोते सर एडविन जॉन की तरह नहीं.

सर एडविन ने 1920 के दशक की एक रात फ्रेंच रिवेरा के मोंटे कार्लो में अपना सब कुछ खो दिया. उसके बाद वो सही मायने में कंगाल होकर भारत लौटे और 1935 में अपनी मौत तक ग्वालियर महाराज के स्थायी अतिथि बन कर रहे.

संयोग से, उनके दादा 1826 में लॉर्ड कॉम्बर्मेर के हमले के दौरान लगभग अभेद्य भरतपुर किले में घुसने वाले पहले सैनिक थे.

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महिलाएं फुलझड़ियों के आनंद लेतीं

लुडलो केसल में एकत्र लोग अंतिम पटाखों के फोड़े जाने के साथ ही निकलने लगे, साहिब अपने अपने टमटम में और सेठ (लाला नन्नू मल और सेठ जगत नारायण) दो-चार घोड़ों वाली बग्घी में.

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि क्लब में कोई पटाखे नहीं फोड़े जाते थे. हालांकि, महिलाएं डांस से पहले फुलझड़ियों का आनंद जरूर लिया करतीं जिसमें पत्तियां खेल रहे सदस्य भाग नहीं लेते थे.

बॉम्बे हाऊस में, ओल्ड लुईस भी व्यापक रूप से दिवाली समारोह मनाते जिसमें उनके पड़ोस के बंगलों में रहने वाले कई एंग्लो-इंडियंस अतिथि होते.

यहां की महिलाएं, कम से कम युवतियां, पटाखे फोड़ने का आनंद उठातीं जबकि अन्य वृद्ध मोमबत्तियां और फुलझड़ियां जलातीं. रसोइये जामा मस्जिद इलाके से बुलाए जाते थे और वो मुगलई खाने बनाते, जो कुछ अतिथियों के लिए बहुत तीखा होता था. उनके लिए भी प्रबंध किए जाते.

झाल फ़रेज़ी, विंदालू, पैनकेक और बोन सूप के साथ मीठे में ब्रेड पुडिंग होते थे. लेकिन जो लोग कबाब के साथ अपनी व्हिसकी, जिन और रम और उसके बाद शेरमाल-कोर्मा और बिरयानी का आनंद उठा रहे होते उनके लिए मीठे पकवान में ज़र्दा होता था.

लुडलो केसल के लोगों में से कुछ लोग बॉम्बे हाऊस भी जाते थे ताकि वो बिना मसाले के यूरोपीय डिनर का भी आनंद ले सकें.

क्या आप यह मान सकते हैं कि वहां सबका पसंदीदा देसी ठर्रा या देसी शराब थी जो फौरन मदहोशी ला देता था, हालांकि मेमसाहिब इसकी तीखी महक के कारण अपने नाक पर रूमाल रख लेती थीं.

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'यार ठर्रा पिलाओ'

वहां कश्मीरी गेट से कुछ दूर पर ही एक भारतीय पादरी फ़ादर डेनियर थे, जिन्होंने सेंट मैरी चर्च का थोड़े समय के लिए चार्ज लिया था. फ़ादर ने मथुरा ज़िले में चंदू का नगला के ग्रामीण चर्च की लंबे समय तक सेवा की थी, उन्होंने लुईस के कान में फुसफुसाया, 'यार ठर्रा पिलाओ.'

इसमें कोई शक नहीं कि वो अनुग्रहित थे और अपनी गलती स्वीकार रहे थे कि वो क्रिसमस पर नहीं पी सके क्योंकि आगरा के इतालवी आर्कबिशप मिडनाइट मास के दौरान वहां एकत्र पादरियों को गले लगाते वक्त उन्हें सूंघ रहे थे.

जब क्लब दिल्ली गेट से दूर हो गया तब लुडलो केसल की धूमधाम समाप्त हो गई लेकिन ओल्ड लुईस ने दिवाली की रात को अपने नए पुराने मित्रों के साथ मनाना जारी रखा.

संभवतः उनमें से अंतिम जॉर्ज विलियम सेबैस्टियन थे. 1962 में निधन के समय तक वो बॉम्बे हाऊस के समारोह को याद करते थे, जैसा की दिवंगत श्रीमती बेकविथ पुष्टि करती थीं, वो कभी आगरा के सैन्य बैरक में भी रह चुके थे.

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