नज़रिया: सुरक्षा परिषद में क्यों नहीं हो रही भारत की एंट्री?

  • 19 अक्तूबर 2017
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Image caption निक्की हैली

संयुक्त राष्ट्र में अमरीका की राजदूत निकी हेली ने मंगलवार को एक कार्यक्रम में कहा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को अगर स्थायी सदस्यता प्राप्त करनी है तो उसे वीटो पावर के विषय में नहीं सोचना चाहिए.

उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद में अमरीका समेत चीन, ब्रिटेन, रूस और फ़्रांस के पास वीटो की ताक़त है लेकिन इसे उनमें से कोई नहीं छोड़ना चाहता.

भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अपनी जगह किसी ख़ैरात में नहीं मांग रहा है क्योंकि यह उसका हक़ है. 1945 और दूसरे विश्व युद्ध के बाद तस्वीरें बदल चुकी हैं और भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है. गठन के 70 साल बाद भी आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की नुमाइंदगी सही तरीके से नहीं हो सकी है तो यह सरासर ग़लत है.

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बिना वीटो सुरक्षा परिषद

जहां तक वीटो पावर और निकी हेली के बयान का सवाल है तो वह अल्पकालिक बात है. जी-4 देशों ने इस पर बात की थी कि 8-10 सालों के लिए वीटो पावर छोड़ी जाए लेकिन ऐसा नहीं किया गया. इसका साफ़ मतलब है कि वीटो पावर के बिना सुरक्षा परिषद का कोई मतलब नहीं है.

संयुक्त राष्ट्र का मकसद ही बराबरी है. अगर सभी देशों में बराबरी ही नहीं होगी तो इसकी ज़रूरत क्या है? भारत ने पहले भी कहा है कि 8-10 सालों के लिए वीटो का अधिकार उसे दिया जाए और फिर बेहतर तरीके से काम करके दिखाते हैं. लेकिन भारत वीटो के अधिकार को नहीं छोड़ सकता है.

सिर्फ अमरीका पर भारत की सदस्यता निर्भर नहीं करती है.

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भारत के सदस्य बनने से क्या असर

शीत युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद देशों के बीच ऐसी परिस्थितियां बनीं कि एक अपने आप को जीता हुआ महसूस करता था और एक हारा हुआ. लेकिन आज यह तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है.

भारत ने विश्व शांति के लिए बहुत से काम किए हैं. हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं और साथ ही सबसे विकासशील अर्थव्यवस्था भी. इस कारण भारत एक ज़िम्मेदार देश है, जिसे वीटो पावर मिलती है तो वह बहुत गंभीर मुद्दों पर अच्छे से काम करेगा.

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अमरीका क्यों रख रहा ये प्रस्ताव

आज तक संयुक्त राष्ट्र के ढांचे में जो फेरबदल नहीं हो पाए हैं उसकी वजह इन पांच देशों के सामूहिक प्रयासों की कमी है. क्योंकि ये देश व्यक्तिगत तौर पर तो भारत के संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का समर्थन करते हैं लेकिन जब सामूहिक रूप से कुछ करने की बात आती है तो पीछे हट जाते हैं.

अगर इसका विस्तार होता है तो इसमें और देश आएंगे. यानी अपनी बात मनवाने के लिए अधिक लोगों को राज़ी करना होगा. यही कारण है कि ये शक्तिशाली देश वीटो पावर देना नहीं चाहते हैं.

भारत ज़ाहिर तौर पर सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का हक़दार है और अब समय आ गया है कि उसे उसकी जगह दी जाए.

(बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद से बातचीत पर आधारित)

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